लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और महिला व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के अंक में हिन्दी लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई टिप्पणी तथा उनके लिए प्रयुक्त ‘छिनाल’ जैसे अपमान जनक शब्द पर अपना गहरा विरोध जताया और कहा कि यह महिलाओं के प्रति हिंसा की सोच से प्रेरित है। विभूति नारायण और ‘नया ज्ञनोदय’ के सम्पादक रवीन्द्र कालिया साहित्य में जिस ‘सबसे बेबाक’ की बात कर रहे हैं, वह वास्तव में यौन हिंसा और दबंगई है। महिला सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों की हिफाजत के लिए जरूरी है कि इन प्रवृŸिायों का विरोध हो और इनका सामाजिक व सांस्कृतिक बहिष्कार किया जाय।
यह विचार ‘साहित्य में यौन हिंसा और दबंगई के खिलाफ’ आयोजित संगोष्ठी में उभर कर आया। कार्यक्रम आज यहा राज्य सूचना निदेशालय के सभागार में जन संस्कृति मंच (जसम) अलग दुनिया और प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (येपवा) ने ‘नया ज्ञानोदय’ में महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा हिन्दी लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई अपमानजनक टिप्पणी के परिप्रेक्ष्य में संयुक्त रूप से आयोजित किया था। संगोष्ठी की अध्यक्षता एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने की, वहीं विषय प्रवर्तन किया जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व कवयित्री शोभा सिंह ने। कार्यक्रम का संचालन किया अलग दुनिया के कृष्णकान्त वत्स ने।
इस मौके पर पर विचार रखने वालों में लेखक व पत्रकार अजय सिंह, लेखक शकील सिदिकी , नाटककार राजेश कुमार, ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक डॉ गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव, कथाकार नसीम साकेती, आलोचक चन्द्रेश्वर, कवि व उपन्यासकार वीरेन्द्र सारंग, कवि श्याम अंकुरम, कलाकार मंजु प्रसाद, कवि कौशल किशोर, प्रतुल जोशी आदि प्रमुख रहे।
वक्ताओं का कहना था कि श्री राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस दलित विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नये ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। वक्ताओं ने ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक की भी आलोचना की। उनका कहना था कि समाज व जीवन के ज्वलंत व जरूरी सवालों व सरोकारों से साहित्य को दूर ले जाकर उसे मात्र मसालेदार बनाने की दिशा में रवीन्द्र कालिया काम कर रहे हैं। यह साहित्य की मानवीय भूमिका और उसकी गरिमा को नष्ट करना है। उसे मात्र बाजार व व्यवसाय के माल में बदल देना है।
जसम के संयोजक व कवि कौशल किशोर ने इस अवसर पर एक प्रस्ताव पेश किया जिसे संगोष्ठी में स्वीकार किया गया जिसके माध्यम से माँग की गई कि श्री विभूति नारायण राय का कृत्य आपराधिक है। इसलिए महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहना समाज, साहित्य और संस्कृति के लिए अपमानजनक और घातक है। इन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाय। प्रस्ताव में यह भी माँग की गई कि ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक रवीन्द्र कालिया को भी संपादक से हटाया जाय।
प्रस्ताव के माध्यम से देश भर के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों से अपील की गई है कि मौजूदा स्थिति में वे महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों में भाग न लें, उसका बहिष्कार करें तथा यहाँ की पत्र पत्रिकाओं से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लें। प्रस्ताव में यह भी अपील की गई कि जब तक रवीन्द्र कालिया को सम्पादक के पद से हटाया नहीं जाता तब तक लेखक व संस्कृतिकर्मी ‘नया ज्ञानोदय’ और इस पत्रिका को छापने वाले संस्थान भारतीय ज्ञानपीठ से अपना सम्बन्ध तोड़ लें। स्त्रियों के सम्मान और साहित्य की गरिमा की हिफाजत के लिए यह आवश्यक है।
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बुधवार, 11 अगस्त 2010
गुरुवार, 5 अगस्त 2010
जन संस्कृति मंच
एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ 226017मो: 09807519227,
विभूतिनारायण राय का माफी मांगना बौद्धिक चालबाजी है - एपवा व
जसम
लखनऊ, 05 अगस्त। महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति श्री विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के अंक में स्त्री लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई अपनी टिप्पणी पर माफी मांगने को जन संस्कृति मंच (जसम) और अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) ने महज नाटक बताया है। गौरतलब है कि श्री राय ने यह माफी केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के कहने पर मांगी है। उनकी टिप्पणी का विरोध होने के बाद ‘नया ज्ञानोदय’ को दिये अपने साक्षात्कार में व्यक्त विचारों के पक्ष में उन्होंने जो तर्क व दलीलें पेश की हैं, उसे देखते हुए यह कहीं से नहीं लगता कि उनके सोच और विचार में बदलाव आया है। ऐसे में उनका माफी मांगना मात्र अपनी कुलपति की कुर्सी बचाने की बौद्धिक चालबाजी है।
एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन और जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने आज संयुक्त बयान जारी कर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने श्री राय को दंडित करने की जगह उन्हें बचाने का काम किया है। बयान में कहा गया है कि श्री विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के नये अंक में स्त्री लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई टिप्पणी उनके लिए प्रयुक्त अपमान जनक शब्द न सिर्फ महिलाओं की गरिमा को चोट पहुँचाने वाले अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है बल्कि यह महिलाओं के प्रति हिंसा की सोच से प्रेरित है। श्री राय का यह कृत्य आपराधिक है। इसलिए म गाँ अ हि वि जैसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहना हिन्दी समाज, साहित्य और संस्कृति के लिए अपमानजनक और घातक है। इन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाय।
इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व कवयित्री शोभा सिंह, लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा, नाटककार राजेश कुमार, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा, अलग दुनिया के कृष्णकान्त वत्स, कलाकार मंजु प्रसाद, लेखक श्याम अंकुरम, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, कवि भगवान स्वरूप कटियार, एपवा की विमल किशोर, उमाशील, रंजना यादव, रेणु आदि प्रमुख हैं।
बयान में आगे कहा गया है कि श्री राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस दलित विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नये ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। जसम ने ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक श्री रवीन्द्र कालिया की भी आलोचना की है। लेखक की अपनी स्वतंत्रता है तो सामग्री का चयन सम्पादक की स्वतंत्रता है। लेकिन इस प्रसंग में लगता है कि श्री राय के साथ श्री कालिया की सहमति है अन्यथा ऐसी सामग्री प्रकाशित ही नहीं हो पाती। श्री कालिया इस सम्बन्ध में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। इसलिए जरूरी है कि ‘ज्ञानोदय’ जैसी पत्रिका की गरिमा को बचाने के लिए श्री रवीन्द्र कालिया केा सम्पादक पद से हटाया जाय।
एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ 226017मो: 09807519227,
विभूतिनारायण राय का माफी मांगना बौद्धिक चालबाजी है - एपवा व
जसम
लखनऊ, 05 अगस्त। महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति श्री विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के अंक में स्त्री लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई अपनी टिप्पणी पर माफी मांगने को जन संस्कृति मंच (जसम) और अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) ने महज नाटक बताया है। गौरतलब है कि श्री राय ने यह माफी केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के कहने पर मांगी है। उनकी टिप्पणी का विरोध होने के बाद ‘नया ज्ञानोदय’ को दिये अपने साक्षात्कार में व्यक्त विचारों के पक्ष में उन्होंने जो तर्क व दलीलें पेश की हैं, उसे देखते हुए यह कहीं से नहीं लगता कि उनके सोच और विचार में बदलाव आया है। ऐसे में उनका माफी मांगना मात्र अपनी कुलपति की कुर्सी बचाने की बौद्धिक चालबाजी है।
एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन और जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने आज संयुक्त बयान जारी कर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने श्री राय को दंडित करने की जगह उन्हें बचाने का काम किया है। बयान में कहा गया है कि श्री विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के नये अंक में स्त्री लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई टिप्पणी उनके लिए प्रयुक्त अपमान जनक शब्द न सिर्फ महिलाओं की गरिमा को चोट पहुँचाने वाले अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है बल्कि यह महिलाओं के प्रति हिंसा की सोच से प्रेरित है। श्री राय का यह कृत्य आपराधिक है। इसलिए म गाँ अ हि वि जैसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहना हिन्दी समाज, साहित्य और संस्कृति के लिए अपमानजनक और घातक है। इन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाय।
इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व कवयित्री शोभा सिंह, लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा, नाटककार राजेश कुमार, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा, अलग दुनिया के कृष्णकान्त वत्स, कलाकार मंजु प्रसाद, लेखक श्याम अंकुरम, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, कवि भगवान स्वरूप कटियार, एपवा की विमल किशोर, उमाशील, रंजना यादव, रेणु आदि प्रमुख हैं।
बयान में आगे कहा गया है कि श्री राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस दलित विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नये ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। जसम ने ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक श्री रवीन्द्र कालिया की भी आलोचना की है। लेखक की अपनी स्वतंत्रता है तो सामग्री का चयन सम्पादक की स्वतंत्रता है। लेकिन इस प्रसंग में लगता है कि श्री राय के साथ श्री कालिया की सहमति है अन्यथा ऐसी सामग्री प्रकाशित ही नहीं हो पाती। श्री कालिया इस सम्बन्ध में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। इसलिए जरूरी है कि ‘ज्ञानोदय’ जैसी पत्रिका की गरिमा को बचाने के लिए श्री रवीन्द्र कालिया केा सम्पादक पद से हटाया जाय।
मंगलवार, 3 अगस्त 2010
हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति वी एन राय को बर्खास्त किया जाय
‘ज्ञानोदय’ के सम्पादक रवीन्द्र कालिया को हटाया जाय
लखनऊ, 04 अगस्त। महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति श्री विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के नये अंक में स्त्री लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई टिप्पणी और उनके लिए प्रयुक्त अपमान जनक शब्द न सिर्फ महिलाओं की गरिमा को चोट पहुँचाने वाले अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है बल्कि यह महिलाओं के प्रति हिंसा की सोच से प्रेरित है। श्री राय का यह कृत्य आपराधिक है। इसलिए म गाँ अ हि वि जैसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहना हिन्दी समाज, साहित्य और संस्कृति के लिए अपमानजनक और घातक है। इन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाय।
जन संस्कृति मंच, लखनऊ (जसम) ने आज बयान जारी कर यह माँग की। बयान जारी करने वालों में जसम के संयोजक व कवि कौशल किशोर, जसम की राष्टीय उपाध्यक्ष शोभा सिंह ,लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा, नाटककार राजेश कुमार, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा, कलाकार मंजु प्रसाद, लेखक श्याम अंकुरम, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, कवि भगवान स्वरूप कटियार आदि प्रमुख हैं।
जन संस्कृति मंच का कहना है कि श्री राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनांे हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उनके द्वारा दलित व आदिवासी छात्रों व शिक्षकों को उत्पीड़ित करने, आन्दोलनकारी छात्रों से बातचीत न कर उन्हें सबक सिखाने और आन्दोलन को कुचलने जैसे अलोकतांत्रिक तौर.तरीका अपनाया जाता रहा है। अनिल चमड़िया जैसे लेखक व पत्रकार को भी इसका शिकार होना पड़ा। यही नहीं श्री राय के ऊपर एक खास जाति विशेष के साथ पक्षपात का भी आरोप लगता रहा है। लेकिन खेद की बात है कि हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री राय के इस अलोकतांत्रिक और ब्राहमणवादी व्यवहार के प्रति हिन्दी लेखकों का ‘प्रगतिशील’ व ‘जनवादी’ जमात आम तौर पर चुप्पी साधे रहा है और आज भी यह जमात मामले की लीपा पोती में लगा है।
जन संस्कृति मंच का कहना है कि पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस समाज और संस्कृति विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नये ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। जसम ने ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक श्री रवीन्द्र कालिया की भी आलोचना की है। लेखक की अपनी स्वतंत्रता है तो सामग्री का चयन सम्पादक की स्वतंत्रता है। लेकिन इस प्रसंग में लगता है कि श्री राय के साथ श्री कालिया की सहमति है अन्यथा ऐसी सामग्री प्रकाशित ही नहीं हो पाती। श्री कालिया इस सम्बन्ध में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। इसलिए जरूरी है कि ‘ज्ञानोदय’ जैसी पत्रिका की गरिमा को बचाने के लिए श्री रवीन्द्र कालिया केा सम्पादक पद से हटाया जाय।
कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ
‘ज्ञानोदय’ के सम्पादक रवीन्द्र कालिया को हटाया जाय
