मंगलवार, 1 जून 2010

वीरेन्द्र सारंग का कविता पाठ


‘‘मोती अब मिलता नहीं/मोती अब लिखता नहीं’’

कौशल किशोर

‘ये कैसा रिश्ता/कैसा मन/उनके जैसा मेरा तन/उनकी अम्मा गाँव की अम्मा/मेरी माँ धोबन’ ये पंक्तियाँ हैं हिन्दी के जाने माने कवि वीरेन्द्र सारंग की कविता ‘कैसा रिश्ता कैसा मन‘ की जिसका पाठ उन्होंने लखनऊ के श्रोताओं के बीच किया। जन संस्कृति मंच ने वीरेन्द्र सारंग के एकल कविता पाठ और उस पर बातचीत का कार्यक्रम महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय के महानगर स्थित लखनऊ केन्द्र के सभागार में 23 मई को आयोजित किया था।

इस मौके पर वीरेन्द्र सारंग ने ‘गाती हुई चिड़िया’, ‘छन्ना’, ‘ले लो आम और भी सामान !’, ‘मोती लाल लिखता रहा’, ’अलगनी का कपड़ा’, ‘मतदान के पहले और बाद में’ सहित करीब अपनी एक दर्जन कविताएँ सुनाईं और अपनी कविता के विविध रंगों से श्रोताओं का परिचय कराया जो कस्बाई और हमारे लोक जीवन के रस।रंग, मुहावरे, लोक संस्कृति के तत्व अपने में लिए हुए हैं। परम्परा के प्रति मोह है लेकिन ये परम्परावादी नहीं हैं। यहां रिश्ते हैं, लेकिन ये निरपेक्ष नहीं हैं। शोषण व गैरबराबरी पर टिके इस समाज में ये निरपेक्ष हो भी नहीं सकते हैं। ‘मैं बनूँ पुष्कल’ की उन्मुक्त चाह घुटती रहती है। इसीलिए सारंग स्वतंत्रता के गीत गाते हैं। ‘झट बक दूँगी/मैं तो चिड़िया हूँ/मैंने जो देखी कथा, जैसी की वैसी !’ इसीलिए वीरेन्द्र सारंग के बारे में यह कहना ज्यादा सही लगता है कि ये स्वतंत्रता के गायक हैं। लोक संस्कृति इनकी कविता की ताकत है।

वीरेन्द्र सारंग की कविताओं में आम आदमी की पीड़ा और त्रासदी का बयान भी हैं और ‘मोती लाल....’ की पक्तियाँ तो हमारे दिल में उतर जाती हैं - ‘मोती लाल को ह्नेल ने निगल लिया/अमरनाथ की यात्रा में गल गया/दुर्घटनाग्रस्त रेल डिब्बे में उलझ गया/साबरमती में ठगा गया/संसद की दर्शकदीर्घा में छला गया.......मोती अब मिलता नहीं/मोती अब लिखता नहीं’।

कविता पाठ के बाद इन पर बातचीत भी हुई। आलोचक चन्द्रेश्वर ने कहा कि ये सामाजिक चिन्ताओं की कविताएँ हैं जिनमें से ज्यादातर ग्रामीण लोक से लेकर शहरी लोक के बीच फैली हैं। ये ऐसे दौर की कविताएँ हैं जब इन्सानी भूख विकराल होती जा रही है। कहीं ‘मोती लाल के पत्र’ के जरिये तो कहीं ‘बीजन लाल...’ के बहाने ये कविताएँ समय की सचाइयों से रु ब रु कराती हैं। ये संवादधर्मी हैं। इनकी कविताओं में भले ही निराशा दिख जाय लेकिन ये अन्ततः साथ मिलकर कुछ नया गढ़ने की भी बात करती हैं।

कार्यक्रम का संचालन जसम के संयोजक व कवि कौशल किशोर ने किया। उनका कहना था कि वीरेन्द्र सारंग की कविताओं में उनके अनुभव की दुनिया है। हमारा जीवन छोटी।छोटी चीजों के बीच पलता है, बढ़ता है। सारंग इन्हें अपनी कविता का विषय बनाते हैं, इन छोटी.छोटी चीजों के महत्व को उदघाटित करते चलते हैं। ‘छन्ना’ ऐसी ही कविता है। इसकी यात्रा पेट से शुरू होती है, दिमाग से गुजरती है और आगे बढ़ती है।

इस मौके पर लेखक व समीक्षक अनिल सिन्हा ने कहा कि हिन्दी कविता की सुपरिचित तस्वीर से अलग वीरेन्द्र सारंग एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जिसमें शहर और गाँव गड्ड मड्ड से हो गये हैं। भरतीय लोकतंत्र की तस्वीर जैसा धूमिल ने पेश किया, सारंग उसकी ओर जाते हैं लेकिन इनकी कविताओं को पढ़ते।सुनते समय धूमिल तो याद आते हैं पर गोरख पाण्डेय नहीं।

वीरेन्द्र सारंग की कविताओ पर ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि बाजार और पूँजी ने जिस अमानवीयता को फैलाया है, सारंग की कविताएँ उनसे मुठभेड़ करती हैं। इनकी कविताओं के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि कविता कोई रसायनिक दवा नहीं जो तुरन्त परिवर्तन ला दे, यह तो आँवले के उस फल की तरह है जिसका असर धीमा होता है पर यह ज्यादा स्थाई होता है।

कवि भगवान स्वरूप कटियार, लेखक रवीन्द्र कुमार सिन्हा, कवयित्री व कथाकार रंजना जयसवाल, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा आदि ने भी अपने विचार रखे। इस कार्यक्रम में वन्दना मिश्र, पूनम सिंह, शकील सिद्दीकी, राजेश कुमार, मृदुला भारद्वाज, नसीम साकेती, सुरेश पंजम, श्याम अंकुरम, विमल किशोर, राघवेन्द्र, बी एम प्रसाद, राजेन्द्र वर्मा, धर्मेन्द्र, गंगा प्रसाद आदि सहित बड़ी संख्या में लेखकों व संस्कृतिकर्मियों ने शिरकत की।

सोमवार, 17 मई 2010

लोक रंग -- २०१०


फूहड़पन व भड़ैती के विरुद्ध सांस्कृतिक पहल

कौशल किशोर
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से लेकर इससे सटे बिहार तक फैली पूरब की इस पट्टी में इन दिनों एक नई सांस्कृतिक चेतना करवट लेती हुई देखी जा सकती है। यहाँ एक नया प्रयोग देखने को मिल रहा है, वह है लोककला को आधुनिक कला और बौद्धिक समुदाय को गंवई जनता के साथ जोड़ने का। कला और संस्कृति को जन से जोड़ने की बात बहुत की जाती है लेकिन इसका मूर्त रूप हमें ‘लोक रंग’ में देखने को मिलता है जो पिछले तीन सालों से गौतमबुद्ध की निर्वाण स्थली कुशीनगर से करीब बीस किलोमीटर दूर जोगिया जनूबी पट्टी में आयोजित हो रहा है।

