शुक्रवार, 25 मार्च 2011

प्रलेस के महासचिव प्रो. कमला प्रसाद को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि



आज सुबह ही हम सब प्रो. कमला प्रसाद के असामयिक निधन का समाचार सुन अवसन्न रह गए. रक्त कैंसर यों तो भयानक मर्ज़ है, लेकिन फिर भी आज की तारीख में वह लाइलाज नहीं रह गया है. ऐसे में यह उम्मीद तो बिलकुल ही नहीं थी कि कमला जी को इतनी जल्दी खो देंगे. उन्हें चाहने वाले, मित्र, परिजन और सबसे बढ़कर प्रगतिशील, जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन की यह भारी क्षति है. इतने लम्बे समय तक उस प्रगतिशील आंदोलन का बतौर महासचिव नेतृत्व करना जिसकी नींव सज्जाद ज़हीर, प्रेमचंद, मुल्कराज आनंद , फैज़ सरीखे अदीबों ने डाली थी, अपन आप में उनकी प्रतिबद्धता और संगठन क्षमता के बारे में बहुत कुछ बयान करता है.
१४ फरवरी,१९३८ को सतना में जन्में कमला प्रसाद ने ७० के दशक में ज्ञानरंजन के साथ मिलकर 'पहल' का सम्पादन किया, फिर ९० के दशक से वे 'प्रगतिशील वसुधा' के मृत्युपर्यंत सम्पादक रहे. दोनों ही पत्रिकाओं के कई अनमोल अंकों का श्रेय उन्हें जाता है. कमला प्रसाद जी ने पिछली सदी के उस अंतिम दशक में भी प्रलेस का सजग नेतृत्व किया जब सोवियत विघटन हो चुका था और समाजवाद को पूरी दुनिया में अप्रासंगिक करार देने की मुहिम चली हुई थी. उन दिनों दुनिया भर में कई तपे तपाए अदीब भी मार्क्सवाद का खेमा छोड़ अपनी राह ले रहे थे. ऐसे कठिन समय में प्रगतिशील आन्दोलन की मशाल थामें रहनेवाले कमला प्रसाद को आज अपने बीच न पाकर एक शून्य महसूस हो रहा है. कमला जी की अपनी मुख्य कार्यस्थली मध्य प्रदेश थी. मध्य प्रदेष कभी भी वाम आन्दोलन का मुख्य केंद्र नहीं रहा. ऐसी जगह नीचे से एक प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठन को खडा करना कोइ मामूली बात न थी. ये कमला जी की सलाहियत थी कि ये काम भी अंजाम पा सका. निस्संदेह हरिशंकर परसाई जैसे अग्रजों का प्रोत्साहन और मुक्तिबोध जैसों की विरासत ने उनका रास्ता प्रशस्त किया, लेकिन यह आसान फिर भी न रहा होगा.
कमला जी को सबसे काम लेना आता था, अनावश्यक आरोपों का जवाब देते उन्हें शायद ही कभी देखा गया हो. जन संस्कृति मंच के पिछले दो सम्मेलनों में उनके विस्तृत सन्देश पढ़े गए और दोनों बार प्रलेस के प्रतिनिधियों को हमारे आग्रह पर सम्मेलन संबोधित करने के लिए उन्होनें भेजा. वे प्रगतिशील लेखक संघ , जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के बीच साझा कार्रवाइयों की संभावना तलाशने के प्रति सदैव खुलापन प्रदर्शित करते रहे और अनेक बार इस सिलसिले में हमारी उनसे बातें हुईं. इस वर्ष कई कार्यक्रमों के बारे में मोटी रूपरेखा पर भी उनसे विचार विमर्ष हुआ था जो उनके अचानक बीमार पड़ने से बाधित हुआ. संगठनकर्ता के सम्मुख उन्होंने अपनी आलोचकीय और वैदुषिक क्षमता, अकादमिक प्रशासन में अपनी दक्षता को उतनी तरजीह नहीं दी. लेकिन इन रूपों में भी उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. मध्यप्रदेश कला परिषद् और केन्द्रीय हिंदी संस्थान जैसे शासकीय निकायों में काम करते हुए भी वे लगातार प्रलेस के अपने सांगठनिक दायित्व को ही प्राथमिकता में रखते रहे. उनका स्नेहिल स्वभाव, सहज व्यवहार सभी को आकर्षित करता था. उनका जाना सिर्फा प्रलेस , उनके परिजनों और मित्रों के लिए ही नहीं , बल्कि समूचे वाम- लोकतांत्रिक सांस्कृतिक आन्दोलन के लिए भारी झटका है. जन संस्कृति मंच .प्रो. कमला प्रसाद को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है . हम चाहेंगे कि वाम आन्दोलन की सर्वोत्तम परम्पराओं को विकसित करनेवाले संस्कृतिकर्मी इस शोक को शक्ति में बदलेंगे और उन तमाम कामों को मंजिल तक पहुचाएँगे जिनके लिए कमला जी ने जीवन पर्यंत कर्मठतापूर्वक अपने दायित्व का निर्वाह किया.