लखनऊ, 04 अगस्त। महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति श्री विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के नये अंक में स्त्री लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई टिप्पणी और उनके लिए प्रयुक्त अपमान जनक शब्द न सिर्फ महिलाओं की गरिमा को चोट पहुँचाने वाले अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है बल्कि यह महिलाओं के प्रति हिंसा की सोच से प्रेरित है। श्री राय का यह कृत्य आपराधिक है। इसलिए म गाँ अ हि वि जैसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहना हिन्दी समाज, साहित्य और संस्कृति के लिए अपमानजनक और घातक है। इन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाय।
जन संस्कृति मंच, लखनऊ (जसम) ने आज बयान जारी कर यह माँग की। बयान जारी करने वालों में जसम के संयोजक व कवि कौशल किशोर, जसम की राष्टीय उपाध्यक्ष शोभा सिंह ,लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा, नाटककार राजेश कुमार, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा, कलाकार मंजु प्रसाद, लेखक श्याम अंकुरम, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, कवि भगवान स्वरूप कटियार आदि प्रमुख हैं।
जन संस्कृति मंच का कहना है कि श्री राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनांे हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उनके द्वारा दलित व आदिवासी छात्रों व शिक्षकों को उत्पीड़ित करने, आन्दोलनकारी छात्रों से बातचीत न कर उन्हें सबक सिखाने और आन्दोलन को कुचलने जैसे अलोकतांत्रिक तौर.तरीका अपनाया जाता रहा है। अनिल चमड़िया जैसे लेखक व पत्रकार को भी इसका शिकार होना पड़ा। यही नहीं श्री राय के ऊपर एक खास जाति विशेष के साथ पक्षपात का भी आरोप लगता रहा है। लेकिन खेद की बात है कि हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री राय के इस अलोकतांत्रिक और ब्राहमणवादी व्यवहार के प्रति हिन्दी लेखकों का ‘प्रगतिशील’ व ‘जनवादी’ जमात आम तौर पर चुप्पी साधे रहा है और आज भी यह जमात मामले की लीपा पोती में लगा है।
जन संस्कृति मंच का कहना है कि पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस समाज और संस्कृति विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नये ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। जसम ने ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक श्री रवीन्द्र कालिया की भी आलोचना की है। लेखक की अपनी स्वतंत्रता है तो सामग्री का चयन सम्पादक की स्वतंत्रता है। लेकिन इस प्रसंग में लगता है कि श्री राय के साथ श्री कालिया की सहमति है अन्यथा ऐसी सामग्री प्रकाशित ही नहीं हो पाती। श्री कालिया इस सम्बन्ध में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। इसलिए जरूरी है कि ‘ज्ञानोदय’ जैसी पत्रिका की गरिमा को बचाने के लिए श्री रवीन्द्र कालिया केा सम्पादक पद से हटाया जाय।
कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010
भगवान स्वरूप कटियार का कविता पाठ
‘वह बच्चा मेरी आँखों से दुनिया को देखेगा’
कौशल किशोर
‘मैं वापस कर आया हूँ
उनका दिया हुआ
रोबदार हैट
वजनदार बूट
और तमाम गुनाहों से सनी लथपथ वर्दी
मैं छोड़ आया हूँ
मेज और कुर्सी भी
जिस पर बैठकर
बेबसी में अनचाहे
हमें करने पड़े थे
घटिया और घृणित समझौते
आज खुली हवा में
अपने मित्रों के बीच
सांस लेते हुए
मैं महसूस कर सकता हूँ
जीवन कितना सुन्दर है
ये पंक्तियां हैं भगवान स्वरूप कटियार की कविता ‘मुक्ति का सौंदर्य’ की जिसे उन्होंने राज्य सूचना केन्द्र, हजरतगंज, लखनऊ में जन संस्कृति मंच (जसम ) के द्वारा 21 जनवरी 2010 को आयोजित कार्यक्रम में सुनाई। इसी महीने कवि कटियार साठ साल के हुए और पिछले महीने की 31 तारीख को सूचना विभाग से सहायक निदेशक के पद से सेवामुक्त हुए। जसम ने कार्यक्रम उन्हीं पर केन्द्रित किया था।
इस मौके पर भगवान स्वरूप कटियार ने ‘इक्कीसवीं सदी की बीसवीं सदी के नाम चिट्ठी’, ‘हवा में घुलता आदमी’, ‘जंगल मेरे मित्र’, ‘टुकड़े टुकड़े मौत’, ‘मां’, ‘आदमी होने का व्याकरण’, ‘मेरे न होने पर’ सहित करीब एक दर्जन से अधिक कविताओं का पाठ किया और अपनी कविता के विविध रंगों से श्रोताओं का परिचय कराया। उनकी ये पंक्तियां काफी अन्दर तक संवेदित करती रहीं:
‘मैं खत्म हो जाऊँगा पूरी तरह
यह तय है
हाँ, यकीनन मैं मर जाऊँगा............
पर वह बच्चा
जो मेरी कविता पढ़ रहा है
मेरी आँखों से दुनिया को देखेगा।’