जोगिया हिन्दी कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा का गाँव है। सुभाष और आशा कुशवाहा तथा इस गाँव के नौजवानों के संयोजन में लोक रंग सांस्कृतिक समिति ने 8 व 9 मई को ‘लोक रंग - 2010’ का आयोजन किया जिसे देखने-सुनने के लिए अगल-बगल के गाँवों से बड़ी संख्या में लोग आये। इस गाँव की गलियों, दीवारों, अनाज रखने वाले बखारों और पेड़-पौधों को विभिन्न कलाकृतियों तथा मुक्तिबोध, त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर, धूमिल, गोरख पाण्डेय, वीरेन डंगवाल जैसे कवियों के कविता पोस्टर से सजाया गया था। अपना गाँव साफ-सुथरा व सुन्दर दिखे, इसके लिए समिति के नौजवानों के साथ स्त्री.पुरुष सभी जुटे थे। यह जोगिया में उभरती समरसता व साथीपन की नई संस्कृति है जिसकी गँूज दूर तक सुनी जायेगी और यहाँ पहुँचे कलाकार इसे लम्बे समय तक याद रखेंगे।

इस बार के दो दिवसीय कार्यक्रम की खासियत यह रही कि क्षेत्रीय लोक कलाकारों के साथ छतीसगढ़ व बुन्देलखण्ड के लोक कलाकार व मण्डलियाँ भी आईं। अच्छी-खासी संख्या में हिन्दी, उर्दू व भोजपुरी के लेखक व बुद्धिजीवी जुटे। दो दिनों तक चले इस कार्यक्रम में लोककलाओं, लोक नृत्य, लोकगीतों व नाटकों का प्रदर्शन हुआ तथा ‘लोकगीतों की प्रासंगिकता’ विषय पर विचार गोष्ठी भी हुई। इस आयोजन के द्वारा यह विचार मजबूती से उभरा कि लोक संस्कृति की जन पक्षधर धारा को आगे बढ़ाकर ही अपसंस्कृति का मुकाबला किया जा सकता है।

‘लोक रंग - 2010’ की मुख्य अतिथि थीं बांग्ला की मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी लेकिन अचानक स्वास्थ्य खराब हो जाने की वजह से वे नहीं पहुँच पाईं। उन्होंने फैक्स से अपना संदेश भेजा जिसे पढ़ा गया और इसी से समारोह की शुरुआत हुई। नाटककार हृषीकेश सुलभ और आलोचक वीरेन्द्र यादव ने शाल ओढ़ाकर और स्मृति चिन्ह देकर भोजपुरी कवि अंजन और रामपति रसिया का सम्मान किया।
इस मौके पर हिन्दी कथाकार शिवमूर्ति ने लोक संस्कृति की पुस्तक ‘लोकरंग-2’ (संपादन-सुभाष चन्द्र कुशवाहा ) का लोकार्पण करते हुए कहा कि हमारे यहाँ लोक संस्कृति की मजबूत परम्परा रही है। पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक फैले इस क्षेत्र में जनता के दुख दर्द व संघर्ष यहाँ के लोक नाटकों व लोक गीतों में अभिव्यक्त होता रहा है लेकिन आज फूहड़पन और भड़ैती से भोजपुरी की पहचान बनाई जा रही है। अश्लील भोजपुरी फिल्मों व गीतों की तो बाढ़ आ गई है। बाजार की शक्तियों ने लोकगीतों को अपने मुनाफे का साधन बना दिया है और लोक संस्कृति को नष्ट कर इसे बाजार की वस्तु में तब्दील किया जा रहा है। ऐसे समय में ‘लोक रंग’ का आयोजन अपसंस्कृति के विरुद्ध वैकल्पिक संस्कृति का आन्दोलन है।

शिवमूर्ति ने लोक संस्कृति के संदर्भ में जिस खतरे और संकट की ओर संकेत किया, इसी विचार और भावना का विस्तार संगोष्ठी में था। भले ही विचार गोष्ठी का विषय ‘लोकगीतों की प्रसंगिकता’ रहा हो लेकिन ज्यादातर बहस इसके इर्द-गिर्द ही घूमती रही। लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा की अध्यक्षता में हुई इस विचार गोष्ठी का संचालन युवा आलोचक सुधीर सुमन ने किया। संगोष्ठी को संबोधित करने वालों में दिनेश कुशवाहा, तैयब हुसैन, शिवमूर्ति, राजेश कुमार, अरुणेश नीरन, हृषीकेश सुलभ, देवेन्द्र, वीरेन्द्र यादव आदि लेखक प्रमुख थे।

वक्ताओं का कहना था कि लोकगीत ऐसा लोक काव्य रूप है जिसके माध्यम से श्रमशील जनता अपना दुख-दर्द, हर्ष-विषाद, संघर्ष अभिव्यक्त करती रही है। महिलाओं के लिए तो लोकगीत उन्हें अपनी पीड़ा का बयान करने का माध्यम रहा है। आज की तरह का उसमें स्त्री विमर्श भले न हो लेकिन उसमें उनके जीवन का विमर्श जरूर मौजूद है जो काफी मर्मस्पर्शी है।

वक्ताओं की इस बात से असहमति थी कि लोक कलारूपों की एक निश्चित उम्र होती है और समय के साथ उनकी प्रसंगिकता समाप्त हो जाती है। इसके बरक्स वक्ताओं का कहना था कि लोकगीतों की धारा विकासमान है जो समय के साथ विकसित होती है। समाज की संस्कृति पर जिस तरह शासक संस्कृति का असर मौजूद रहता है, उसी तरह लोकगीतों पर भी उसका प्रभाव रहा है। लेकिन जनजीवन और संघर्ष से जुड़ना लोकगीतों की खासियत रही है। जन संस्कृति के मजबूत तत्व इसमें मौजूद हैं जिसका विकास गोरख पाण्डेय, रमताजी, विजेन्द्र अनिल, महेश्वर आदि के गीतों में देखने को मिलता है।

कवि दिनेश कुशवाहा के संचालन में दो दिनों तक चले लोक संस्कृति के इस समारोह में रानी शाह व साथियों के द्वारा छठ गीत, रमाशंकर विद्रोही द्वारा कविता पाठ, रामऔतार कुशवाहा व उनके साथियों के द्वारा अचरी गायन, गोपालगंज ;बिहारद्ध की टीम के द्वारा फरी नृत्य, गुड़ी संस्था द्वारा छŸाीसगढ़ी लोकगीत, सियाराम प्यारी व रामरती कुशवाहा आदि के द्वारा बृजवासी गायन व नृत्य, राम आसरे व साथियों के द्वारा ईसुरी फाग गायकी, राम प्यारे भारती, उपेन्द्र चतुर्वेदी, मंगल मास्टर, अंटू तिवारी आदि के द्वारा भोजपुरी गीतों का गायन, जितई प्रसाद व उनकी टीम द्वारा हुड़का नृत्य, चिखुरी व उनकी टीम द्वारा पखावज नृत्य, असगर अली व साथियों द्वारा कौव्वाली आदि प्रस्तुत किया गया।

इस मौके पर छŸाीसगढ़ की सांस्कृतिक संस्था ‘गुड़ी’, छत्तीसगढ़ लोक कला व लोक संस्कृति के संवर्द्धन में सक्रिय है, ने ‘बाबा पाखण्डी’ का मंचन किया। इस नाटक के लेखक व निर्देशक डॉ योगेन्द्र चौबे हैं। इप्टा, पटना ने भिखारी ठाकुर के चर्चित नाटक ‘गबरघिचोरन के माई’ का मंचन किया। ‘बाबा पाखण्डी’ सामाजिक विद्रूपता व पतन को छŸाीसगढ़ी लोक नाट्य शैली में प्रस्तुत करता है। छŸाीसगढ़ी में होने के बावजूद यहाँ नाटक की संप्रेषणीयता में कोई बाधा नहीं है। ‘गबरघिचोरन के माई’ नाटक बढ़ती हुई स्वार्थपरता व अमानवीयता को सामने लाता है।