- प्रणय कृष्ण , महासचिव , जन संस्कृति मंच


जाने मने आलोचक डॉ. कमला प्रसाद का जाना

जनवादी और प्रगतिशील आन्दोलन का नुकसान है

---- जन संस्कृति मंच

लखनऊ , २५ मार्च . जन संस्कृति मंच ने हिन्दी के जाने माने आलोचक , प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव और "वसुधा" के संपादक डा० कमला प्रसाद के निधन पर गहरा शोक प्रकट किया है. आज जारी बयान में जसम लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि कमला प्रसाद जी का जाना जनवादी और प्रगतिशील आन्दोलन का भारी नुकसान है. अपनी वैचारिक प्रतिबधता और साहित्य ओ समाज में अपने योगदान के लिए हमेशा याद किये जायेंगे . अयोध्या के सम्बन्ध में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ साझा सांस्कृतिक पहल उन्होंने ली थी तथा संयुक्त सांस्कृतिक आंदोलनों में उनकी विशिष्ट भूमिका थी.

हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार और आलोचक कमला प्रसाद का आज शुक्रवार 25 मई की सुबह नई दिल्ली के एक अस्पताल में निधन हो गया । कैंसर से पीड़ित प्रसाद का लम्बे समय से इलाज चल रहा था. वह मध्यप्रदेश से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका वसुधा के सम्पादक और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव थे । मध्य प्रदेश के सतना जिले के गांव धौरहरा में 1938 में जन्मे प्रसाद की प्रमुख कृतियां साहित्य शास्त्र, आधुनिक हिन्दी कविता और आलोचना की द्वन्द्वात्मकता, रचना की कर्मशाला, नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं । हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्रिका "पहल" के संपादन में भी वे लम्बे समय तक ज्ञानरंजन के साथ रहे .

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच लखनऊ


गुरुवार, 10 मार्च 2011

अनिल सिन्हा की याद ने सबको रूला दिया







शब्दों की दुनिया के लोग - लेखक, पत्रकार, संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी ...... सब थे। ऐसा बहुत कम मौका आया होगा जब उन्हें शब्दों के संकट का सामना करना पड़ा हो। पर हालत ऐसी ही थी। किसी को भी अपने विचारों-भावों को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। एक-दो वाक्य तक बोल पाना मुश्किल हो रहा था। हिन्दी कवि वीरेन डंगवाल की हालत तो और भी बुरी थी। सब कुछ जैसे गले में ही अटक गया है। यह कौन सी कविता है ? कुछ समझ में नहीं आ रहा था। पर वह कविता ही थी। उसके पास शब्द नहीं थे पर वह वेगवान नदीे की तरह बह रही थी। इतना आवेग, सीधे दिल में उतर रही थी। आँसूओं के रूप में बहती इस कविता को सब महसूस कर रहे थे। यह प्रकृति का कमाल ही है कि जहाँ शब्द साथ छोड़ देते हैं, शब्दों का जबान से तालमेल नहीं बैठ पाता, ऐसे में हमारी इन्द्रियाँ विचारों-भावों को अभिव्यक्त करने का माध्यम बन जाती हैं। 6 मार्च को अनिल सिन्हा की स्मृति सभा में ऐसा ही दृश्य था। बड़ी संख्या में साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मी, कलाकार, बुद्धिजीवी, राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता, अनिल सिन्हा के परिजन, मोहल्ले के साथी, पास-पड़ोस के स्त्री-पुरुष सब इक्ट्ठा थे। अचानक अनिल सिन्हा के चले जाने का दुख तो था ही, पर सब उनके साथ की स्मृतियों का सझाा करना चाहते थे। किसी के साथ दस साल का, तो किसी से तीस व चालीस साल का और कुछ का तो जन्म से ही उनका साथ था और सभी उनके साथ बीताये क्षणों की स्मृतियों, अपने अनुभवों को आपस में बाँटना चाहते थे।

