रविवार, 21 मार्च 2010

कवि सईद लखनऊ में : कविता पाठ और संवाद




दूर से आती एक प्रवासी की
आवाज
अनिल सिन्हा


फिनलैंड निवासी हिन्दी के कवि, चित्रकार, फोटोग्राफर व अनुवादक सईद इन दिनों हिन्दुस्तान की यात्रा पर हैं। वे 16 मार्च को लखनऊ आये और उसी दिन जन संस्कृति मंच की ओर से उनकी कविता पाठ और उनके साथ बातचीत का कार्यक्रम राज्य सूचना केन्द्र में रखा गया। भवाली उत्तराखंड में जन्में सईद विज्ञान के स्नातक और विज्ञानी बनने की आकांक्षा के साथ साथ वह काफी दिनों दिल्ली में स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता व सोवियत सूचना विभाग में अनुवादक का काम करते रहे। कविताएँ लिखने व पेंटिंग का काम वे शुरू से करते रहे। ऐसी उत्पीड़नकारी स्थितियाँ पैदा हुई जिनकी वजह से उन्हें देश छोड़ना पड़ा। वे 1972 में फिनलैंड गये और वहीं बस गये। वहीं की नागरिकता भी ले ली। तब से कई दशक गुजर गये। लेकिन लखनऊ की गोष्ठी में देश से जाने के कारण के बारे में पूछे जाने पर वे इतने व्यथित हो उठे कि उन दिनों जो कुछ उनके साथ इस देश में घटा, उसे मात्र याद कर उनकी आँखें भर आईं। सईद अकेले नहीं हैं। तसलीमा नसरीन, मकबूल फिदा हुसैन जैसे अनगिनत लोग हैं जिन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

सईद की कविताओं में इस दुख-विषाद की अभिव्यिक्ति मिलती है। यहाँ प्राकृतिक और अन्तरिक्ष के सौन्दर्य हैं, मांसलता है, अदभुत संवेदना, प्रतीक, बिम्ब और कल्पनाशीलता है साथ ही बेहतर मानवोचित समाज बनाने की जन आकांक्षा व संघर्ष के प्रति प्रतिबद्धता। इसीलिए वे लिखते हैं - ‘तपते मरूस्थल/अंकुरित हो रहे हैं/स्वप्न, हरित/खिलेंगे पुष्प/रक्ताभ/खंडित हो जायेंगी/शिलाएँ।’

बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी चित्रकला से लेकर आधुनिक चित्रकला को लेकर तथा फिनलैंड में कला व साहित्य पर बातचीत की। सईद ने वहाँ के साहित्य, संस्कृति व थियेटर आदि की गतिविधियों पर चर्चा की और बताया कि किस तरह फिनलैंड की सरकार के पास एक सुस्पष्ट सांस्कृतिक नीति है। वह अपने साहित्य के प्रचार.प्रसार के लिए बड़ी राशि खर्च करती है। इसी के तहत सईद ने प्रसिद्ध फिनिश उपन्यासकार मिका वाल्तरी के उपन्यास ‘सिनुहे मिश्रवासी’ का हिन्दी में अनुवाद किया है जिसे राजकमल प्रकाशन छाप रहा है। इसके लिए फिनिश सरकार राजकमल प्रकाशन को लाखो रुपये देगी।

फिनलैंड के समाज की चर्चा करते हुए सईद का कहना था कि वहाँ समाज में महिलाओं को बराबरी की स्थिति हासिल है और अविवाहित मातृत्व को भी मान्यता है। फिनलैंड में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। यहाँ दक्षिणपंथी, वामपंथी व मध्यमार्गी दल हैं। इन दिनों वहाँ की चिन्ताजनक हालत यह है कि नवनाजीवाद और नस्लवाद उभर रहा है। मंदी का यहाँ भी असर है। अमेरीका के बढ़ते सांस्कृतिक व राजनीतिक वर्चस्व को यहाँ के नागरिक पसन्द नहीं करते हैं।

इस मौके पर सईद ने अपनी कई कविताएँ सुनाई। सईद का कहना था कि जब मैं इन कविताओं को प्रकाशित कराऊँगा, इसका शीर्षक होगा - ‘दूर से आती एक प्रवासी की आवाज’। सईद की कविताओं पर हुई चर्चा में अजय सिंह, विनय श्रीकर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, भगवान स्वरूप कटियार, चन्द्रेश्वर, वीरेन्द्र सारंग, नसीम साकेती, ऋतु सिन्हा, शोभा सिंह, हरिओम, श्याम अंकुरम, राजेश कुमार, कल्पना पाण्डेय, ताहिरा हसन, के के वत्स, विमल किशोर, अवन्तिका राय, कौशल किशोर आदि ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन किया अनिल सिन्हा ने।



सईद की पाँच कविताएँ

एक
तपते मरूस्थल मेंअंकुरित
हो रहे हैंस्वप्न,हरित।
खिलेंगे पुष्परक्ताभ।
खण्डित हो जायेंगीशिलाएँ।
शेष रह जाएंगेदीवारों
परआदिम भिŸाी चित्रमात्र।
दो इतिहासों के
बीचअनकही गाथाएँ।
करेंगे जिनका
मूल्यांकनअभी
अजन्मे शिशु।
अनवरत प्रवाह
मेंबहते क्षणतब
ठिठक जायेंगे पल
भर के लिए
और नक्षत्रो से
टपकेंगेंअश्रु।
समुद्र में तैर रहे होंगेद्वीप असंख्य।

दो

खण्ड खण्ड
ख्ण्डित होता
आकाशगिरता है
धरती पर।
दीवारों परटिकी हुई
स्मृतियाँ।
या फिरमृत लोगों
केधुँधलाते दस्तखत।
बारिश की बूँदों
मेंबुना हुआ
इंद्रधनुष।
हवा में तैरते हुए
चेहर,ेपरिचय,नाम।
शेष है साँसों में
अभी गर्माहट।
कूँची से उभरते रंग,बनते दृश्य।
झिझकते चेहरों
मेंझलकता,
अटकता इतिहास।