‘लोक रंग’ ने कोई तीन साल पहले पूर्वांचल में मौजूद गायन, वादन, नृत्य, साहित्य आदि के कला रूपों को भड़ैती व फूहड़पन से बचाने और जन पक्षधर संस्कृति के संवर्द्धन के उद्देश्य से अपनी यात्रा शुरू की थी। आज वह छŸाीसगढ़ व बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृतियों को अपने साथ जोडने में सफल हुआ है। इस तरह ‘लोक रंग’ विविध लोक संस्कृतियों के समागम का मंच बनकर उभर रहा है। इसका स्वागत होना चाहिए। फिर भी एक चीज जो बार बार ‘लोक रंग - 2010’ में खटकती रही, वह है लोकगीतों के नाम पर छठ गीत और धार्मिक प्रभाव वाले गीत। आज ये कहीं से भी प्रसंगिक नहीं हैं। इनसे हमें मुक्त होने की जरूरत है। जन पक्षधर संस्कृति के संवर्द्धन के लिए यह जरूरी भी है।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

वीरेंद्र सारंग और उनकी कवितायेँ




वीरेन्द्र सारंग (जन्म : 12 जनवरी 1959) हिन्दी के ऐसे रचनाकार हैं जो कविता, कहानी, उपन्यास, समीक्षा आदि कई विधाओं में लगातार सक्रिय हैं। 1993 में उनका पहला कविता संग्रह ‘कोण से कटे हुए ’ प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह में सारंग की करीब 38 कविताएँ संकलित हैं। अपने पहले संग्रह की कविताओं के द्वारा सारंग का जो काव्य व्यक्त्वि हमारे सामने आया, उनके दूसरे संग्रह ‘हवाओं ! लौट जाओ’ (2004) तक पहुँचते-पहुँचते उसमें विचार व कला के स्तर पर परिपक्वता का दर्शन होता है। वीरेन्द्र सारंग का यह संग्रह उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मानित भी हुआ। अच्छी बात यह है कि वीरेन्द्र सारंग रचना व विचार की दुनिया में तो सक्रिय हैं ही, सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में उनकी बढ़ती सकियता ने उनके रचना व अनुभव संसार का विस्तार किया है। यह उनके चर्चित उपन्यास ‘वज्रांगी’ और हाल की रचनाओं में देखने को मिलता है। अपनी रचनाओं के द्वारा सारंग ऐसे संसार का निर्माण करते हैं जो हमें मानवीय और संवेदनशील बनाता है।


वीरेन्द्र सारंग की कविताओं में उनके अनुभव की दुनिया है। हमारा जीवन छोटी-छोटी चीजों के बीच पलता है, बढ़ता है। प्रतीत होता है कि ये चीजें बहुत महत्व लिए नहीं है लेकिन सारंग इन्हें अपनी कविता का विषय बनाते हैं, इन छोटी-छोटी चीजों के महत्व को उदघाटित करते चलते हैं। ‘छन्ना’ ऐसी ही कविता है। यह छन्ना नया अर्थ देता है। इसकी यात्रा पेट से शुरू होती है, दिमाग से गुजरती है और आगे बढ़ती है। छोटी-छोटी चीजों या उपेक्षितों से बनी यह दुनिया ही वीरेन्द्र सारंग की दुनिया है, इनका सौन्दर्य ही कविता का सौन्दर्य है।


वीरेन्द्र सारंग की कविताएँ इस अर्थ में आज की कविता में अपनी अलग पहचान बनाती हैं कि ये कस्बाई और हमारे लोक जीवन के रस-रंग, मुहावरे, लोक संस्कृति के तत्व अपने में लिए हुए हैं। परम्परा के प्रति मोह है लेकिन ये परम्परावादी नहीं हैं। यहां रिश्ते हैं, लेकिन ये निरपेक्ष नहीं हैं। शोषण व गैरबराबरी पर टिके इस समाज में ये निरपेक्ष हो भी नहीं सकते हैं। ‘मैं बनूँ पुष्कल’ की उन्मुक्त चाह घुटती रहती है। इसीलिए सारंग स्वतंत्रता के गीत गाते हैं। ‘कथा, जैझट बक दूँगी/मैं तो चिड़िया हूँ/मैंने जो देखी कथा , जैसी की वैसी !’ इसीलिए वीरेन्द्र सारंग के बारे में यह कहना ज्यादा सही लगता है कि ये स्वतंत्रता के गायक हैं। लोक संस्कृति इनकी ताकत है।

कैसा रिश्ता कैसा मन


ये कैसा रिश्ता
कैसा मन
उनके जैसा मेरा तन
उनकी अम्मा गाँव की अम्मा
मेरी माँ धोबन !

उनके द्वारे आम, पपीता
घर, गऊ गोबर से लीपा
मेरे द्वारे ताड़, खजूर
अगल बगल -बेर, बबूल
ताड़ी पीयें, नंगे नाचें,
उल्टी कर दें ..........
फिर तो - रे डोमवा !
रे मेहतरवा !
साफ कर दे
यह आदेश, सम्बोधन

उनके बच्चे हगते
मेरे घर के पिछवाडे़
मेरे बच्चे दूर किनारे
मुखिया जी को लाज न आई
वहीं बैठे जहाँ भौजी, माई
खुराफात नाधे रहते
क्हते - गऊ कसम हम गोसाईं
तरह-तरह के लोभ लीपे चाटे
तरह-तरह उदबोधन

मुर्दा पशु का चमड़ा छीला
देखा, उसमें मेरी कविता
देखा, धरती पीली आकाश नीला
अक्षर फुदकते मांस-मांस में
आँख-आँख में सरिता
वाक्य बनाते हड्डी.हड्डी
कुत्ते भौंके, गिद्ध मँडराये, कौए डटे
जो डरे किनारे खड़े लिए यौवन।
हम आड़े तिरछे घर को भागे
गोड़ में चफन गया टट्टी-गोबर
‘काकू रास्ते में बचना तुझको आया नहीं
--- बेटी बोली, उठा लाई भीगा एक पन्ना
मेरी रचना, धूप दिखाई और सुखाई
खोज-खोज पढ़ने लगी, यह सुन्दर उत्पल
मैं बनूँ पुष्कल......
दादी ने डाँटा --- अरे भाग अन्दर
उत्पल की बच्ची देख !
दरवाजे अनजान मुछन्दर
कई बरस से ताक में है
कब आये जोबन
ये कैसा रिश्ता, कैसा मन।


गाती हुई चिड़िया

होने लगी बात कैसी- कैसी
खुले आम !
गा रही वह चिड़िया
इसकी ऐसी की तैसी!

ससुरी!
कविता सुनायेगी इस सदी कों
मेरे रहते...........
क्या वही सुघर- सालोनीभाएगी
मन को मारे रहते........ इतनी ढीठ!
राजा के किस्से कहेगी
इस बड़े हिस्से में रहेगीअरे
गुहाठारी!!
तुमने कैसे जाना
मंत्री ने जहर दिया था
रानी ने तो दूध पिया था
यह उगलेगी- ‘मेरे गाल पर काला मस्सा है‘
अरे पकड़ो इसको !
मारो कैची दे कैची!