इस अवसर पर कवि भगवान स्वरूप कटियार और विमला किशोर ने अपनी भावनाओं को कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया। वे कविताएँ यहाँ दी जा रही हैं:

एक बेचैन आवाज


भगवान स्वरूप कटियार

जहां मेरा इंतजार हो रहा है
वहां मैं पहुंच नहीं पा रहा हूं
दोस्तों की फैली हुई बाहें
और बढे हुए हांथ मेरा इंतजार कर रहे हैं .

पर मेरी उम्र का पल पल
रेत की तरह गिर रहा है
रैहान मुझे बुला रहा है
ऋतु- अनुराग,निधि- अर‘ाद,
‘ाा‘वत- दिव्या और मेरी प्रिय आ‘ाा
और मेरे दोस्तों की इतनी बडी दुनिया
मैं किस किस के नाम लूं
सब मेरा इंतजार कर रहे हैं
पर मैं पहुंच नहीं पा रहा हू
मेरी सांसें जबाब दे रही हैं .

पर दोस्तो याद रखना
मौत ,वक़्त की अदालत का आखिरी फैसला नहीं है
जिन्दगी मौत से कभी नहीं हरती
मेरे दोस्त ही तो मेरी ताकत रहे हैं
इसलिए मैं हमे‘ाा कहता रहा हूं
कि दोस्त से बडा कोई रि‘ता नहीं होता
और ना ही दोस्ती से बडा कोई धर्म
मैं तो यहां तक् कहता हू
कि दोस्ती से बडी कोई विचारधारा भी नहीं होती
जैसे चूल्हे में जलती आग से बडी
कोई रो‘ानी नहीं होती .

इसलिए मेरी गुजारि‘ा है
कि उलझे हुए सवालों से टकराते हुए
एक बेहतर इंसानी दुनिया बनाने के लिए
मेरी यादों के साथ संघर्“ा का कारवां चलता रहे


मंजिल के आखिरी पडाव तक.

याद

विमला किशोर

एक पक्षी उड़ गया
मानो, हमारा प्यारा साथी छूट गया
वह पच्चीस तारीख थी
साल दो हजार ग्यारह का दूसरा महीना था
एक बिजली सी कौंध गई
आँखों में
चारो तरफ घिर आया अंधेरा
मन भी बहुत आहत हुआ
दूर, बहुत दूर चला गया वह बादलों के पार
झाँक रहा वह वहीं से
हम सबके दिलों मे
उजियारा फैलाता
आज भी खड़ा है
हम सबकी यादों में
जिन्दगी के मायने बताता
अटल
दैदिप्यमान
प्रकाश स्तम्भ की तरह
हम सबको राह दिखाता

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

स्मृति अनिल सिन्हा






















स्मृति गोष्ठी

स्मृति अनिल सिन्हा: बेहतर व मानवोचित दुनिया की उम्मीद का संस्कृतिकर्मी

कौशल किशोर

लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा के अचानक अपने बीच से चले जाने से हमने ऐसा मजबूत और ऊर्जावान साथी खोया है जिनसे जन सांस्कृतिक आंदोलन को अभी बहुत कुछ पाना था। उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखना था। सŸार के दशक में और उसके बाद चले सांस्कृतिक आंदोलन के वे अगुआ थे। अनिल सिन्हा कलाओं के अर्न्तसम्बन्ध पर जनवादी, प्रगतिशील नजरिये से गहन विचार और समझ विकसित करने वाले विरले समीक्षक और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के मानक थे। अपनी इन्हीं विशेषताओं की वजह से प्रगतिशील रचनाकर्म के बाहर के दायरे में भी उन्हें सम्मान प्राप्त था।