तीन

रेत में धँसे
हुएपदचिन्ह।
अर्सा गुजर गयाइधर
सेकारवाँ को गुजरे हुए।
तटों पर टूटती
हुईसमुद्र की तरंगे,
ध्वनित
होताक्या कुछ।
इतिहास रूकता
हैठिठकता
हैपलभर
देखता हैडालता है
फिर गुजर जाता
हैबढ़ जाता है आगे।
इस बीच
कितने षडयंत्र रचे
गयेकितने
रक्तपातघटित हुए।

चार

रात्रि मेंडूब
जाता हैसमग्र
अस्तित्व,
फिर दुबारा
उभरने के लिएदूर
कहीं,सुदूर
वीराने द्वीपों पर।
शरद मेंउठता है
तूफानी बवण्डर।
शिशिरदेता
हैठण्डी
दस्तकेंबन्द दरवाजों पर।
जब संध्या ढँक
लेती हैछायाओं
कोतब शुरू होता
हैसपनों काएक नया सिलसिला।
एक पूरा दिवसगुजर
जाता है,टिक जाता
हैक्षितिज पर,
क्षितिज के सहारे।

पाँच

क्षितिज से क्षितिज
तकफैला
हुआएक सूर्य,
एक पूरा दिवस।
नक्षत्रों के नेत्रबंद हो जाते हैं
बादलों में
गढ़े हुएचेहरे
चहलकदमी करते
हैंबंद कमरे के अकेलेपन में।
हिम पिघलता
हैधीमे बहुत ही
धीमे-धीमेवसंत
उठाता
हैअपना सरधरती से।
आकाश सेटपकता
हैधीमा धीमा संगीत।
शिराओं मेंदौड़ते हैं मौसम।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

भगवान स्वरूप कटियार का कविता पाठ


‘वह बच्चा मेरी आँखों से दुनिया को देखेगा’

कौशल किशोर

मैं वापस कर आया हूँ
उनका दिया हुआ
रोबदार हैट
वजनदार बूट
और तमाम गुनाहों से सनी लथपथ वर्दी

मैं छोड़ आया हूँ
मेज और कुर्सी भी
जिस पर बैठकर
बेबसी में अनचाहे
हमें करने पड़े थे
घटिया और घृणित समझौते

आज खुली हवा में
अपने मित्रों के बीच
सांस लेते हुए
मैं महसूस कर सकता हूँ
जीवन कितना सुन्दर है

ये पंक्तियां हैं भगवान स्वरूप कटियार की कविता ‘मुक्ति का सौंदर्य’ की जिसे उन्होंने राज्य सूचना केन्द्र, हजरतगंज, लखनऊ में जन संस्कृति मंच (जसम ) के द्वारा 21 जनवरी 2010 को आयोजित कार्यक्रम में सुनाई। इसी महीने कवि कटियार साठ साल के हुए और पिछले महीने की 31 तारीख को सूचना विभाग से सहायक निदेशक के पद से सेवामुक्त हुए। जसम ने कार्यक्रम उन्हीं पर केन्द्रित किया था।

इस मौके पर भगवान स्वरूप कटियार ने ‘इक्कीसवीं सदी की बीसवीं सदी के नाम चिट्ठी’, ‘हवा में घुलता आदमी’, ‘जंगल मेरे मित्र’, ‘टुकड़े टुकड़े मौत’, ‘मां’, ‘आदमी होने का व्याकरण’, ‘मेरे न होने पर’ सहित करीब एक दर्जन से अधिक कविताओं का पाठ किया और अपनी कविता के विविध रंगों से श्रोताओं का परिचय कराया। उनकी ये पंक्तियां काफी अन्दर तक संवेदित करती रहीं:

‘मैं खत्म हो जाऊँगा पूरी तरह
यह तय है
हाँ, यकीनन मैं मर जाऊँगा............
पर वह बच्चा
जो मेरी कविता पढ़ रहा है
मेरी आँखों से दुनिया को देखेगा।’

कविता पाठ से पहले भगवान स्वरूप कटियार ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि एक स्वतंत्रचेता रचनाकार के लिए सृजन एक खिलवाड़ न होकर गंभीर दायित्व के निर्वहन की समन्वित प्रक्रिया है। सार्थक रचना सदैव किसी बड़े सरोकार से जुड़ी होती है और इसीलिए वह लोकरुचि से भी जुड़ी होती है। रचनाकार उस लोक की बात जरूर करेगा जिसमें वह साँस ले रहा है। साहित्य की चिन्ता सही फैसले की चिन्ता है जो हमें बड़े चिन्तन के क्षेत्र में ले जाती है। मेरी कविताओं का मकसद न तो कोई नजरिया पेश करना है और न ही राजनैतिक नारों की तरह बेवजह शोर मचाना है। आखिर जीवन मूल्यों, बेहतर जिन्दगी और बेहतर समाज के लिए हमें कुछ कुर्बानियाँ तो देनी ही होगी, जिससे हम आज मुकरने लगे हैं। लिखने-पढ़ने के क्षेत्र में चाहे जितनी प्रतिकूल परिस्थितियाँ हो जायें, रचना और रचनाकार बचे रहेंगे बल्कि समाज को भी बचाये रख सकेंगे -

लिखे जाने से भले हीफर्क न पड़ता हो
पर न लिखे जाने से बहुत फर्क पड़ता है
जैसे बोलने से भले ही फर्क न पड़ता हो
पर चुप्पी तो प्रतिरोध का निषेध है
इसलिए सोचना बोलना
पढ़ना और लिखना परिवर्तन की बुनियादी शर्त है

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक व समीक्षक अनिल सिन्हा ने कहा कि भगवान स्वरूप कटियार को हिन्दी कवि समाज हाशिये पर रखता है। इसका कारण शायद यह है कि रचनाकारों की जो साहित्यिक गोलबंदी है, उसमें कटियार कोई पहल नहीं लेते। वे सच को सीधे कहने का साहस करते हैं जिससे उनकी सामाजिक चिन्ताएँ व सरोकार का पता चलता है। यानी वे एक स्वस्थ-सुसंस्कृत-संवेदनशील और अपने हक के लिए लड़ने वाले समाज की कल्पना करते हैं। उनका काव्य प्रयास इसी तरफ प्रेरित है। तमाम घटनाओं पर वे तत्काल प्रतिक्रिया देते हैं जिससे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सामाजिक सजगता का पता चलता है।