मुझको क्या डर,
मै तो चिड़िया हूँ
बहुत करोगे पक्रोगे
नोचोगे पर
हुई फुर्र तो ...........
घर के अन्दर भी भागूंगी
धुप लगेगी तो बैठूँगी छाँवसुस्ताऊँगी................
अभी अभी बैठी थी--
सोफे, दरी बिस्तर पर
दर्पण देख खूब चोंच मारी,
लड़ी थीऔर उस दिन ठंड लगी तो,
सच मैं ऐठी थी

मैं घर बाहर की सब ले आयी,
कविता भाषा...........
भात पतीली....................
ठूँठ पेड़ की गाथा
झट बक दूँगी
मै तो चिड़ियामैने जो देखी कथा, जैसी की वैसी!

छन्ना

छन्ने!
तुम बहुत सुन्दर हो
शुध्ध साफ तुम्हारी औकात है
छान - वान कर परस देते होव्यर्थ
तो तुम्हीं फेंकते होअरे भाई!!

जब कभी,बेल का शरबत
लार - बीज समेत मिलता है
जब कोई रेशा,
दाँत में फँस,
फँसा लेता है दिमाग
जब चाय की पत्ती,
जीभ पर फैल .............
बिगाड़ती है अन्तिम स्वाद
तब तुम्हारा ख्याल आता है, छन्न्ेा!

छन्ने !
तुम कितने सरल हो
नहीं उलझे तुम किसी वाद- विवाद में
कभी उबले नहीं, युद्व - आतंक में
न राम- रहीम से वास्ता
तुम नहीं जानते प्रश्न और सम्बन्ध
तुम छानते छन्ने!
बस छानते रहते हो!!

तब बेकार खाद- खुज्झा
स्ूाख- सड़,
उर्वर मिट्टी बन जाताऔर
उसमें पड़ा मेरा एक सिक्का........
धो- धाकर काम चलाने लायक
मै हींग ले आता हूँ
मुस्करा उठता मेरा फूला पेट!

छन्न्े!
मैं तुझे इस्तेमाल करूंगा
पेट के बाद दिमाग पर.........
तब कहीं ओैर!

बुधवार, 24 मार्च 2010

मार्कंडेय स्मृति


इलाहाबाद का सांस्कृतिक हलका डूबा मार्कण्डेय के शोक में


२० मार्च, २०१०। इलाहाबाद.

आज सायं ५ बजे से वरिष्ठ कथाकार मार्कण्डेय की स्मृति सभा का आरंभमहात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्विद्यालय दूरस्थ शिक्षा इकाई केसत्यप्रकाश मिश्र स्मृति सभागर में हुआ. इलाहाबाद शहर के तमामबुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी और वाम कार्यकर्ता मार्कण्डेय को श्रद्धांजलिदेने उपस्थित थे. इस अवसर पर उपस्थित वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय नेमार्कण्डॆय के साथ अपने २५ साल पुराने रिश्ते को याद किया. उन्होंने कहाकि नई कहानी आंदोलन के समय प्रेमचंद की परम्परा के खिलाफ़ जितना कुछ लिखागया, उतना न उस दौर के पहले और न उसके बाद लिखा गया. नई कहानी के संगविकसित आलोचना ने मानो शहरीपन को ही कहानी का पर्याय बना दिया. केंद्रमें लाए गए राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर जबकि बदलते हुए ग्रामीणयथार्थ को सामने लाने वाले कथाकारों खासकर रेणु, मार्कण्डेय औरशिवप्रसाद सिंह की उपेक्षा की गई। दरअसल, यही लोग प्रेमचंद की परम्परा कोआगे बढ़ा रहे थे. ये ऎसे कथाकार थे जो आलोचना के बल पर नहीं, बल्कि अपनीकहानियों के दम पर, उनके पाठकों के दम पर हिंदी जगत में समादर के पात्ररहे. एक कहानीकार के रूप में मार्कण्डेय के महत्व को सचमुच रेखांकितकरने के लिए उस दौर की कहानी संबंधी बहसों का पुनर्मूल्यांकन ज़रूरी है.प्रों मैनेजर पांडेय ने कहा कि मार्कण्डॆय व्यापक धरातल पर जनवादी औरप्रगतिशील रचनाओं को देखते थे, कभी उन्होंने कट्टरता नहीं बरती, विरोधकरनेवालों की भी ज़रूरत के वक्त मदद करने से नहीं झिझके।


वरिष्ठ कथाकारशेखर जोशी मार्कण्डॆय का स्मरण कर भावुक हो उठे. उन्होंने कहा किमार्कण्डॆय जिस परम्परा के थे, उसे वहन करने वालों का अतिशय सम्मान करतेथे. 'गुलरा के बाबा' नाम की कहानी में भी उनका यह दृष्टिकोण व्यक्त हुआहै. शेखर जी ने कहा कि उनका और अमरकांत का पहला कहानी संग्रह तथा ठाकुरप्रसाद सिंह का पहला काव्य-संग्रह मार्कण्डॆय जी के 'नया साहित्य'प्रकाशन से ही छप कर आया। शेखरजी ने कहा कि सरल स्वभाव के होने के चलतेवे कष्ट देने वाले लोगों को भी आसानी से माफ़ कर देते थे।


समकालीन जनमतके संपादक श्री रामजी राय ने कहा कि इलाहाबाद में फ़िराक़ के बादनौजवानों की इतनी हौसला आफ़ज़ाई करने वाला मार्कण्डॆय के अलावा कोई दूसरावरिष्ठ लेखक न था। किसान जीवन उनके रचना कर्म और चिंताओं की धुरी बनारहा. रामजी राय ने उनसे जुड़े अनेक आत्मीय प्रसंगों को याद करते हुएबताया कि वे किस्सागो तबीयत के आदमी थे. उनके पास बैठने वालों को कतईअजनबियत का अहसास नहीं होता था. उनके व्यक्तित्व की सरलता बांध लेती थी.


प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि इलाहाबाद शहर की कथाकार-त्रयी यानीअमरकांत-मार्कण्डेय-शेखर जोशी में से एक कड़ी टूट गई है. 'कथा' पत्रिकाजिसके वे जीवनपर्यंत संपादक रहे, को यह श्रेय जाता है कि उसने बाद मेंप्रसिद्ध हुए अनेक रचनाकारों की पहली रचनाएं छापीं. कथाकार अनिता गोपेशने कहा कि मार्कण्डेय जी विरोधी विचारों के प्रति सदैव सहनशील थे और नएलोगों को प्रोत्साहित करने का कोई मौका हाथ से जाने न देते थे।


वयोवृद्धस्वतंत्रता संग्राम सेनानी कामरेड ज़िया-उल-हक ने मार्कण्डेय जी को यादकरते हुए कहा कि प्रतिवाद , प्रतिरोध के हर कार्यक्रम में आने की , सदारतकरने की सबसे सहज स्वीकृति मार्कण्डेय से मिलती थी. छात्रों और बौद्दिकोंके तमाम कार्यक्रमों में वे अनिवार्य उपस्थिति थे।