यह विचार कवि व जसम के संयोजक कौशल किशोर ने ‘स्मृति अनिल सिन्हा’ के अन्तर्गत आयोजित स्मृति सभा में शोक प्रस्ताव के माध्यम से व्यक्त किये। जाने.माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा का निधन 25 फरवरी को पटना में मस्तिष्क आघात से हुआ। उनकी स्मृति में जन संस्कृति मंच ने उŸार प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ के प्रेमचंद सभागार में 27 फरवरी को शोकसभा का आयोजन किया। कार्यक्रम का संचालन कवि.आलोचक चन्द्रेश्वर ने किया। चन्द्रेश्वर का कहना था कि इससे बढ़कर हमारे लिए दुख की बात क्या होगी कि आज इस सभागार में शमशेर, केदार व नार्गाजुन जन्मशती का आयोजन था। अनिल सिन्हा इस समारोह के मुख्य कर्ता.धर्ता थे। लेकिन अनिलजी हमारे बीच नहीं रहे और हमें इस सभागार में उनकी स्मृति में शोकसभा करनी पड़ रही है।

11 जनवरी 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में जन्मे अनिल सिन्हा ने पटना विश्वविद्यालय से 1962 में एम. ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। विश्वविद्यालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने अपना पी एच डी बीच में ही छोड़ दिया। प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कई तरह के काम किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यावर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से वे भी जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ, वे मंगलेश डबराल, अजय सिंह, मोहन थपलियाल आदि के साथ यहीं आ गये। तब से लखनऊ ही उनका स्थाई निवास था। अमृत प्रभात लखनऊ संस्करण के बन्द होने के बाद उन्होंने नवभारत टाइम्स में काम किया। दैनिक जागरण, रीवाँ के भी वे स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने वह अखबार छोड़ दिया। ‘राष्टीªय सहारा’ में साहित्यिक पृष्ठ ‘सृजन’ का भी उन्होंने सम्पादन किया था।

कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नम से उनका कहानी संग्रह पिछले दिनों 2005 में भावना प्रकाशन से आया। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनूदित पुस्तक ‘साम्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मूलन’ छपकर आया। अनिल सिन्हा जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। जन संस्कृति मंच उŸार प्रदेश के पहले सचिव के रूप में सांस्कृतिक आंदोलन का उन्होंने नेतृत्व किया था। इस समय वे उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे क्रान्तिकारी जनवादी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। भाकपा ;मालेद्ध से उनका जुड़ाव उस वक्त से था जब पार्टी भूमिगत थी।

अनिल सिन्हा को याद करते हुए उनके घनिष्ठ सहयोगी तथा कवि.पत्रकार अजय सिंह ने शोकसभा के मौके पर कहा कि अनिल सिन्हा से मेरा साथ सŸार के दशक के शुरू में ही हो गया था। हमने सांस्कृतिक.राजनीतिक आंदोलनों में मिलकर काम किया। लखनऊ से जब अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ, हम यहीं आ गये। हमारी घनिष्ठता और बढ़ी। हमने यहाँ नवचेतना सांस्कृतिक संगठन बनाया। जन संस्कृति मंच, इंडियन पीपुल्स फ्रंट तथा भकपा ;मालेद्ध में हमने साथ काम किया। इन आंदोलनों में तपकर ही अनिल सिन्हा के रचनात्मक व वैचारिक व्यक्तित्व का निर्माण हुआ था। लेखन व पत्रकारिता के साथ ही अनिल की चित्रकला व संगीत में भी गहरी रूचि थी। पिछले दिनों दिल्ली में शमशेर जन्मशती आयोजन के अवसर पर अनिल ने शमशेर की कलाकृतियों पर व्याख्यान दिया था। इससे कला के बारे में उसकी गहरी समीक्षा दृष्टि का पता चलता है। अनिल के इस तरह असमय हमारे बीच से चले जाने से जो सूनापन पैदा हुआ है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा।

अनिल सिन्हा को याद करते हुए वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि अनिल सिन्हा शान्त स्वभाव के बेहतर इन्सान थे। आत्मप्रचार से दूर उनका लेखन सादगी व संघर्ष का लेखन है। उनका व्यक्तित्व ऐसा रहा है जिस पर आप भरोसा कर सकते हैं। आज के समय में ऐसे इन्सान का मिलना कठिन होता जा रहा है। वे मानवीयता के ऐसे उदाहरण हैं जिनसे सीखा जा सकता है।