कविता पाठ से पहले भगवान स्वरूप कटियार ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि एक स्वतंत्रचेता रचनाकार के लिए सृजन एक खिलवाड़ न होकर गंभीर दायित्व के निर्वहन की समन्वित प्रक्रिया है। सार्थक रचना सदैव किसी बड़े सरोकार से जुड़ी होती है और इसीलिए वह लोकरुचि से भी जुड़ी होती है। रचनाकार उस लोक की बात जरूर करेगा जिसमें वह साँस ले रहा है। साहित्य की चिन्ता सही फैसले की चिन्ता है जो हमें बड़े चिन्तन के क्षेत्र में ले जाती है। मेरी कविताओं का मकसद न तो कोई नजरिया पेश करना है और न ही राजनैतिक नारों की तरह बेवजह शोर मचाना है। आखिर जीवन मूल्यों, बेहतर जिन्दगी और बेहतर समाज के लिए हमें कुछ कुर्बानियाँ तो देनी ही होगी, जिससे हम आज मुकरने लगे हैं। लिखने-पढ़ने के क्षेत्र में चाहे जितनी प्रतिकूल परिस्थितियाँ हो जायें, रचना और रचनाकार बचे रहेंगे बल्कि समाज को भी बचाये रख सकेंगे -
लिखे जाने से भले हीफर्क न पड़ता हो
पर न लिखे जाने से बहुत फर्क पड़ता है
जैसे बोलने से भले ही फर्क न पड़ता हो
पर चुप्पी तो प्रतिरोध का निषेध है
इसलिए सोचना बोलना
पढ़ना और लिखना परिवर्तन की बुनियादी शर्त है
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक व समीक्षक अनिल सिन्हा ने कहा कि भगवान स्वरूप कटियार को हिन्दी कवि समाज हाशिये पर रखता है। इसका कारण शायद यह है कि रचनाकारों की जो साहित्यिक गोलबंदी है, उसमें कटियार कोई पहल नहीं लेते। वे सच को सीधे कहने का साहस करते हैं जिससे उनकी सामाजिक चिन्ताएँ व सरोकार का पता चलता है। यानी वे एक स्वस्थ-सुसंस्कृत-संवेदनशील और अपने हक के लिए लड़ने वाले समाज की कल्पना करते हैं। उनका काव्य प्रयास इसी तरफ प्रेरित है। तमाम घटनाओं पर वे तत्काल प्रतिक्रिया देते हैं जिससे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सामाजिक सजगता का पता चलता है।
कवि व समीक्षक कौशल किशोर ने भगवान स्वरूप कटियार की कविता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इनकी कविताएँ लोकतांत्रिक चेतना की कविताएं हैं जिसमे लोकतांत्रिक व्यक्ति का संघर्ष, उसकी इच्छा-आकांक्षा की अभिव्यकित होती है। कटियार का व्यक्तित्व बहुत सरल-सहज है, उनकी कविता की दुनिया भी ऐसी ही है, बहुत आत्मीय। इनको पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि यहाँ हमारी ही दुनिया अभिव्यक्त हो रही है। इनकी कविताओं में माँ,, प्रेम, दुख, ख्वाब, दलदल, घर और वह घरती है जो आज निशाने पर है। ये हमारे जटिल यथार्थ की सहज-सरल कविताएँ हैं और यही कटियार की काव्य खासियत है।
इस मौके पर कटियारजी की बेटी युवा लेखिका व पत्रकार प्रतिभा कटियार ने कहा कि बचपन से मैं देखती आई हूँ कि पापा के अन्दर विद्रोही स्वर है। दुख व कष्ट आये हैं लेकिन वे उनसे लड़ते हुए आगे बढ़े है। एक तड़प, कुछ कहने की छटपटाहट तथा विचारों के प्रति दृढता उनमें है। वे हार न मानने वाले ऐसे पिता हैं जिन्होंने मेरे और मेरे भाई के अन्दर संघर्ष की प्रेरणा दी है। यही संघर्ष इनकी रचनाओं में भी अभिव्यक्त होता है। पापा में जबरदस्त आशावाद है।
भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं पर बालते हुए आलोचक चन्द्रेश्वर का कहना था कि ये कविताएँ समकालीन कविता के आज के प्रचलित मुहावरे से अलग हैं। यहाँ दुख की बात कही गयी है लेकिन ये कविताएँ दुखवादी नहीं हैं। यहाँ दुख का दिखावा नहीं हैं। घर परिवार से लेकर देश दुनिया तक के विषय को लेकर चिन्ताएँ हैं, इनका फैलाव है। यह हारती नहीं हैं, संघर्ष की बात करती हैं और बखूबी संप्रेषित होती हैं। चन्द्रेश्वर ने ‘स्त्री और रोटी’ कविता को लेकर सवाल किया कि क्यों रोटी बनाती हुई स्त्री ही सुन्दर लगती है। स्त्री के सौंदर्य को इस रूप में देखना परम्परावादी व पुरुषवादी सोच है।
कवि वीरेन्द्र सारंग ने कहा कि वरिष्ठता के बावजूद कटियार की कविताओं में युवापन है। इनका कथ्य बहुत मजबूत है। इनकी कई कविताओं में ईश्वर आता है लेकिन ईश्वर को लेकर जो विचार, भाव व आलोचना है, वह प्रभावित करता है। वहीं ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव का कहना था कि ब्रेख्त की कविताओं में अंधेरा हावी रहता है लेकिन कटियार की कविताएँ अंधेरे से उजाले की यात्रा करती है।
समकालीन कविता पर कथाकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा की टिप्पणी ने बहस में गरमी पैदा कर दी। उनका कहना था कि 70 के बाद की कविताएँ लोक सं कटी हुई शहरी कविताएँ हैं। ये पाठकों को आतंकित करती हैं। हालत यह है कि कवि अपनी कविताएँ याद नहीं रख पाता लेकिन वह चाहता है कि पाठक उसकी कविता को पढ़े और याद रखे। कहानी की भी कमोबेश यही हालत है। आज की कविताओं में गेयता का अभाव है। इसीलिए यह समाज व पाठक से दूर होती जा रही है।