स्मृति सभा का संचालनविवेक निराला और संयोजन संतोष भदौरिया ने किया . मार्कण्डेय ( जन्म-२ मई, १९३०, जौनपुर -- मृत्यु- १८ मार्च,२०१०, दिल्ली ) पिछले दो सालों से गले के कैंसर से संघर्षरत थे. वे अपनेपीछे पत्नी विद्या जी, दो पुत्रियों डा. स्वस्ति सिंह, शस्या नागर वपुत्र सौमित्र समेत भरा पूरा परिवार छोड़ गये. बीमारी के दिनों में भीयुवा कवि संतोष चतुर्वेदी के सहयोग से 'कथा' पत्रिका पूरे मनोयोग सेनिकालते रहे. इतना ही नहीं इलाहाबाद के तमाम साहित्यिक-सांस्कृतिककार्यक्रमों में आना-जाना उन्होंने बीमारी के बावजूद नहीं छोड़ा. 1965में उन्होंने माया के साहित्य महाविशेषांक का संपादन किया। कई महत्वपूर्णकहानीकार इसके बाद सामने आये. 1969 में उन्होंने साहित्यिक पत्रिका 'कथा'का संपादन शुरू किया. उन्होंने जीवनभर कोई नौकरी नहीं की. अग्निबीज, सेमलके फूल (उपन्यास), पान फूल, महुवे का पेड़, हंसा जाए अकेला, सहज और शुभ,भूदान, माही, बीच के लोग (कहानी संग्रह), सपने तुम्हारे थे (कवितासंग्रह), कहानी की बात (आलोचनात्मक कृति), पत्थर और परछाइयां (एकांकीसंग्रह) आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियां हैं। हलयोग (कहानी संग्रह)प्रकाशनाधीन है. उनकी कहानियों का अंग्रेजी, रुसी, चीनी, जापानी, जर्मनीआदि में अनुवाद हो चुका है. उनकी रचनाओं पर 20 से अधिक शोध हुएहैं.'अग्निबीज' उपन्यास का दूसरा खंड लिखने, आत्मकथा लिखने, अप्रकाशितकविताओं का संग्रह निकलवाने, मसीही मिशनरी कार्यों पर केंद्रित अधूरेउपन्यास ''मिं पाल' को पूरा करने तथा 'हलयोग' शीर्षक से नया कहानी संग्रहप्रकाश में लाने की उनकी योजनाएं अधूरी ही रह गईं। राजीव गांधी कैंसरइंस्टीट्यूट में इलाज करा रहे मार्कण्डेय ने १८ मार्च को दिल्ली मेंआखीरी सांसें लीं. अगले दिन( १९ मार्च )को उनका शव रींवांचल एक्सप्रेससे इलाहाबाद लाया गया तथा एकांकी कुंज स्थित उनके आवास पर सुबह १० बजे सेदोपहर १ बजे तक लोगों के दर्शनार्थ रखा गया. इसके बाद रसूलाबाद घाट परअंत्येष्टि सम्पन्न हुई.


अंतिम दर्शन के समय और स्मृति सभा में उपस्थितसैकड़ों लोगों में कथाकार अमरकांत, शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह, सतीश जमाली,नीलकांत, विद्याधर शुक्ल, बलभद्र, सुभाष गांगुली, नीलम शंकर, अनितागोपेश,असरार गांधी,श्रीप्रकाश मिश्र, उर्मिला जैन, महेंद्र राजा जैन,आलोचक मैनेजर पांडेय, अली अहमद फ़ातमी, राजेंद्र कुमार, रामजी राय, प्रणयकृष्ण,सूर्यनारायण, मुश्ताक अली, रामकिशोर शर्मा, कृपाशंकर पांडेय, कविहरिश्चंद्र पांडेय, यश मालवीय, विवेक निराला,श्लेष गौतम, नंदल हितैषी,सुधांशु उपाध्याय, शैलेंद्र मधुर,संतोष चतुर्वेदी, रंगकर्मी अनिल भौमिक,अनुपम आनंद और प्रवीण शेखर, संस्कृतिकर्मी ज़फ़र बख्त, सुरेंद्र राही,वरिष्ठ अधिवक्ता उमेश नारायण शर्मा और विनोद्चंद्र दुबे, इलके महापौरचौधरी जितेंद्र नाथ, ट्रेड यूनियन व वाम दलों के नेतागण तथा ज़िले के कईप्रशासनिक अधिकारी शामिल थे.


इलाहाबाद से दुर्गा सिंह

रविवार, 21 मार्च 2010

कवि सईद लखनऊ में : कविता पाठ और संवाद




दूर से आती एक प्रवासी की
आवाज
अनिल सिन्हा


फिनलैंड निवासी हिन्दी के कवि, चित्रकार, फोटोग्राफर व अनुवादक सईद इन दिनों हिन्दुस्तान की यात्रा पर हैं। वे 16 मार्च को लखनऊ आये और उसी दिन जन संस्कृति मंच की ओर से उनकी कविता पाठ और उनके साथ बातचीत का कार्यक्रम राज्य सूचना केन्द्र में रखा गया। भवाली उत्तराखंड में जन्में सईद विज्ञान के स्नातक और विज्ञानी बनने की आकांक्षा के साथ साथ वह काफी दिनों दिल्ली में स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता व सोवियत सूचना विभाग में अनुवादक का काम करते रहे। कविताएँ लिखने व पेंटिंग का काम वे शुरू से करते रहे। ऐसी उत्पीड़नकारी स्थितियाँ पैदा हुई जिनकी वजह से उन्हें देश छोड़ना पड़ा। वे 1972 में फिनलैंड गये और वहीं बस गये। वहीं की नागरिकता भी ले ली। तब से कई दशक गुजर गये। लेकिन लखनऊ की गोष्ठी में देश से जाने के कारण के बारे में पूछे जाने पर वे इतने व्यथित हो उठे कि उन दिनों जो कुछ उनके साथ इस देश में घटा, उसे मात्र याद कर उनकी आँखें भर आईं। सईद अकेले नहीं हैं। तसलीमा नसरीन, मकबूल फिदा हुसैन जैसे अनगिनत लोग हैं जिन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

सईद की कविताओं में इस दुख-विषाद की अभिव्यिक्ति मिलती है। यहाँ प्राकृतिक और अन्तरिक्ष के सौन्दर्य हैं, मांसलता है, अदभुत संवेदना, प्रतीक, बिम्ब और कल्पनाशीलता है साथ ही बेहतर मानवोचित समाज बनाने की जन आकांक्षा व संघर्ष के प्रति प्रतिबद्धता। इसीलिए वे लिखते हैं - ‘तपते मरूस्थल/अंकुरित हो रहे हैं/स्वप्न, हरित/खिलेंगे पुष्प/रक्ताभ/खंडित हो जायेंगी/शिलाएँ।’

बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी चित्रकला से लेकर आधुनिक चित्रकला को लेकर तथा फिनलैंड में कला व साहित्य पर बातचीत की। सईद ने वहाँ के साहित्य, संस्कृति व थियेटर आदि की गतिविधियों पर चर्चा की और बताया कि किस तरह फिनलैंड की सरकार के पास एक सुस्पष्ट सांस्कृतिक नीति है। वह अपने साहित्य के प्रचार.प्रसार के लिए बड़ी राशि खर्च करती है। इसी के तहत सईद ने प्रसिद्ध फिनिश उपन्यासकार मिका वाल्तरी के उपन्यास ‘सिनुहे मिश्रवासी’ का हिन्दी में अनुवाद किया है जिसे राजकमल प्रकाशन छाप रहा है। इसके लिए फिनिश सरकार राजकमल प्रकाशन को लाखो रुपये देगी।