कवि व समीक्षक कौशल किशोर ने भगवान स्वरूप कटियार की कविता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इनकी कविताएँ लोकतांत्रिक चेतना की कविताएं हैं जिसमे लोकतांत्रिक व्यक्ति का संघर्ष, उसकी इच्छा-आकांक्षा की अभिव्यकित होती है। कटियार का व्यक्तित्व बहुत सरल-सहज है, उनकी कविता की दुनिया भी ऐसी ही है, बहुत आत्मीय। इनको पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि यहाँ हमारी ही दुनिया अभिव्यक्त हो रही है। इनकी कविताओं में माँ,, प्रेम, दुख, ख्वाब, दलदल, घर और वह घरती है जो आज निशाने पर है। ये हमारे जटिल यथार्थ की सहज-सरल कविताएँ हैं और यही कटियार की काव्य खासियत है।

इस मौके पर कटियारजी की बेटी युवा लेखिका व पत्रकार प्रतिभा कटियार ने कहा कि बचपन से मैं देखती आई हूँ कि पापा के अन्दर विद्रोही स्वर है। दुख व कष्ट आये हैं लेकिन वे उनसे लड़ते हुए आगे बढ़े है। एक तड़प, कुछ कहने की छटपटाहट तथा विचारों के प्रति दृढता उनमें है। वे हार न मानने वाले ऐसे पिता हैं जिन्होंने मेरे और मेरे भाई के अन्दर संघर्ष की प्रेरणा दी है। यही संघर्ष इनकी रचनाओं में भी अभिव्यक्त होता है। पापा में जबरदस्त आशावाद है।

भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं पर बालते हुए आलोचक चन्द्रेश्वर का कहना था कि ये कविताएँ समकालीन कविता के आज के प्रचलित मुहावरे से अलग हैं। यहाँ दुख की बात कही गयी है लेकिन ये कविताएँ दुखवादी नहीं हैं। यहाँ दुख का दिखावा नहीं हैं। घर परिवार से लेकर देश दुनिया तक के विषय को लेकर चिन्ताएँ हैं, इनका फैलाव है। यह हारती नहीं हैं, संघर्ष की बात करती हैं और बखूबी संप्रेषित होती हैं। चन्द्रेश्वर ने ‘स्त्री और रोटी’ कविता को लेकर सवाल किया कि क्यों रोटी बनाती हुई स्त्री ही सुन्दर लगती है। स्त्री के सौंदर्य को इस रूप में देखना परम्परावादी व पुरुषवादी सोच है।

कवि वीरेन्द्र सारंग ने कहा कि वरिष्ठता के बावजूद कटियार की कविताओं में युवापन है। इनका कथ्य बहुत मजबूत है। इनकी कई कविताओं में ईश्वर आता है लेकिन ईश्वर को लेकर जो विचार, भाव व आलोचना है, वह प्रभावित करता है। वहीं ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव का कहना था कि ब्रेख्त की कविताओं में अंधेरा हावी रहता है लेकिन कटियार की कविताएँ अंधेरे से उजाले की यात्रा करती है।

समकालीन कविता पर कथाकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा की टिप्पणी ने बहस में गरमी पैदा कर दी। उनका कहना था कि 70 के बाद की कविताएँ लोक सं कटी हुई शहरी कविताएँ हैं। ये पाठकों को आतंकित करती हैं। हालत यह है कि कवि अपनी कविताएँ याद नहीं रख पाता लेकिन वह चाहता है कि पाठक उसकी कविता को पढ़े और याद रखे। कहानी की भी कमोबेश यही हालत है। आज की कविताओं में गेयता का अभाव है। इसीलिए यह समाज व पाठक से दूर होती जा रही है।

कवि अशोक चन्द्र का कहना था कि लोक को सीमित अर्थ में न देखकर उसे आधुनिक रूप में देखने की जरूरत है। यह लोक गाँवों से लेकर शहरों तक फैला है तथा विकास के इस दौर में उसका इस्तेमाल हुआ लेकिन वह स्वयं हाशिए पर ढ़केल दिया गया है। हाशिये का यह लोक कविता के केन्द्र में आये, कविता में इस लोक की समझ हो तथा कविता इससे संवाद करे, ऐसी ही कविता बड़ी हो सकती है।

संस्कृतिकर्मी प्रतुल जोशी व बुद्धिजीवी अशोक मिश्र ने पंत और निराला का उदाहरण देते हुए कहा कि कविता गेय हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन कविता का लयात्मक होना जरूरी है। कविता विचार को अलग तरीके से कहती है यही उसकी विशिष्टता है। कविता में बुद्धिजीवी जब हावी होता है तो कविता कमजोर हो जाती है। भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं में विचारों की उष्मा के साथ आम आदमी का संघर्ष है और ये रिश्तों की आत्मीयता से पूर्ण हैं।

महिला नेता ताहिरा हसनराघवेन्द्र का कहना था कि स्त्री, घर व परिवार को लेकर कविताओं में पारम्परिक विचार है जिस बारे में कटियारजी को सचेत रहने की जरूरत है। ‘हिजड़ा’ जैसे विशेषण का इस्तेमाल जिस तरह किया गया है, वह उचित नहीं है क्योंकि यह समुदाय मानव समाज का हिस्सा है, उपेक्षित है और गलत नजरिये से इसे देखा गया है। लेकिन आज उनमें भी संघर्ष की चेतना फैल रही है।

कार्यक्रम के अन्त में कवि, कलाकार व अभिनेता निर्मल पाण्डेय के निधन पर जन संस्कृति मंच ने एक मिनट का मौन रखकर अपनी शोक संवेदना प्रकट की। इस मौके पर नाटककार राजेश कुमार ने उनके योगदान की चर्चा की और कहा कि वे नैनीताल के युवमंच और जसम से सांस्कृतिक यात्रा शुरू की थी। बाद में वे कला अभिव्यक्ति के बड़े आयाम की तलाश में मुम्बई तक गये। उनमें कला की बड़ी संभावना थी।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