कवि अशोक चन्द्र का कहना था कि लोक को सीमित अर्थ में न देखकर उसे आधुनिक रूप में देखने की जरूरत है। यह लोक गाँवों से लेकर शहरों तक फैला है तथा विकास के इस दौर में उसका इस्तेमाल हुआ लेकिन वह स्वयं हाशिए पर ढ़केल दिया गया है। हाशिये का यह लोक कविता के केन्द्र में आये, कविता में इस लोक की समझ हो तथा कविता इससे संवाद करे, ऐसी ही कविता बड़ी हो सकती है।
संस्कृतिकर्मी प्रतुल जोशी व बुद्धिजीवी अशोक मिश्र ने पंत और निराला का उदाहरण देते हुए कहा कि कविता गेय हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन कविता का लयात्मक होना जरूरी है। कविता विचार को अलग तरीके से कहती है यही उसकी विशिष्टता है। कविता में बुद्धिजीवी जब हावी होता है तो कविता कमजोर हो जाती है। भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं में विचारों की उष्मा के साथ आम आदमी का संघर्ष है और ये रिश्तों की आत्मीयता से पूर्ण हैं।
महिला नेता ताहिरा हसन व राघवेन्द्र का कहना था कि स्त्री, घर व परिवार को लेकर कविताओं में पारम्परिक विचार है जिस बारे में कटियारजी को सचेत रहने की जरूरत है। ‘हिजड़ा’ जैसे विशेषण का इस्तेमाल जिस तरह किया गया है, वह उचित नहीं है क्योंकि यह समुदाय मानव समाज का हिस्सा है, उपेक्षित है और गलत नजरिये से इसे देखा गया है। लेकिन आज उनमें भी संघर्ष की चेतना फैल रही है।
कार्यक्रम के अन्त में कवि, कलाकार व अभिनेता निर्मल पाण्डेय के निधन पर जन संस्कृति मंच ने एक मिनट का मौन रखकर अपनी शोक संवेदना प्रकट की। इस मौके पर नाटककार राजेश कुमार ने उनके योगदान की चर्चा की और कहा कि वे नैनीताल के युवमंच और जसम से सांस्कृतिक यात्रा शुरू की थी। बाद में वे कला अभिव्यक्ति के बड़े आयाम की तलाश में मुम्बई तक गये। उनमें कला की बड़ी संभावना थी।
कौशल किशोर
‘मैं वापस कर आया हूँ
उनका दिया हुआ
रोबदार हैट
वजनदार बूट
और तमाम गुनाहों से सनी लथपथ वर्दी
मैं छोड़ आया हूँ
मेज और कुर्सी भी
जिस पर बैठकर
बेबसी में अनचाहे
हमें करने पड़े थे
घटिया और घृणित समझौते
आज खुली हवा में
अपने मित्रों के बीच
सांस लेते हुए
मैं महसूस कर सकता हूँ
जीवन कितना सुन्दर है
ये पंक्तियां हैं भगवान स्वरूप कटियार की कविता ‘मुक्ति का सौंदर्य’ की जिसे उन्होंने राज्य सूचना केन्द्र, हजरतगंज, लखनऊ में जन संस्कृति मंच (जसम ) के द्वारा 21 जनवरी 2010 को आयोजित कार्यक्रम में सुनाई। इसी महीने कवि कटियार साठ साल के हुए और पिछले महीने की 31 तारीख को सूचना विभाग से सहायक निदेशक के पद से सेवामुक्त हुए। जसम ने कार्यक्रम उन्हीं पर केन्द्रित किया था।
इस मौके पर भगवान स्वरूप कटियार ने ‘इक्कीसवीं सदी की बीसवीं सदी के नाम चिट्ठी’, ‘हवा में घुलता आदमी’, ‘जंगल मेरे मित्र’, ‘टुकड़े टुकड़े मौत’, ‘मां’, ‘आदमी होने का व्याकरण’, ‘मेरे न होने पर’ सहित करीब एक दर्जन से अधिक कविताओं का पाठ किया और अपनी कविता के विविध रंगों से श्रोताओं का परिचय कराया। उनकी ये पंक्तियां काफी अन्दर तक संवेदित करती रहीं:
‘मैं खत्म हो जाऊँगा पूरी तरह
यह तय है
हाँ, यकीनन मैं मर जाऊँगा............
पर वह बच्चा
जो मेरी कविता पढ़ रहा है
मेरी आँखों से दुनिया को देखेगा।’
कविता पाठ से पहले भगवान स्वरूप कटियार ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि एक स्वतंत्रचेता रचनाकार के लिए सृजन एक खिलवाड़ न होकर गंभीर दायित्व के निर्वहन की समन्वित प्रक्रिया है। सार्थक रचना सदैव किसी बड़े सरोकार से जुड़ी होती है और इसीलिए वह लोकरुचि से भी जुड़ी होती है। रचनाकार उस लोक की बात जरूर करेगा जिसमें वह साँस ले रहा है। साहित्य की चिन्ता सही फैसले की चिन्ता है जो हमें बड़े चिन्तन के क्षेत्र में ले जाती है। मेरी कविताओं का मकसद न तो कोई नजरिया पेश करना है और न ही राजनैतिक नारों की तरह बेवजह शोर मचाना है। आखिर जीवन मूल्यों, बेहतर जिन्दगी और बेहतर समाज के लिए हमें कुछ कुर्बानियाँ तो देनी ही होगी, जिससे हम आज मुकरने लगे हैं। लिखने-पढ़ने के क्षेत्र में चाहे जितनी प्रतिकूल परिस्थितियाँ हो जायें, रचना और रचनाकार बचे रहेंगे बल्कि समाज को भी बचाये रख सकेंगे -
लिखे जाने से भले हीफर्क न पड़ता हो
पर न लिखे जाने से बहुत फर्क पड़ता है
जैसे बोलने से भले ही फर्क न पड़ता हो
पर चुप्पी तो प्रतिरोध का निषेध है
इसलिए सोचना बोलना
पढ़ना और लिखना परिवर्तन की बुनियादी शर्त है
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक व समीक्षक अनिल सिन्हा ने कहा कि भगवान स्वरूप कटियार को हिन्दी कवि समाज हाशिये पर रखता है। इसका कारण शायद यह है कि रचनाकारों की जो साहित्यिक गोलबंदी है, उसमें कटियार कोई पहल नहीं लेते। वे सच को सीधे कहने का साहस करते हैं जिससे उनकी सामाजिक चिन्ताएँ व सरोकार का पता चलता है। यानी वे एक स्वस्थ-सुसंस्कृत-संवेदनशील और अपने हक के लिए लड़ने वाले समाज की कल्पना करते हैं। उनका काव्य प्रयास इसी तरफ प्रेरित है। तमाम घटनाओं पर वे तत्काल प्रतिक्रिया देते हैं जिससे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सामाजिक सजगता का पता चलता है।