प्रगतिशील लेखक संघ की ओर अनिल सिन्हा को श्रद्धांजलि देते हुए आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि 1980 के बाद अमृत प्रभात में काम करते हुए राकेश के साथ अनिल सिन्हा से हर इतवार को हमारी मुलाकात हुआ करती थी। हमारे बीच कला, साहित्य तथा वामपंथी राजनीति को लेकर विचार.विमर्श होता था। विचारों की साफगोई उनके लेखन में हमें देखने को मिलती है। वे एक अच्छे समीक्षक थे। उन दिनों मैं ‘प्रयोजन’ साहित्यिक पत्रिका निकालता था। इस पत्रिका को उनका सहयोग व सुझाव मिला। उन्होंने अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ की समीक्षा की थी। अनिल सिन्हा का नजरिया मूलतः समाज को बदलने का रहा है। उनका लेखन व पत्रकारिता इसी के प्रति प्रतिबद्ध है।

जनवादी लेखक संघ की ओर से ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव ने श्रद्धासुमन अर्पित किये।। उनका कहना था कि अनिल सिन्हा अत्यन्त सक्रिय रचनाकार थे। इनके जीवन में कोई दोहरापन नहीं था। जो अन्दर था, वही बाहर। आज के दौर में ऐसे रचनाकार का मिलना कठिन है। आज तो हालात ऐसी है कि दो.चार रचनाएँ क्या छपी, लेखक महान बनने की महत्वाकांक्षा पालने लगते हैं। अनिल सिन्हा इस तरह की महत्वकांक्षाओं से दूर काम में विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे, साहित्य की राजनीति से दूर। इसीलिए उपेक्षित भी रहे।

हिन्दी.उर्दू लेखक शकील सिद्दीकी का कहना था कि लखनऊ के जिन दो रचनाकारों के व्यक्तित्व ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया, वे अनिल सिन्हा व मोहन थपलियाल थे। ये दोनों विश्वसनीय व्यक्ति थे। अनिल सिन्हा ने गलत को कभी स्वीकार नहीं किया। उनकी खूबी यह भी थी कि अपने विरोध को भी बड़ी शालीनता से दर्ज कराते थे। कथाकार शिवमूर्ति ने अनिल सिन्हा को याद करते हुए कहा कि रेणुजी भी पटना में लम्बी मूर्छा में रहते हुए दिवंगत हुए। उनके निधन ने सबको मर्माहत किया तथा बड़ी भारी रिक्तता छोड़ी। अनिल सिन्हा ने फिर वही कथा दोहराई है। इनकी बातचीत तथा व्यवहार में जो शीतलता व शान्ति थी, वह सचमुच अदभुत थी। ये बातचीत में न सिर्फ अपनी बात कहते बल्कि दूसरों को सुनने का स्पेस भी प्रदान करते।

अनिल सिन्हा के पुत्र शाश्वत सिन्हा ने इस मौके पर कहा कि मेरे पापा बेटे.बेटियो के बीच कोई फर्क नहीं करते थे और हम सभी के साथ उनका रिश्ता दोस्तों जैसा था। सात साल से मैं अमरीका में हूँ। वे इतने संवेदनशील थे कि फोन पर ही वे बातचीत से ही मेरी समस्याओं को, यहाँ तक कि मेरी खामोशी को भी पढ़ लेते थे। पापा जिस पारिवारिक परिवेश से आये थे, वह सामंती व धार्मिक जकड़न भरा था। उन्होंने इस जकड़न के खिलाफ संघर्ष करके अपने को आधुनिक व प्रगतिशील बनाया था। उन्होने यही संस्कार हमें दिये। आज हमारे लिए बड़ी चुनौती है कि पापा ने सच्चाई, सहजता, आत्मीयता, मानवता व जनपक्षधरता के जो मूल्य सहेजे थे, उन्हें हम कैसे जियें, अपने जीवन में हम उन्हें कैसे सफलीभूत करें।

इस अवसर पर पी यू सी एल व राही मासूम रजा अकादमी की ओर से कवयित्री.पत्रकार वंदना मिश्र, एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन, कथाकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा, लखनऊ विश्वविद्दालय के प्रो0 रमेश दीक्षित, जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवयित्री शोभा सिंह, जसम दिल्ली इकाई की सचिव पत्रकार भाषा सिंह, पत्रकार महेश पाण्डेय व अनुराग सिंह, कवि अशोक चन्द्र व भगवान स्वरूप कटियार आदि ने भी अनिल सिन्हा को अपनी शोक संवेदना प्रकट की तथा अपने विचार रखे।