गोरखपुर फिल्म समारोह

चौतरफा प्रतिरोध की जरूरत-सईद मिर्जा

गोरखपुर। समाज में हाशिए के लोगों और उनके जीवन संघर्षों को संबोधित गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का शुभांरभ गुरूवार को यहां ाड़े ही जोशोखरोश के साथ शुरू हो गया । फिल्म समारोह का उद्घाटन जाने माने फिल्मकार सईद मिर्जा ने किया । इस अवसर पर उनकी दो फिल्मों सलीम लगड़े पे मत रो और अलवर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है प्रदर्शित की गर्इं । सात फरवरी तक चलने वाले इस फिल्मोत्सव के दौरान 5 फ ीचर फिल्में , 6 डाक्यूमेंटरी ओर 3 एनीमेशन फिल्में दिखाई जाएंगी । फिल्मोत्सव के उद्घाटन अवसर पर दास्तानगोई का प्रदर्शन आकर्षण का केन्द्र बना रहा ।

उद्घाटन अवसर पर मिर्जा ने कहा पूंजीवादी वैश्वीकरण के इस दौर में चौतरफा प्रतिरोध की बेहद जरूरत है ,प्रतिरोध का शब्द मुझे बहुत पसंद है । उनका कहना था जो लोकतंत्र आज हमारे सामने है, वह जनता का तंत्र नहीं है । इस लोकतंत्र का पूंजीवाद, स्टाक मार्केट और नेस्ले-कोकाकोला जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ गहरा रिश्ता है । यह तंत्र आम आदमी की आकांक्षाओं,खुशियों और हक अधिकार की आवाज को कुचलने वाला तंत्र है । ऐसे दौर में जनता के दर्द और उम्मीद को अभिव्यक्ति देना भी प्रतिरोध है । कभी न्यू वो सिनेमा ने भी यह काम किया लेकिन 1990 के बाद उदारीकरण के दौर में इस तरह के सिनेमा बनने कम हो गए और फिल्म सोसाइटियां भी खत्म हो गई । इस तरह के सिनेमा के निर्माण में जो मदद मिलती थी, उसे भी सत्ता ने जानबूझ खत्म किया। ऐसी स्थिति में जनसंस्कृति मंच द्वारा जनता के सहयोग से गंभीर और जनपक्षधर फिल्मों के दर्शकों को संगठित करने और इस तरह के फिल्मों के निर्माण का माहौल ानाना काफी उम्मीद जगाता है।

अलवर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है,मोहन जोशी हाजिर हों, सलीम लगड़े पे मत रो और नसीम जैसी चर्चित फिल्में और नुक्कड़,सरकस,ए ट्रिस्ट विथ द पिपुल आफ इंडिया जैसे वृत्तचित्र और धारावाहिक बनाने वाले सईद मिर्जा ने कहा इस देश में कारपोरेट की मदद से भी फिल्म फेस्टिवल होते हैं ,पर वे वहां नहीं जाते।उदघाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि 1990 के बाद वैश्वीकरण के जरिए जो आर्थिक राजनीतिक व्यवस्था बनी ,उसने सिर्फ न्यू वो सिनेमा को ही हाशिए पर डाला,बल्कि ट्रेड यूनियन आंदोलन,किसान आंदोलन,समाज से मूल्यों की दुनिया,नौजवानों के दिलसों में मौजूद आदर्शों की दुनिया को भी हाशिए पर डाला । इतने बड़े मध्य वर्ग के भीतर गरीबों के प्रति करूणा होनी चाहिए थी ,वह भी हाशिए पर गई ।

फिल्मोत्सव क दूसरे दिन की शुरूआत महान फिल्मकार ऋत्विक घटक की क्लासिक फिल्म मेघे ढाका तारा से हुई । यह फिल्म एक स्त्री के अपने पारिवारिक संबंधों के प्रति फर्ज और वेयक्तिक स्ज्ञतर पर प्रेम की स्वाभाविक मानवीय आकांक्षाओं के बीच तीखे द्वंद्व की एक त्रासद दास्तान है । परंपरागत पारिवारिक मूल्य जिसमें सेवा ,कुर्बानी को स्त्रियों के लिए श्रेष्ठता का पैमाना बना दिया जाता है और जहां उनकी ोहद आंतरिक-प्रकृतिक आकांक्षाा को कुचल दिया जाता है, उस रिवाज को यह फिल्म चुनौती देती है। शुक्रवार को दर्शकों को एट माइ डोर स्टेप और आई वंडर नामक दो डाक्यूमेंटरी दिखाई गई । निष्ठा जैन द्वारा निर्देशित एट माइ डोर स्टेप महानगरों के मध्यमवर्गीय-उच्चवर्गीय लोगों के दरवाजे पर रोज दस्तक देने वाले मेहनतकशों यानी कूड़ा उठाने वाले ,घरेलू कामकरने वाले,कूरियर- गार्ड आदि का काम करने वालों की जिंदगी को दर्शाता है।

निरूपमा श्री निवासन निर्देशित डाकयूमेंटरी आई वंडर राजस्थान, सिक्किम ,और तमिलनाडु के ग्रामीण बच्चों की यात्रा और उनके रोजमर्रा के अनुभवों के बीच से दर्शकों को गुजारते हुए शिक्षा की विसंगतियों पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करती है ।बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा किस तरह की होनी चाहिए ,इसकी इस डाक्यूमेंटरी से एक दिशा मिलती है । दूसरे दिन प्रदर्शित आखिरी फिल्म नसीम थी जिसका निर्देशन सईद मिर्जा ने किया है । यह फिल्म आजादी के पहले और बाद के मुस्लिम समाज की त्रासदियों का ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है ।बाबरी ध्वंस के जरिए जिस सेकुलर ढांचे को गहरा नुकसान पहुंचाया गया, उसने मुस्लिम मन पर क्या असर डाला उसकी यह दास्तान है।

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह ने ाताया फिल्मोत्सव में इस बार चित्तो प्रसाद,जैनुल आोदिन,सोमनाथ के चित्रों की प्रदर्शनी भी लगाई गई है ,जिसे अशोक भौमिक और अनुपम ने क्यूरेट किया है । सिंह ने बताया फिल्म समीक्षक- आलोचक जारी मल्ल पारख के आलेख आम आदमी का सिनेमा बनाम सिनेमा का आम आदमी का पाठ भी उत्सव का एक आकर्षण था । पाठ संजीव कुमार ने किया ।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