फिनलैंड के समाज की चर्चा करते हुए सईद का कहना था कि वहाँ समाज में महिलाओं को बराबरी की स्थिति हासिल है और अविवाहित मातृत्व को भी मान्यता है। फिनलैंड में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। यहाँ दक्षिणपंथी, वामपंथी व मध्यमार्गी दल हैं। इन दिनों वहाँ की चिन्ताजनक हालत यह है कि नवनाजीवाद और नस्लवाद उभर रहा है। मंदी का यहाँ भी असर है। अमेरीका के बढ़ते सांस्कृतिक व राजनीतिक वर्चस्व को यहाँ के नागरिक पसन्द नहीं करते हैं।

इस मौके पर सईद ने अपनी कई कविताएँ सुनाई। सईद का कहना था कि जब मैं इन कविताओं को प्रकाशित कराऊँगा, इसका शीर्षक होगा - ‘दूर से आती एक प्रवासी की आवाज’। सईद की कविताओं पर हुई चर्चा में अजय सिंह, विनय श्रीकर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, भगवान स्वरूप कटियार, चन्द्रेश्वर, वीरेन्द्र सारंग, नसीम साकेती, ऋतु सिन्हा, शोभा सिंह, हरिओम, श्याम अंकुरम, राजेश कुमार, कल्पना पाण्डेय, ताहिरा हसन, के के वत्स, विमल किशोर, अवन्तिका राय, कौशल किशोर आदि ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन किया अनिल सिन्हा ने।



सईद की पाँच कविताएँ

एक
तपते मरूस्थल मेंअंकुरित
हो रहे हैंस्वप्न,हरित।
खिलेंगे पुष्परक्ताभ।
खण्डित हो जायेंगीशिलाएँ।
शेष रह जाएंगेदीवारों
परआदिम भिŸाी चित्रमात्र।
दो इतिहासों के
बीचअनकही गाथाएँ।
करेंगे जिनका
मूल्यांकनअभी
अजन्मे शिशु।
अनवरत प्रवाह
मेंबहते क्षणतब
ठिठक जायेंगे पल
भर के लिए
और नक्षत्रो से
टपकेंगेंअश्रु।
समुद्र में तैर रहे होंगेद्वीप असंख्य।

दो

खण्ड खण्ड
ख्ण्डित होता
आकाशगिरता है
धरती पर।
दीवारों परटिकी हुई
स्मृतियाँ।
या फिरमृत लोगों
केधुँधलाते दस्तखत।
बारिश की बूँदों
मेंबुना हुआ
इंद्रधनुष।
हवा में तैरते हुए
चेहर,ेपरिचय,नाम।
शेष है साँसों में
अभी गर्माहट।
कूँची से उभरते रंग,बनते दृश्य।
झिझकते चेहरों
मेंझलकता,
अटकता इतिहास।

तीन

रेत में धँसे
हुएपदचिन्ह।
अर्सा गुजर गयाइधर
सेकारवाँ को गुजरे हुए।
तटों पर टूटती
हुईसमुद्र की तरंगे,
ध्वनित
होताक्या कुछ।
इतिहास रूकता
हैठिठकता
हैपलभर
देखता हैडालता है
फिर गुजर जाता
हैबढ़ जाता है आगे।
इस बीच
कितने षडयंत्र रचे
गयेकितने
रक्तपातघटित हुए।

चार

रात्रि मेंडूब
जाता हैसमग्र
अस्तित्व,
फिर दुबारा
उभरने के लिएदूर
कहीं,सुदूर
वीराने द्वीपों पर।
शरद मेंउठता है
तूफानी बवण्डर।
शिशिरदेता
हैठण्डी
दस्तकेंबन्द दरवाजों पर।
जब संध्या ढँक
लेती हैछायाओं
कोतब शुरू होता
हैसपनों काएक नया सिलसिला।
एक पूरा दिवसगुजर
जाता है,टिक जाता
हैक्षितिज पर,
क्षितिज के सहारे।

पाँच

क्षितिज से क्षितिज
तकफैला
हुआएक सूर्य,
एक पूरा दिवस।
नक्षत्रों के नेत्रबंद हो जाते हैं
बादलों में
गढ़े हुएचेहरे
चहलकदमी करते
हैंबंद कमरे के अकेलेपन में।
हिम पिघलता
हैधीमे बहुत ही
धीमे-धीमेवसंत
उठाता
हैअपना सरधरती से।
आकाश सेटपकता
हैधीमा धीमा संगीत।
शिराओं मेंदौड़ते हैं मौसम।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

भगवान स्वरूप कटियार का कविता पाठ


‘वह बच्चा मेरी आँखों से दुनिया को देखेगा’

कौशल किशोर

मैं वापस कर आया हूँ
उनका दिया हुआ
रोबदार हैट
वजनदार बूट
और तमाम गुनाहों से सनी लथपथ वर्दी

मैं छोड़ आया हूँ
मेज और कुर्सी भी
जिस पर बैठकर
बेबसी में अनचाहे
हमें करने पड़े थे
घटिया और घृणित समझौते

आज खुली हवा में
अपने मित्रों के बीच
सांस लेते हुए
मैं महसूस कर सकता हूँ
जीवन कितना सुन्दर है

ये पंक्तियां हैं भगवान स्वरूप कटियार की कविता ‘मुक्ति का सौंदर्य’ की जिसे उन्होंने राज्य सूचना केन्द्र, हजरतगंज, लखनऊ में जन संस्कृति मंच (जसम ) के द्वारा 21 जनवरी 2010 को आयोजित कार्यक्रम में सुनाई। इसी महीने कवि कटियार साठ साल के हुए और पिछले महीने की 31 तारीख को सूचना विभाग से सहायक निदेशक के पद से सेवामुक्त हुए। जसम ने कार्यक्रम उन्हीं पर केन्द्रित किया था।

इस मौके पर भगवान स्वरूप कटियार ने ‘इक्कीसवीं सदी की बीसवीं सदी के नाम चिट्ठी’, ‘हवा में घुलता आदमी’, ‘जंगल मेरे मित्र’, ‘टुकड़े टुकड़े मौत’, ‘मां’, ‘आदमी होने का व्याकरण’, ‘मेरे न होने पर’ सहित करीब एक दर्जन से अधिक कविताओं का पाठ किया और अपनी कविता के विविध रंगों से श्रोताओं का परिचय कराया। उनकी ये पंक्तियां काफी अन्दर तक संवेदित करती रहीं:

‘मैं खत्म हो जाऊँगा पूरी तरह
यह तय है
हाँ, यकीनन मैं मर जाऊँगा............
पर वह बच्चा
जो मेरी कविता पढ़ रहा है
मेरी आँखों से दुनिया को देखेगा।’