कवि व समीक्षक कौशल किशोर ने भगवान स्वरूप कटियार की कविता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इनकी कविताएँ लोकतांत्रिक चेतना की कविताएं हैं जिसमे लोकतांत्रिक व्यक्ति का संघर्ष, उसकी इच्छा-आकांक्षा की अभिव्यकित होती है। कटियार का व्यक्तित्व बहुत सरल-सहज है, उनकी कविता की दुनिया भी ऐसी ही है, बहुत आत्मीय। इनको पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि यहाँ हमारी ही दुनिया अभिव्यक्त हो रही है। इनकी कविताओं में माँ,, प्रेम, दुख, ख्वाब, दलदल, घर और वह घरती है जो आज निशाने पर है। ये हमारे जटिल यथार्थ की सहज-सरल कविताएँ हैं और यही कटियार की काव्य खासियत है।
इस मौके पर कटियारजी की बेटी युवा लेखिका व पत्रकार प्रतिभा कटियार ने कहा कि बचपन से मैं देखती आई हूँ कि पापा के अन्दर विद्रोही स्वर है। दुख व कष्ट आये हैं लेकिन वे उनसे लड़ते हुए आगे बढ़े है। एक तड़प, कुछ कहने की छटपटाहट तथा विचारों के प्रति दृढता उनमें है। वे हार न मानने वाले ऐसे पिता हैं जिन्होंने मेरे और मेरे भाई के अन्दर संघर्ष की प्रेरणा दी है। यही संघर्ष इनकी रचनाओं में भी अभिव्यक्त होता है। पापा में जबरदस्त आशावाद है।
भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं पर बालते हुए आलोचक चन्द्रेश्वर का कहना था कि ये कविताएँ समकालीन कविता के आज के प्रचलित मुहावरे से अलग हैं। यहाँ दुख की बात कही गयी है लेकिन ये कविताएँ दुखवादी नहीं हैं। यहाँ दुख का दिखावा नहीं हैं। घर परिवार से लेकर देश दुनिया तक के विषय को लेकर चिन्ताएँ हैं, इनका फैलाव है। यह हारती नहीं हैं, संघर्ष की बात करती हैं और बखूबी संप्रेषित होती हैं। चन्द्रेश्वर ने ‘स्त्री और रोटी’ कविता को लेकर सवाल किया कि क्यों रोटी बनाती हुई स्त्री ही सुन्दर लगती है। स्त्री के सौंदर्य को इस रूप में देखना परम्परावादी व पुरुषवादी सोच है।
कवि वीरेन्द्र सारंग ने कहा कि वरिष्ठता के बावजूद कटियार की कविताओं में युवापन है। इनका कथ्य बहुत मजबूत है। इनकी कई कविताओं में ईश्वर आता है लेकिन ईश्वर को लेकर जो विचार, भाव व आलोचना है, वह प्रभावित करता है। वहीं ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव का कहना था कि ब्रेख्त की कविताओं में अंधेरा हावी रहता है लेकिन कटियार की कविताएँ अंधेरे से उजाले की यात्रा करती है।
समकालीन कविता पर कथाकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा की टिप्पणी ने बहस में गरमी पैदा कर दी। उनका कहना था कि 70 के बाद की कविताएँ लोक सं कटी हुई शहरी कविताएँ हैं। ये पाठकों को आतंकित करती हैं। हालत यह है कि कवि अपनी कविताएँ याद नहीं रख पाता लेकिन वह चाहता है कि पाठक उसकी कविता को पढ़े और याद रखे। कहानी की भी कमोबेश यही हालत है। आज की कविताओं में गेयता का अभाव है। इसीलिए यह समाज व पाठक से दूर होती जा रही है।
कवि अशोक चन्द्र का कहना था कि लोक को सीमित अर्थ में न देखकर उसे आधुनिक रूप में देखने की जरूरत है। यह लोक गाँवों से लेकर शहरों तक फैला है तथा विकास के इस दौर में उसका इस्तेमाल हुआ लेकिन वह स्वयं हाशिए पर ढ़केल दिया गया है। हाशिये का यह लोक कविता के केन्द्र में आये, कविता में इस लोक की समझ हो तथा कविता इससे संवाद करे, ऐसी ही कविता बड़ी हो सकती है।
संस्कृतिकर्मी प्रतुल जोशी व बुद्धिजीवी अशोक मिश्र ने पंत और निराला का उदाहरण देते हुए कहा कि कविता गेय हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन कविता का लयात्मक होना जरूरी है। कविता विचार को अलग तरीके से कहती है यही उसकी विशिष्टता है। कविता में बुद्धिजीवी जब हावी होता है तो कविता कमजोर हो जाती है। भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं में विचारों की उष्मा के साथ आम आदमी का संघर्ष है और ये रिश्तों की आत्मीयता से पूर्ण हैं।
महिला नेता ताहिरा हसन व राघवेन्द्र का कहना था कि स्त्री, घर व परिवार को लेकर कविताओं में पारम्परिक विचार है जिस बारे में कटियारजी को सचेत रहने की जरूरत है। ‘हिजड़ा’ जैसे विशेषण का इस्तेमाल जिस तरह किया गया है, वह उचित नहीं है क्योंकि यह समुदाय मानव समाज का हिस्सा है, उपेक्षित है और गलत नजरिये से इसे देखा गया है। लेकिन आज उनमें भी संघर्ष की चेतना फैल रही है।
कार्यक्रम के अन्त में कवि, कलाकार व अभिनेता निर्मल पाण्डेय के निधन पर जन संस्कृति मंच ने एक मिनट का मौन रखकर अपनी शोक संवेदना प्रकट की। इस मौके पर नाटककार राजेश कुमार ने उनके योगदान की चर्चा की और कहा कि वे नैनीताल के युवमंच और जसम से सांस्कृतिक यात्रा शुरू की थी। बाद में वे कला अभिव्यक्ति के बड़े आयाम की तलाश में मुम्बई तक गये। उनमें कला की बड़ी संभावना थी।