ये धुआं धुआं अँधेरा

मोहन थपलियाल की याद में हरिओम का कहानी पाठ

कौशल किशोर

‘ये धुआँ धुआँ अंधेरा’ कहानी है त्रासदी की। कहानी है सपने के बुनने और टूटने की। कहानी है हमारे लोकतंत्र व धर्म निरपेक्षता की सच्चाई की। युवा कवि-कथाकार हरिओम की यह कहानी ‘ये धुआँ धुआँ अंधेरा’ की विषय वस्तु साम्प्रदायिक फासीवाद के उभार के द्वारा हमारे समाज के वातावरण को विषाक्त बना दिये जाने पर केन्द्रित है। यह उन मुस्लिम और हिन्दू युवाओं - नसीम, अनीस, जयराज ...की कहानी है जो विभिन्न पृष्ठभूमि से आते हैं, उनके पास अपने सपने हैं लेकिन देश, दुनिया, समाज से रु ब रु होने पर पुराने सपनों की जगह वे नये सपने देखने लगते हैं। लूट, शोषण, दमन, अत्याचार से भरी इस दुनिया को बदलने का संघर्ष उनके अन्दर पैदा होता है। वे साथी बन जाते हैं। अपनी मंडली बन जाती है। वहाँ सवाल, संवेदना, बहसें और विचार की दुनिया है। यहां समाज बदलने का सपना है। जिन्दगी की मुश्किल लड़ाई को लड़ने का जज्बा है। नसीम और जयराज के बीच प्रेम के अंकुर जरूर फूटते हैं लेकिन उसमें साथीपन है। यह साथीपन आधुनिक, प्रगतिशील, स्वतंत्र व समता के विचारों पर आधारित है।

युवाओं के सपनों पर चोटें पड़ती है जब देश के माहौल में धर्म और साम्प्रदायिकता का उभार आता है। मुद्दे बदलते हैं। हिंसा, नफरत और अविश्वास का माहौल पैदा किया जाता है। एक तरफ कान के परदे फाड़ देने वाला शोर है ताकि वेदना की चीखें सुनाई न दे तो दूसरी तरफ खामोशी है इसलिए कि गुनाह बेपरदा न हो जाय। यह दौर है 1992 का जब भगवान के नाम पर बस्तियां जला दी जाती हैं, बड़े पैमाने पर दंगे होते हैं, धर्म निरपेक्षता और लोकतंत्र की होली जलाई जाती है। उन जलाई गई बस्तियों में एक बस्ती नसीम की भी है। वह नसीम जो सुबह की हवा की तरह ताजा थी, अपने विचारों में आधुनिक, स्वतंत्र और संघर्ष के जज्बे से भरी - उसके लिए हिला देने वाली घटना है। उसके अन्दर के प्रतिरोध की ताकत चुकने लगती है। वह अपनी लुटी - पिट्टी बस्ती में वापस लौट जाती है। वह सवाल छोड़ जाती है। यह कहानी पाठक को त्रासदी के गहरे समन्दर में ले जाती है जहाँ उसे लोकतंत्र के सही मायने को समझना है और संघर्ष के नये ताने-बाने बुनने हैं।

हरिओम ने अपनी इस कहानी का प्रभावशाली पाठ किया। मौका था कथाकार, पत्रकार व अनुवादक मोहन थपलियाल की याद में जन संस्कृति मंच (जसम ) द्वारा आयोजित कार्यक्रम का। यह 31 जनवरी को महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के लखनऊ केन्द्र में आयोजित हुआ। कहानी पर अच्छी चर्चा हुइ जिसमें गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव,, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेश कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, नसीम साकेती, चन्द्रेश्वर, वंदना मिश्र, सुशीला पुरी, मालविका, अशोक मिश्र, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, ताहिरा हसन आदि ने भाग लिया।

कुछ वक्ताओं का कहना था कि नसीम का पात्र कृत्रिम व बनावटी लगता है। बेहतर होता अगर उसे प्रेमिका और सिगरेट पीते हुए न पेश किया जाता। इस छवि से वह रोमांटिक ज्यादा लगती है, आन्दोलनकारी कम। वहीं कुछ वक्ताओं का कहना था कि नसीम का सिगरेट पीना कोई नई बात नहीं है और यह पात्र का निजी मामला है। वह अपने विचार व व्यवहार से छात्राओं की नेता भी बनती है। प्रेम और क्रान्ति एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। नसीम और जयराज प्रेम भी करते हैं और बुनकरों की बस्ती में भी जाते हैं। वक्ता इस बात पर सहमत थे कि बाबरी मस्जिद ध्वंस की पृष्ठभूमि पर लिखी यह कहानी हमें गहरे रूप से संवेदित करती है और फासीवाद के भयावह रूप को सामने लाती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए लेखक व पत्रकार अजय सिंह ने कहा कि यह आधुनिक संवेदना की कहानी है। कहानी की पात्र नसीम स्त्री समानता के लिए संघर्ष करती है। पारम्परिक वामपंथी मानसिकता के लिए नसीम का व्यवहार अस्वाभाविक लग सकता है लेकिन वह स्त्री पुरुष समानता पर आधारित आधुनिक विचारों वाली स्त्री है और इस समानता के लिए वह संघर्ष करती है। उत्तर आधुनिकता से अलग उसमें आधुनिक लोकतांत्रिक अकांक्षा की अभिव्यक्ति होती है। कहानी अपने शिल्प में काफी सशक्त और प्रभावकारी है।