वक्ताओं का कहना था कि अनिल सिन्हा बेहतर व मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्वास रखने वाले रचनाकार हैं। वे मानते रहे हैं कि एक रचनाकार का काम हमेशा बेहतर समाज का निर्माण करना है, उसके लिए संघर्ष करना है। उनका लेखन इसी लक्ष्य को समर्पित है। इसीलिए अनिल सिन्हा जैसे रचनाकार कभी नहीं मरते। अपने काम और विचारों के साथ हमेशा हमारे बीच जिन्दा रहते हैं। ये हमारे आंदोलन के ऐसे प्रकाश स्तम्भ हैं जो हमें आगे बढ़ने की रोशनी दिखाते हैं।


दोस्तों के दोस्त - अनिल सिन्हा

भगवान स्वरूप कटियार

हरदिल अजीज वरिश्ळ पत्रकार- लेखक साथी अनिल सिन्हा के आकस्मिक निधन से मीडिया जगत समेत साहित्य,कला तथा संस्कृतिकर्मियों की दुनिया को गहरा झटका लगा है.यह एक
अप्रत्याषित स्तब्ध करने वाला आघात है.उन्होंने गत ्25 फरवरी 2011 को दिन में 11.50 पर्
पटना के मगध अस्पताल में अन्तिम सांस ली और जिन्दगी की ही तरह ही मौत से भी लडते
हुए हम सबका साथ छोड दिया.चलते- फिरते किसी हरदिल अजीज इंसान का अनायास चले
जाना दुखद और स्तब्धकारी तो है ही अविष्वसनीय भी लगता है.

अनिलजी गत 21 फरवरी को अपनी पत्नी आषा जी के साथ अपनी छोटी बहिन और उसके परिवार से मिलने पटना जा रहे थे .पटना से उनका गहरा जुडाव और लगाव था.उनके अधिकांष परिजन पटना में ही रह्ते थे. उनकी षुरुआती जिन्दगी पटना से ही प्रारम्भ हुई थी.रास्ते में पटना जाते हुए मुगलसराय के आसपास सोते में उन्हें ब्रेनसट्रोक हुआ जिसका पता तब चला जब उनकी पत्नी आषाजी ने हांथ पकड कर उळाना चाहा पर उळने के बजाय उनका हांथ निर्जीव होकर गिर गया.आषाजी के दुख और मनास्थिति की हम कल्पना कर सकते हैं.उन्होंने तुरन्त पटना में अपने रिष्तेदारों को फोन करके कहाकि पटना स्टेषन पर डाक्टर और एम्बुलेंस लेकर आजांय .