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
साहित्य की स्वाधीनता और जन पछधर परम्परा का उपहास
सुधीर सुमन
साहित्य की स्वाधीन और जनपक्षधर परंपरा का उपहास है समसुंग पुरस्कार । सैमसंग कंपनी और साहित्य अकादमी की ओर से दिया जा रहा टैगोर साहित्य पुरस्कार साहित्य की स्वायत्ता, भारतीय साहित्य की गौरवशाली परंपरा और टैगोर की विरासत के ऊपर एक हमला है। देश की तमाम भाषाओं के साहित्यकारों व साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों को इस प्रवृत्ति कासामूहिक तौर पर प्रतिरोध करना चाहिए। साहित्य अकादमी को सत्तापरस्ती और पूंजीपरस्ती से मुक्त किया जाना चाहिए। जिस तरह साहित्य अकादमी ने लेखकों का नाम चयन करके पुरस्कार के लिए समसुंग के पास भेजा है वह भारतीय साहित्यकारों के स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाला कृत्य है और इससे साहित्य अकादमी की स्वायत्तता पर प्रष्नचिह्न लग गया है। क्या अब इस देश की साहित्य अकादमी समसुंग जैसी कंपनियों के सांस्कृतिक एजेंट की भूमिका निभाएगी? यह खुद अकादमी के संविधान का उपहास उड़ाने जैसा है।गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर दिए जाने वाला यह पुरस्कार स्वाधीनता और जनता के लिए प्रतिबद्ध इस देश की लंबी और बेमिसाल साहित्यिक परंपरा पर कुठाराघात के समान है। बेशक देश की ज्यादातर पार्टियां और उनकी सरकारें साम्राज्यवादपरस्ती और निजीकरण की राह पर निर्बंध तरीके से चल रही हैं। देशी पूंजीपति घराने भी साहित्य-संस्कृति को पुरस्कारों और सुविधाओं के जरिए अपना चेरी बना लेने की लगातार कोशिश करते रहे हैं, बावजूद इसके देश के साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों की बहुत बड़ी तादाद अपनी रचनाओं में इनका विरोध ही करती रही है। साहित्य अकादमी और समसुंग के पुरस्कारों के जरिए इस विरोध को ही अगंूठा दिखाने का उपहासजनक प्रयास किया जा रहा है और इसके लिए समय भी सोच समझकर चुना गया है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्यापर पूरे देश को एक तरह का संकेत देने की तरह है कि जैसी साम्राज्यवादपरस्त जनविरोधी अर्थनीति पिछले दो दशक में इस देश पर लाद दी गई है, वैसे ही मूल्यों को साहित्य में प्रश्रय दिया जाएगा और साहित्य अकादमी जैसी अकादमियां इसका माध्यम बनेंगी।
बेशक साहित्य अकादमी सरकारी अनुदान से चलती है, मगर इसी कारण उसे सरकारी संस्कृति का प्रचार संस्थान बनने नहीं दिए जा सकता। जिस पैसे के जरिए यह अकादमी चलती है वह पैसा जनता के खून-पसीने का है और इसीलिए उस संस्था का एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के जश्न का ठेकेदारी ले लेना आपत्तिजनक है। इस पुरस्कार का विरोध करना साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों के साथ-साथ इस देश की जनता का भी फर्ज है।साहित्य अकादमी को और भी स्वायत्त बनाने और सही मायने में एक लोकतां़ित्रक देश की राष्ट्रीय साहित्य अकादमी बनाने की जरूरत है। जिस शर्मनाक ढंग से समसुंग के समक्ष समर्पण किया गया है उसे देखते हुए सवाल खड़ा होता है कि क्या साहित्य अकादमी की विभिन्न समितियों में जो लेखक हैं, वे इस हद तक पूंजीपरस्त हो चुके हैं। उनका यह विवेकहीन निर्णय इस जरूरत को सामने लाता है कि अकादमी को लोकतांत्रिक बनाया जाए और उसे सत्तापरस्ती से मुक्त किया जाए।
टैगोर ने साहित्य-संस्कृति, शिच्चा और विचार को जनता से काटकर इस तरह समसुंग जैसी किसी कंपनी की सेवा में लगाने का काम नहीं किया था। जबकि आज साहित्य अकादमी ठीक इसके विपरीत आचरण कर रही है। यह टैगोर की विरासत के साथ भी दुव्र्यवहार है। देश के तमाम जनपक्षधर साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों और लोकतंत्रपसंद-आजादीपसंद जनमत का ख्याल करते हुए पुरस्कृत लेखकों को भी एक बार जरूर पुनर्विचार करना चाहिए कि वे किन मूल्यों के साथ खड़े हो रहे हैं और इससे वे किनका भला कर रहे हैं। साहित्य मूल्यों और आदर्षों का क्षेत्र है। बेहतर हो कि वे उसके पतन का वाहक न बनें और इस पुरस्कार को ठुकराकर एक मिसाल कायम करें। 25 जनवरी को पुरस्कार समारोह के वक्त अपराह्न 3 बजे जन संस्कृति मंच के सदस्यों समेत दिल्ली के कई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी ओबेराय होटल के सामने जो शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं उसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल होना चाहिए।
सुधीर सुमन, संपादक, समकालीन जनमत, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, जन संस्कृति मंच
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