जसम के इस कार्यक्रम की शुरूआत मोहन थपलियाल को याद करते हुए हुई। मोहन थपलियाल के साथ के अपने दिनों तथा उनके रचना कर्म को याद करते हुए लेखक अनिल सिन्हा ने कहा कि मोहन में जहाँ गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता थी, वहीं उन्होंने सारी जिन्दगी समझौताविहीन संघर्ष चलाया और उनका रचना कर्म इसी की उपज था। उनके जीवन का संघर्ष हमें बहुत कुछ मुक्तिबोध के संघर्ष की याद दिलाता है। मोहन गंभीर रूप से बीमार हुए और असमय हमारे बीच से चले गये। उनकी चिन्ता थी एक बेहतर समाज को बनाने की। वे फासीवाद विरोधी रचनाकार थे। इसी से उनका रचना संसार निर्मित होता है। फासीवाद विरोधी जर्मन और विदेशी साहित्य खासतौर से ब्रतोल्त ब्रेख्त के साहित्य को हिन्दी के पाठकों तक पहुँचाने का उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया।

इस मौके पर मोहन थपलियाल की पत्नी कमला, बेटी नीति व बेटा उमंग के अलावा बड़ी संख्या में लखनऊ के लेखक व संस्कृतिकर्मी भी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन कवि व जसम, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने किया।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

दिल्ली पुस्तक मेला में जसम का अभियान

जन संस्कृति मंच ने अपने घोषित कार्यक्रम के तहत आज से विश्व पुस्तक मेले में साहित्यकारों और पाठकों के बीच साहित्य के कारपोरेटाइजेशन के खिलाफ अभियान के शुरुआत की। आज पुस्तक मेले के गेट न. 12 पर कवि आलोचक विष्णु खरे, कवि शोभा सिंह, कथाकार योगेन्द्र आहूजा, कवि रंजीत वर्मा, कवि कुमार मुकुल, उद्भावना के संपादक अजेय कुमार, कवि अच्युतानन्द मिश्र, जनमत पत्रिका के संपादक सुधीर सुमन, कवि मुकुल सरल, जसम दिल्ली की सचिव भाषा सिंह, कवि सुनील चौधरी, खालिद, उपेन्द्र, सुलेखा, रूबल, सखी, सहर आदि ने साहित्य अकादमी और सैमसंग के गठजोड़ के मामले में भारत सरकार और संस्कृति मन्त्रालय की भूमिका पर सवाल उठाने वाली तिख्तयां उठा रखी थीं। इसी दौरान आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी इस अभियान के समर्थन में वहां कुछ देर खड़े हुए।

वहां गुजरने वाले साहित्यप्रेमियों और साहित्यकारों को पर्चे भी दिए जा रहे थे, जिनमें राष्ट्रीय साहित्य अकादमी की स्वायत्तता बरकरार रखने, टैगोर सरीखे साहित्यकारों की विरासत की रक्षा करने, अकादमी को कारपोरेट के प्रचार एजेंसी न बनने देने की अपील की गई थी। टैगौर के उद्धरणों वाले पर्चे जिनमें स्वाधीनता के मूल्यों का जिक्र है, भी लोगों को दिए गए।जसम द्वारा यह अभियान पुस्तक मेले में रोजाना 2 बजे से 4 बजे के बीच जारी रहेगा। जो लोग साहित्य अकादमी की स्वायत्तता और उसके लोकतान्त्रिकरण के पक्ष में हैं उन पाठकों और साहित्यकारों के बीच कल से हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जाएगा।
भाषा सिंह सचिव, जनसंस्कृति मंच(जसम)दिल्ली

साहित्य की स्वाधीनता और जन पछधर परम्परा का उपहास

सुधीर सुमन

साहित्य की स्वाधीन और जनपक्षधर परंपरा का उपहास है समसुंग पुरस्कार । सैमसंग कंपनी और साहित्य अकादमी की ओर से दिया जा रहा टैगोर साहित्य पुरस्कार साहित्य की स्वायत्ता, भारतीय साहित्य की गौरवशाली परंपरा और टैगोर की विरासत के ऊपर एक हमला है। देश की तमाम भाषाओं के साहित्यकारों व साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों को इस प्रवृत्ति कासामूहिक तौर पर प्रतिरोध करना चाहिए। साहित्य अकादमी को सत्तापरस्ती और पूंजीपरस्ती से मुक्त किया जाना चाहिए। जिस तरह साहित्य अकादमी ने लेखकों का नाम चयन करके पुरस्कार के लिए समसुंग के पास भेजा है वह भारतीय साहित्यकारों के स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाला कृत्य है और इससे साहित्य अकादमी की स्वायत्तता पर प्रष्नचिह्न लग गया है। क्या अब इस देश की साहित्य अकादमी समसुंग जैसी कंपनियों के सांस्कृतिक एजेंट की भूमिका निभाएगी? यह खुद अकादमी के संविधान का उपहास उड़ाने जैसा है।

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर दिए जाने वाला यह पुरस्कार स्वाधीनता और जनता के लिए प्रतिबद्ध इस देश की लंबी और बेमिसाल साहित्यिक परंपरा पर कुठाराघात के समान है। बेशक देश की ज्यादातर पार्टियां और उनकी सरकारें साम्राज्यवादपरस्ती और निजीकरण की राह पर निर्बंध तरीके से चल रही हैं। देशी पूंजीपति घराने भी साहित्य-संस्कृति को पुरस्कारों और सुविधाओं के जरिए अपना चेरी बना लेने की लगातार कोशिश करते रहे हैं, बावजूद इसके देश के साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों की बहुत बड़ी तादाद अपनी रचनाओं में इनका विरोध ही करती रही है। साहित्य अकादमी और समसुंग के पुरस्कारों के जरिए इस विरोध को ही अगंूठा दिखाने का उपहासजनक प्रयास किया जा रहा है और इसके लिए समय भी सोच समझकर चुना गया है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्यापर पूरे देश को एक तरह का संकेत देने की तरह है कि जैसी साम्राज्यवादपरस्त जनविरोधी अर्थनीति पिछले दो दशक में इस देश पर लाद दी गई है, वैसे ही मूल्यों को साहित्य में प्रश्रय दिया जाएगा और साहित्य अकादमी जैसी अकादमियां इसका माध्यम बनेंगी।