पटना पहुंच कर मगध अस्पताल में अनिलजी का इलाज षुरू हुआ जहां चिकत्सकों ने बताया कि इनके ब्रेनस्टेम में क्लोटिंग हो गयी है जिसका इलाज क्लोटिंग होने के तीन घंटे की अन्दर ही संभव है ,यह इलाज भी सिर्फ दिल्ली ,बम्बई और कोलकता में ही संम्भव है.अनिलजी डीप कोमा में चले गये .खबर मिलते ही दोनो बेटियां ऋतु,निधि दोनों दामाद अनुराग और अरषद पटना पहुंच चुके थे.सपोर्टिव ट्रीट्मेन्ट चल रहा था.सभी लोग इस इंतजार में थे कि वे कोमा से बाहर आयें तो दिल्ली ले जायं .पर वेन्टीलेटर पर रह्ते हुए कोमा की स्थिति में मरीज को कहीं षिफ्ट करना संभव नहीं होता है.षाष्वत और दिव्या भी अमेरिका से पटना के लिए रवाना हो चुके थे.सबके चेहरंो़ पर् गहरी चिंता और उदासी के साथ दिलों में एक उम्मीद पल रही थी.जिस किसी को खबर मिलती चिन्ता और षोक में डूब जाता.यह सब कैसे हो गया अचानक अप्रत्याषित.लखनऊ में हम सब षमषेर,केदार नागार्जुन जन्मषती समारोह की तैयारी में जुटे थे.इस कायर््ाक्रम की सारी परिकल्पना एवं तैयारी अनिलजी की ही थी ,सारे वक्ताओं से उन्होंने व्यक्तिगत सम्पर्क कर कार्यक्रम में षिरकत के लिए आग्रह किया था. अनिल छोट-बडे सबके दिलों के बहुत करीब थे इसलिए इस आघात से सभी आहत थे.
हम और कौषल जी दोनों 24फरवरी को सुबह आळ बजे पटना के मगध अस्पताल पहुंच चुके थे.अस्पताल के तीसरे तल के आई.सी.यू. वार्ड के बैड नम्बर 9 पर अनिलजी अचेत
अवस्था में लेटे हुए थे.उनके षरीर के सारे अंग ळीक से काम कर रहे थे सिर्फ दिमाग के सिवा. दिमाग से काम भी तो बहुत लिया था उन्होने .लिखने-पढने के अलावा अपने दोस्तों और समाजिक सरोकारों की चिन्ताओं का बोझ उन्होने अपने नाजुक् से दिमाग पर ले रखा था. अनिलजी पूरी तरह अचेत थे और डीप कोमा थे. पर चेहरे पर वही सादगी का तेज,सौम्यता ,भोलापन और वेलौस दोस्ती का भाव रोषनी की चमक की तरह मौजूद था .हम सब की एक ही चिंता थी कि अनिलजी कोमा से बाहर आयें . पट्ना के सारे पत्रकार,चित्रकार.संस्कृतिकर्मी लेखक् तथा राजनैतिक मित्र जो भी सुनता पटना के मगध अस्पताल की ओर बदहवास सा भागता चला आता .कैसे हैं अनिलजी कब तक ळीक होंगे. उनकी हम सबको बेहद जरूरत है.पटना रेडियो उनकी बीमारी का बुलटिन लगातार प्रसारित कर रहा था.दिल्ली और लखनऊ के पत्रकार ,लेखक और संास्कृतिकर्मी कौषलजी से लगातार फोन पर हालचाल ले कर चिन्तित हो रहे थे. मंगलेष डबराल,वीरेन्द्र यादव, अमेरिका से इप्टा के राकेष सभी लोग लगातार अजय सिंह से फोन पर हालचाल ले रहे थे और चिंतित हो रहे थे.गंगाजी,गौड्जी, आर के सिन्हा आदि लगातार फोन पर हालचाल ले रहे थे और दुखी हो रहे थे. पटना में आलोक धन्वा का हाल तो बेहद बुरा था.आई़.सी.यू़. में वे अनिलजी को चिल्ला चिल्ला कर बुलाते हुए रो पडे. लगभग सभी का एक जैसा हाल था .जो नहीं रो रहे थे ,वे अन्दर से रो रहे थे.अनिलजी के दोस्तों की दुनियंा लुट रही थी.सब अपने को कंगाल महसूस कर रहे थे. दोस्तों के दोस्त ,हमारे सुख-दुख के सच्चे साथी ,हमारी हर लडाई के अग्रणी योध्दा अनिल सिन्हा का अचानक अप्रत्याषित ढंग हमारे बीच से चला जाना हम सब के लिए एक गहरा आघात है .उनके जैसा सादा - सच्चा इंसानी इंसान भला हमें कहां मिलेगा . संघर्श में तपा निर्मल व्यक्तित्व ,क्रान्तिकारी वाम राजनीत और संस्कृतिकर्म के अथक योध्दा अनिल सिन्हा अपने पीछे कितना सूनापन छोड गये हैं इसका अंदाजा लगाना बहुत मुष्किल है. बेषक हमने एक मजबूत ,प्रतिबध्द और ऊर्जावान् ऐसा साथी खोया है जिससे हमारे सांस्कृतिक आन्दोलनों अभी बहुत कुछ मिलना था और नई पीढी को बहुत कुछ सीखना था . वे सत्तर के दषक के बाद चले संास्कृतिक आन्दोलन के हर पडाव के साक्षी ही नहीं निर्माता भी थे . वे कलाओं के अन्तर्सम्बधों पर जनवादी प्रगतिषील नजरिये से गहन विचार और समझ विकसित करने वाले विरले समीक्षक थे . वे मूल्यनिश्ळ पत्रकारिता के मानक थे ण्