कविता पाठ से पहले भगवान स्वरूप कटियार ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि एक स्वतंत्रचेता रचनाकार के लिए सृजन एक खिलवाड़ न होकर गंभीर दायित्व के निर्वहन की समन्वित प्रक्रिया है। सार्थक रचना सदैव किसी बड़े सरोकार से जुड़ी होती है और इसीलिए वह लोकरुचि से भी जुड़ी होती है। रचनाकार उस लोक की बात जरूर करेगा जिसमें वह साँस ले रहा है। साहित्य की चिन्ता सही फैसले की चिन्ता है जो हमें बड़े चिन्तन के क्षेत्र में ले जाती है। मेरी कविताओं का मकसद न तो कोई नजरिया पेश करना है और न ही राजनैतिक नारों की तरह बेवजह शोर मचाना है। आखिर जीवन मूल्यों, बेहतर जिन्दगी और बेहतर समाज के लिए हमें कुछ कुर्बानियाँ तो देनी ही होगी, जिससे हम आज मुकरने लगे हैं। लिखने-पढ़ने के क्षेत्र में चाहे जितनी प्रतिकूल परिस्थितियाँ हो जायें, रचना और रचनाकार बचे रहेंगे बल्कि समाज को भी बचाये रख सकेंगे -

लिखे जाने से भले हीफर्क न पड़ता हो
पर न लिखे जाने से बहुत फर्क पड़ता है
जैसे बोलने से भले ही फर्क न पड़ता हो
पर चुप्पी तो प्रतिरोध का निषेध है
इसलिए सोचना बोलना
पढ़ना और लिखना परिवर्तन की बुनियादी शर्त है

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक व समीक्षक अनिल सिन्हा ने कहा कि भगवान स्वरूप कटियार को हिन्दी कवि समाज हाशिये पर रखता है। इसका कारण शायद यह है कि रचनाकारों की जो साहित्यिक गोलबंदी है, उसमें कटियार कोई पहल नहीं लेते। वे सच को सीधे कहने का साहस करते हैं जिससे उनकी सामाजिक चिन्ताएँ व सरोकार का पता चलता है। यानी वे एक स्वस्थ-सुसंस्कृत-संवेदनशील और अपने हक के लिए लड़ने वाले समाज की कल्पना करते हैं। उनका काव्य प्रयास इसी तरफ प्रेरित है। तमाम घटनाओं पर वे तत्काल प्रतिक्रिया देते हैं जिससे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सामाजिक सजगता का पता चलता है।

कवि व समीक्षक कौशल किशोर ने भगवान स्वरूप कटियार की कविता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इनकी कविताएँ लोकतांत्रिक चेतना की कविताएं हैं जिसमे लोकतांत्रिक व्यक्ति का संघर्ष, उसकी इच्छा-आकांक्षा की अभिव्यकित होती है। कटियार का व्यक्तित्व बहुत सरल-सहज है, उनकी कविता की दुनिया भी ऐसी ही है, बहुत आत्मीय। इनको पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि यहाँ हमारी ही दुनिया अभिव्यक्त हो रही है। इनकी कविताओं में माँ,, प्रेम, दुख, ख्वाब, दलदल, घर और वह घरती है जो आज निशाने पर है। ये हमारे जटिल यथार्थ की सहज-सरल कविताएँ हैं और यही कटियार की काव्य खासियत है।

इस मौके पर कटियारजी की बेटी युवा लेखिका व पत्रकार प्रतिभा कटियार ने कहा कि बचपन से मैं देखती आई हूँ कि पापा के अन्दर विद्रोही स्वर है। दुख व कष्ट आये हैं लेकिन वे उनसे लड़ते हुए आगे बढ़े है। एक तड़प, कुछ कहने की छटपटाहट तथा विचारों के प्रति दृढता उनमें है। वे हार न मानने वाले ऐसे पिता हैं जिन्होंने मेरे और मेरे भाई के अन्दर संघर्ष की प्रेरणा दी है। यही संघर्ष इनकी रचनाओं में भी अभिव्यक्त होता है। पापा में जबरदस्त आशावाद है।

भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं पर बालते हुए आलोचक चन्द्रेश्वर का कहना था कि ये कविताएँ समकालीन कविता के आज के प्रचलित मुहावरे से अलग हैं। यहाँ दुख की बात कही गयी है लेकिन ये कविताएँ दुखवादी नहीं हैं। यहाँ दुख का दिखावा नहीं हैं। घर परिवार से लेकर देश दुनिया तक के विषय को लेकर चिन्ताएँ हैं, इनका फैलाव है। यह हारती नहीं हैं, संघर्ष की बात करती हैं और बखूबी संप्रेषित होती हैं। चन्द्रेश्वर ने ‘स्त्री और रोटी’ कविता को लेकर सवाल किया कि क्यों रोटी बनाती हुई स्त्री ही सुन्दर लगती है। स्त्री के सौंदर्य को इस रूप में देखना परम्परावादी व पुरुषवादी सोच है।

कवि वीरेन्द्र सारंग ने कहा कि वरिष्ठता के बावजूद कटियार की कविताओं में युवापन है। इनका कथ्य बहुत मजबूत है। इनकी कई कविताओं में ईश्वर आता है लेकिन ईश्वर को लेकर जो विचार, भाव व आलोचना है, वह प्रभावित करता है। वहीं ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव का कहना था कि ब्रेख्त की कविताओं में अंधेरा हावी रहता है लेकिन कटियार की कविताएँ अंधेरे से उजाले की यात्रा करती है।

समकालीन कविता पर कथाकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा की टिप्पणी ने बहस में गरमी पैदा कर दी। उनका कहना था कि 70 के बाद की कविताएँ लोक सं कटी हुई शहरी कविताएँ हैं। ये पाठकों को आतंकित करती हैं। हालत यह है कि कवि अपनी कविताएँ याद नहीं रख पाता लेकिन वह चाहता है कि पाठक उसकी कविता को पढ़े और याद रखे। कहानी की भी कमोबेश यही हालत है। आज की कविताओं में गेयता का अभाव है। इसीलिए यह समाज व पाठक से दूर होती जा रही है।

कवि अशोक चन्द्र का कहना था कि लोक को सीमित अर्थ में न देखकर उसे आधुनिक रूप में देखने की जरूरत है। यह लोक गाँवों से लेकर शहरों तक फैला है तथा विकास के इस दौर में उसका इस्तेमाल हुआ लेकिन वह स्वयं हाशिए पर ढ़केल दिया गया है। हाशिये का यह लोक कविता के केन्द्र में आये, कविता में इस लोक की समझ हो तथा कविता इससे संवाद करे, ऐसी ही कविता बड़ी हो सकती है।

संस्कृतिकर्मी प्रतुल जोशी व बुद्धिजीवी अशोक मिश्र ने पंत और निराला का उदाहरण देते हुए कहा कि कविता गेय हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन कविता का लयात्मक होना जरूरी है। कविता विचार को अलग तरीके से कहती है यही उसकी विशिष्टता है। कविता में बुद्धिजीवी जब हावी होता है तो कविता कमजोर हो जाती है। भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं में विचारों की उष्मा के साथ आम आदमी का संघर्ष है और ये रिश्तों की आत्मीयता से पूर्ण हैं।