बेशक साहित्य अकादमी सरकारी अनुदान से चलती है, मगर इसी कारण उसे सरकारी संस्कृति का प्रचार संस्थान बनने नहीं दिए जा सकता। जिस पैसे के जरिए यह अकादमी चलती है वह पैसा जनता के खून-पसीने का है और इसीलिए उस संस्था का एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के जश्न का ठेकेदारी ले लेना आपत्तिजनक है। इस पुरस्कार का विरोध करना साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों के साथ-साथ इस देश की जनता का भी फर्ज है।साहित्य अकादमी को और भी स्वायत्त बनाने और सही मायने में एक लोकतां़ित्रक देश की राष्ट्रीय साहित्य अकादमी बनाने की जरूरत है। जिस शर्मनाक ढंग से समसुंग के समक्ष समर्पण किया गया है उसे देखते हुए सवाल खड़ा होता है कि क्या साहित्य अकादमी की विभिन्न समितियों में जो लेखक हैं, वे इस हद तक पूंजीपरस्त हो चुके हैं। उनका यह विवेकहीन निर्णय इस जरूरत को सामने लाता है कि अकादमी को लोकतांत्रिक बनाया जाए और उसे सत्तापरस्ती से मुक्त किया जाए।

टैगोर ने साहित्य-संस्कृति, शिच्चा और विचार को जनता से काटकर इस तरह समसुंग जैसी किसी कंपनी की सेवा में लगाने का काम नहीं किया था। जबकि आज साहित्य अकादमी ठीक इसके विपरीत आचरण कर रही है। यह टैगोर की विरासत के साथ भी दुव्र्यवहार है। देश के तमाम जनपक्षधर साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों और लोकतंत्रपसंद-आजादीपसंद जनमत का ख्याल करते हुए पुरस्कृत लेखकों को भी एक बार जरूर पुनर्विचार करना चाहिए कि वे किन मूल्यों के साथ खड़े हो रहे हैं और इससे वे किनका भला कर रहे हैं। साहित्य मूल्यों और आदर्षों का क्षेत्र है। बेहतर हो कि वे उसके पतन का वाहक न बनें और इस पुरस्कार को ठुकराकर एक मिसाल कायम करें। 25 जनवरी को पुरस्कार समारोह के वक्त अपराह्न 3 बजे जन संस्कृति मंच के सदस्यों समेत दिल्ली के कई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी ओबेराय होटल के सामने जो शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं उसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल होना चाहिए।
सुधीर सुमन, संपादक, समकालीन जनमत, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, जन संस्कृति मंच

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

पंचम तल पर बैठी सरकार को नाटक 'सत भाषे रैदास' बर्दाश्त नहीं

कौशल किशोर

13 जनवरी को लखनऊ के संत गाडगे जी महाराज प्रेक्षागृह ( उत्तर प्रदेश प्रदेश संगीत नाटक अकादामीद्ध में नाटक ‘सत भाषै रैदास’ का मंचन होना था। राजेश कुमार के द्वारा लिखित और निर्देशित इस नाटक को संस्कृति निदेशालय, उ0 प्र0 के सौजन्य से शाहजहाँपुर की नाट्य संस्था ‘अभिव्यक्ति’ को प्रस्तुत करना था। हाड़ कंपाती ठंढ में अभिव्यक्ति, शाहजहाँपुर के कलाकार लखनऊ आये। चालीस कलाकारों के इस नाट्य दल में छोटे-छोटे बाल कलाकार भी शामिल थे। नाट्य दल पूरे उत्साह से नाटक की तैयारी में लगा था। शाम 6.30 बजे से नाटक का मंचन होना था। दर्शक पांच-साढे पांच बजे से ही आने शुरू हो गये और छ बजते-बजते उनकी संख्या सैकड़ों में पहुँच गयी। सारी तैयारी पूरी थी। पर नाटक नहीं हुआ। दर्शकों और कलाकारों के हाथ मात्र निराशा हाथ लगी। हाँ, एक नाटक जरूर मंचित हुआ। वह था प्रदेश के संस्कृति निदेशालय के द्वारा ‘सत भाषै रैदास’ के मंचन को स्थगित करने का नाटक।

दिन का यही कोई डेढ-दो बजे का समय होगा, संस्कृति निदेशालय के उप निदेशक इंदु सिन्हा का नाटक के निर्देशक राजेश कुमार के पास फोन आया कि संस्कृति निदेशालय के निदेशक महोदय नाटक का रिहर्सल देखना चाहते हैं। राजेश कुमार का कहना था कि वे तीन बजे के आस-पास आ जायें, तब तक तैयारी पूरी हो जायेगी। कलाकार नाट्य मंचन को अन्तिम टच देने में लगे थे। करीब ढाई बजा होगा, इंदु सिन्हा का राजेश कुमार के पास फिर फोन आया। उन्होंने सूचित किया कि नाटक का मंचन स्थगित कर दिया गया है। कारण ? बस इतना कि सचिवालय (एनेक्सी) के पंचम तल से नाटक को स्थगित किये जाने का आदेश आया है। इससे ज्यादा वह बता पाने की स्थिति में नहीं थीं। कलाकारों और दर्शकों के रोष की संभावना को देखते हुए बाद में इतना और जोड़ दिया गया कि निदेशालय की ओर से रैदास जयन्ती पर बड़े कार्यक्रम की योजना है। उस अवसर पर इस नाटक का मंचन कराया जायेगा। इसी को देखते हुए मंचन को स्थगित किया गया है।

गौरतलब है कि संस्कृति निदेशालय ने राजेश कुमार के नाटक ‘सत भाषै रैदास’ के स्क्रीप्ट को देखने के बाद ही उसकी मंजूरी दी थी। अलबत्ता उन्होंने स्क्रीप्ट मे थोड़े-बहुत बदलाव करने का प्रस्ताव जरूर किया था। निदेशालय के द्वारा कार्यक्रम का बड़ा सा निमंत्रण पत्र भी छपवाया गया था तथा लखनऊ के अखबारों में विज्ञापन के द्वारा इसका प्रचार भी किया गया था। प्रदेश के संस्कृति मंत्री कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। फिर कुछ घंटे पहले अचानक मंचन को स्थगित कर देना, यह संस्कृति निदेशालय के किस ‘सांस्कृतिक’ व्यवहार को दिखाता है ?

नाट्य मंचन को लेकर परम्परा यह रही है कि चाहे जो भी स्थिति हो नाटक का मंचन जारी रहना चाहिए। मुझे एक घटना याद आती है। मेरे एक मित्र के पिता की घर में लाश पड़ी थी, उसी दिन नाटक का मंचन था लेकिन उन्होंने मंचन नहीं छोड़ा और मंचन के बाद अंतिम क्रिया को सम्पन्न कराया। कलाकारों में ऐसी प्रतिबद्धता होती है। इसीलिए संस्कृति निदेशालय की ओर से नाटक के मंचन को स्थगित किये जाने का जो कारण बताया गया, वह किसी के गले उतरने वाला नहीं था। सो इसका विरोध होना स्वाभाविक था। जन संस्कृति मंच, अलग दुनिया, अस्मिता थियेटर ग्रुप नई दिल्ली, इप्टा, जनवादी लेखक संघ, अमुक आर्टिस्ट ग्रुप, अभिनव कला एकांश, इंकलाबी नौजवान सभा आदि संस्थाओं के साथ-साथ कलाकारों, लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और दर्शकों ने इस निर्णय पर अपना विरोध जताया तथा इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला तथा कला का अपमान बताया। इनका कहना था कि कला और संस्कृति किसी समाज की पहचान होती है। वह समाज के व्यक्तित्व का निर्माण करती है। लेकिन सेस्कृति निदेशालय के इस व्यवहार से यही लगता है कि उनकी नजर में कला व कलाकार और उनका सम्मान कोई महत्व नहीं रखता। वह जैसा चाहे उनके साथ व्यवहार कर सकते हैं। यह मध्ययुगीन सामंती सोच का परिचायक है। विरोध स्वरूप कलाकार प्रेक्षागृह के बाहर गीत गाते रहे और अपना विरोध जताते रहे।

राजेश कुमार का ‘सत भाषै रैदास’ काफी चर्चित नाटक है। इसके अब तक कई मंचन हो चुके हैं। साहित्य कला परिषद, दिल्ली ने 2008 में इसे ‘मोहन राकेश सम्मान से पुरस्कृत भी किया था। यह नाटक रैदास के जीवन वृत के माध्यम से यह दिखाता है कि वर्णाश्रम व्यवस्था, धार्मिक कट्टरता व आर्थिक विषमता के खिलाफ अपने संघर्ष के द्वारा रैदास ने नई सामाजिक चेतना फैलाई थी। वह उस दौर की सबसे बड़ी सामाजिक क्रान्ति थी जिसे दमित करने में ब्राहमणवादियों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। राजेश अपने इस नाटक के द्वारा वर्तमान के जनवादी संघर्ष को मध्ययुग में रैदास जैसे संतों के संघर्ष की परम्परा से जोड़ते हैं जो बुद्ध, फुले, अम्बेडकर से होते हुए नये समतामूलक समाज के निर्माण के जनवादी संघर्ष से आगे बढ़ती है।

संस्कृति निदेशालय राजेश कुमार के इस नाटक के द्वारा चाहता था कि संत रैदास की ऐसी छवि व रूप सामने आये जो मौजूदा सरकार की ‘समरसता’ की अवधारणा के फ्रेम में फिट बैठता हो। इसलिए नाटक के स्क्रीप्ट को लेकर संस्कृति निदेशालय और नाटककार राजेश कुमार के बीच बहस थी। वे इस नाटक के मूल स्क्रीप्ट में कुछ बदलाव चाहते थे। खासतौर से उन अंशों में सुधार-संशोधन चाहते थे जहाँ रैदास ब्राहमणवाद, सवर्ण श्रेष्ठता और सामंती वर्ण व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। इनके विरूद्ध उनका संघर्ष है।

आज मौजूदा प्रदेश सरकार के द्वारा ‘समरसता’ और ‘सर्वजन हिताय’ की जोर-शोर से बात की जा रही है और उन नायकों को जिन्होंने ब्राहमणवाद विरोधी संघर्ष चलाया, उन्हें समरसता के प्रवर्तक के रूप में पेश किया जा रहा है। इस नाटक में भी संस्कृति निदेशालय की यही कोशिश थी कि वे रैदास को समरसता के प्रवर्तक के रूप में पेश करें। ऐसा ही उन्होंने प्रचारित भी किया। वास्तव में मौजूदा व्यवस्था के द्वारा प्रतिपादित यह ‘समरसता’ यथास्थिति का पर्याय है। इस समरसता की धारणा यह है कि समाज अपने मौजूदा सामंजस्य के साथ चले जिसमें ब्राहमण और सवर्ण की सामाजिक व राजनीतिक श्रेष्ठता भी रहे और दलित अपनी सामाजिक स्थितियों के साथ समरस भाव से इस व्यवस्था में शामिल हों। ब्राहमणवाद और सामंतवाद के विरूद्ध कोई वैचारिक आन्दोलन न हो। भूमि सुधार की बात तो बिल्कुल बेमानी है।

नाटक ‘सत भाषै रैदास’ के मंचन को स्थगित करने का आदेश पंचम तल से आया था जो प्रदेश सरकार का केन्द्र है। बुद्ध से लेकर अम्बेडकर जैसे प्रतिष्ठित दलित नायकों की मूर्तियां चैराहों पर लगे। उनके साथ कांशीराम और मायावती भी वहाँ मौजूद रहें। इनके नाम पर पार्क, बस अड्डे, अस्पताल, विश्वविद्यालय बने। ये नायक यहीं रहें। इससे ये बाहर न निकलें और निकले भी तो उस ‘समरसता’ के प्रर्वतक बन कर जो अपने चरित्र में प्रगति विरोधी है। धरती से कटी पंचम तल पर बैठी सरकार को वह रैदास नहीं चाहिए जो चैराहों-चैराहों पर सत्संग लगाता है, जो सड़कों पर संघर्ष का गीत गुनगुनाता है, अपने अधिकार जताता है और नए राज-समाज का सपना देखता है - ‘ऐसा राज चाहूँ मैं, जहाँ मिलै सबन को अन्न’

पंचम तल में बैठी सरकार को अब यह ‘सत भाषे रैदास’ बरदाश्त नहीं। नाटक के मंचन को स्थगित किये जाने की घटना से क्या यही बात सामने नहीं आती है ?