महिला नेता ताहिरा हसनराघवेन्द्र का कहना था कि स्त्री, घर व परिवार को लेकर कविताओं में पारम्परिक विचार है जिस बारे में कटियारजी को सचेत रहने की जरूरत है। ‘हिजड़ा’ जैसे विशेषण का इस्तेमाल जिस तरह किया गया है, वह उचित नहीं है क्योंकि यह समुदाय मानव समाज का हिस्सा है, उपेक्षित है और गलत नजरिये से इसे देखा गया है। लेकिन आज उनमें भी संघर्ष की चेतना फैल रही है।

कार्यक्रम के अन्त में कवि, कलाकार व अभिनेता निर्मल पाण्डेय के निधन पर जन संस्कृति मंच ने एक मिनट का मौन रखकर अपनी शोक संवेदना प्रकट की। इस मौके पर नाटककार राजेश कुमार ने उनके योगदान की चर्चा की और कहा कि वे नैनीताल के युवमंच और जसम से सांस्कृतिक यात्रा शुरू की थी। बाद में वे कला अभिव्यक्ति के बड़े आयाम की तलाश में मुम्बई तक गये। उनमें कला की बड़ी संभावना थी।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

गोरखपुर फिल्म समारोह

चौतरफा प्रतिरोध की जरूरत-सईद मिर्जा

गोरखपुर। समाज में हाशिए के लोगों और उनके जीवन संघर्षों को संबोधित गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का शुभांरभ गुरूवार को यहां ाड़े ही जोशोखरोश के साथ शुरू हो गया । फिल्म समारोह का उद्घाटन जाने माने फिल्मकार सईद मिर्जा ने किया । इस अवसर पर उनकी दो फिल्मों सलीम लगड़े पे मत रो और अलवर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है प्रदर्शित की गर्इं । सात फरवरी तक चलने वाले इस फिल्मोत्सव के दौरान 5 फ ीचर फिल्में , 6 डाक्यूमेंटरी ओर 3 एनीमेशन फिल्में दिखाई जाएंगी । फिल्मोत्सव के उद्घाटन अवसर पर दास्तानगोई का प्रदर्शन आकर्षण का केन्द्र बना रहा ।

उद्घाटन अवसर पर मिर्जा ने कहा पूंजीवादी वैश्वीकरण के इस दौर में चौतरफा प्रतिरोध की बेहद जरूरत है ,प्रतिरोध का शब्द मुझे बहुत पसंद है । उनका कहना था जो लोकतंत्र आज हमारे सामने है, वह जनता का तंत्र नहीं है । इस लोकतंत्र का पूंजीवाद, स्टाक मार्केट और नेस्ले-कोकाकोला जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ गहरा रिश्ता है । यह तंत्र आम आदमी की आकांक्षाओं,खुशियों और हक अधिकार की आवाज को कुचलने वाला तंत्र है । ऐसे दौर में जनता के दर्द और उम्मीद को अभिव्यक्ति देना भी प्रतिरोध है । कभी न्यू वो सिनेमा ने भी यह काम किया लेकिन 1990 के बाद उदारीकरण के दौर में इस तरह के सिनेमा बनने कम हो गए और फिल्म सोसाइटियां भी खत्म हो गई । इस तरह के सिनेमा के निर्माण में जो मदद मिलती थी, उसे भी सत्ता ने जानबूझ खत्म किया। ऐसी स्थिति में जनसंस्कृति मंच द्वारा जनता के सहयोग से गंभीर और जनपक्षधर फिल्मों के दर्शकों को संगठित करने और इस तरह के फिल्मों के निर्माण का माहौल ानाना काफी उम्मीद जगाता है।

अलवर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है,मोहन जोशी हाजिर हों, सलीम लगड़े पे मत रो और नसीम जैसी चर्चित फिल्में और नुक्कड़,सरकस,ए ट्रिस्ट विथ द पिपुल आफ इंडिया जैसे वृत्तचित्र और धारावाहिक बनाने वाले सईद मिर्जा ने कहा इस देश में कारपोरेट की मदद से भी फिल्म फेस्टिवल होते हैं ,पर वे वहां नहीं जाते।उदघाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि 1990 के बाद वैश्वीकरण के जरिए जो आर्थिक राजनीतिक व्यवस्था बनी ,उसने सिर्फ न्यू वो सिनेमा को ही हाशिए पर डाला,बल्कि ट्रेड यूनियन आंदोलन,किसान आंदोलन,समाज से मूल्यों की दुनिया,नौजवानों के दिलसों में मौजूद आदर्शों की दुनिया को भी हाशिए पर डाला । इतने बड़े मध्य वर्ग के भीतर गरीबों के प्रति करूणा होनी चाहिए थी ,वह भी हाशिए पर गई ।

फिल्मोत्सव क दूसरे दिन की शुरूआत महान फिल्मकार ऋत्विक घटक की क्लासिक फिल्म मेघे ढाका तारा से हुई । यह फिल्म एक स्त्री के अपने पारिवारिक संबंधों के प्रति फर्ज और वेयक्तिक स्ज्ञतर पर प्रेम की स्वाभाविक मानवीय आकांक्षाओं के बीच तीखे द्वंद्व की एक त्रासद दास्तान है । परंपरागत पारिवारिक मूल्य जिसमें सेवा ,कुर्बानी को स्त्रियों के लिए श्रेष्ठता का पैमाना बना दिया जाता है और जहां उनकी ोहद आंतरिक-प्रकृतिक आकांक्षाा को कुचल दिया जाता है, उस रिवाज को यह फिल्म चुनौती देती है। शुक्रवार को दर्शकों को एट माइ डोर स्टेप और आई वंडर नामक दो डाक्यूमेंटरी दिखाई गई । निष्ठा जैन द्वारा निर्देशित एट माइ डोर स्टेप महानगरों के मध्यमवर्गीय-उच्चवर्गीय लोगों के दरवाजे पर रोज दस्तक देने वाले मेहनतकशों यानी कूड़ा उठाने वाले ,घरेलू कामकरने वाले,कूरियर- गार्ड आदि का काम करने वालों की जिंदगी को दर्शाता है।

निरूपमा श्री निवासन निर्देशित डाकयूमेंटरी आई वंडर राजस्थान, सिक्किम ,और तमिलनाडु के ग्रामीण बच्चों की यात्रा और उनके रोजमर्रा के अनुभवों के बीच से दर्शकों को गुजारते हुए शिक्षा की विसंगतियों पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करती है ।बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा किस तरह की होनी चाहिए ,इसकी इस डाक्यूमेंटरी से एक दिशा मिलती है । दूसरे दिन प्रदर्शित आखिरी फिल्म नसीम थी जिसका निर्देशन सईद मिर्जा ने किया है । यह फिल्म आजादी के पहले और बाद के मुस्लिम समाज की त्रासदियों का ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है ।बाबरी ध्वंस के जरिए जिस सेकुलर ढांचे को गहरा नुकसान पहुंचाया गया, उसने मुस्लिम मन पर क्या असर डाला उसकी यह दास्तान है।

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह ने ाताया फिल्मोत्सव में इस बार चित्तो प्रसाद,जैनुल आोदिन,सोमनाथ के चित्रों की प्रदर्शनी भी लगाई गई है ,जिसे अशोक भौमिक और अनुपम ने क्यूरेट किया है । सिंह ने बताया फिल्म समीक्षक- आलोचक जारी मल्ल पारख के आलेख आम आदमी का सिनेमा बनाम सिनेमा का आम आदमी का पाठ भी उत्सव का एक आकर्षण था । पाठ संजीव कुमार ने किया ।