साथी अनिल सिन्हा का जन्म 11 जनवरी 1942 को जहानाबाद ,गया, बिहार में हुआ था . उन्होंने पटना युनीवर्सिटी 1962 में हिन्दी में एम.ए. किया था . युनीवर्सिटी की चाटुकारिता पूर्ण घटिया राजनीत से क्षुब्ध होकर उन्होंने अपना पी एच डी कर्म अधूरा छोड दिया .उन्होने कई तरह के महत्वपूर्ण कार्य किये थे. प्रूफरीडिंग , प्राध्यापकी ,विभिन्न विशयों पर षोध जैसे कार्य उन्होंने किये थे . सत्तर के दषक में उन्होंने पटना से “विनिमय“ नाम की साहित्यिक पत्रिका का संपादन और प्रकाषन किया जो अपने समय की चर्चित पत्रिका रही है . वे आर्यावर्त, आज , ज्योत्सना, जन, दिनमान से बतौर लेखक एवं पत्रकार जुडे रहे . वर्श 1980 में जब लकनऊ से अमृत प्रभात निकलना षुरू हुआ ,उन्होंने इसमे काम करना षुरू किया.तब से लखनऊ उनका स्थायी निवास बन गया .वे लाखनऊ के महानगर , इन्दिरा नगर आदि मुहल्लों में अपने साथियों के साथ रहे . अन्त में 3/30 पत्रकारपुरम गोमती नगर में उनका स्थायी आषियाना बन गया .उनका घर भी उन्ही की तरह सादगी और नैसर्गिक सौन्दर्य से भरपूर सचमुच घर है महज मकान नहीं .

अमृत प्रभात बन्द होने के बाद उन्होंने लखनऊ में नव भारत टाइम्स ज्वाइन किया जिसमें वे बन्द होने तक काम करते रहे . नव भारत टाइम्स बन्द होने के बाद वे विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन करते रहे .हिन्दुस्तान की अधिकांष पत्र- पत्रिकाओं अनिलजी का लिखा प्रकाषित हुआ है. उनके लेखन में सादगी और धार दोनो थे .राश्ट्रीय सहारा में उन्होंने सृजन पृश्ळ का भी संपादन किया . कहानी ,समीक्षा, आलोचना, कला समीक्षा ,भेंटवार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में काम किया. उनका कहानी संग्रह “मळ“ 2005 में भावना प्रकाषन से प्रकाषित हुआ. उनकी ”हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप, एवं संभावनाएं“भी प्रकाषित हुई जो पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण पुस्तक है. उनका अनुवाद कार्य “साम्राज्यवाद का विरोध और जातियों का उन्मूलन“ अभी हाल ही में ग्रंथषिल्पी से प्रकाषित होकर आया है. अनिल सिन्हा एक बेह्तर इंसानी दुनिया बनाने के लिए निरन्तर संघर्श में विष्वास रखते थे .उनका मानना था कि रचनाकार का काम हमेषा एक बेहतर समाज की तामीर करना है,उसके लिए लडना और संघर्श करना है. उनका संपूर्ण रचनाकर्म इस ध्येय को समर्पित था. वे जनसंस्कृति मंच के संस्थापकों में थे. वे उत्तर प्रदेष जनसंस्कृति मंच के प्रथम सचिव रहे और उन्होंने संास्कृतिक आन्दोलनों का क्रान्तिकारी नेतृत्व किया. वे जनवादी आन्दोलनों के प्रकाषस्तम्भ थे . इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे क्रान्तिकारी संगळनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. भाकपा (माले) से उनका जुडाव उस समय से है जब वह भूमिगत संगळन था. उनका 3/30 पत्रकारपुरम गोमती नगर हम सब के लिए एक ऐसा छायादार दरख्त था जिसकी ळंडी छांव में हम सब साहित्य- संस्कृतिकर्मी आश्रय और दिषा पाते थे.

हमें उनकी विरासत पर गर्व है उसे जिन्दा रखने और आगे बढाने के लिए हम संकल्प बध्द हैं. अनिल सिन्हा जैसे साथी कभी नहीं मरते . अपने काम और विचारों के साथ वे सदैव हमारे बीच हमारे साथ रहें गे.उनका दोस्ताना लहजा और अपनापन सदैव हमारे साथ रहेगा जो हमें हर मोड पर ताकत, दिषा और प्रेरणा देता रहेगा.

बुधवार, 2 मार्च 2011

गोरखपुर में अनिल सिन्हा की स्मृति में शोक सभा

संस्कृति कर्मियों के लिए प्रकाश स्तम्भ थे



गोरखपुर। जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य, कला समीक्षक, पत्रकार एवं कथाकार अनिल सिन्हा के निधन पर शनिवार (26 feb ko )को प्रेमचन्द पार्क में हुई एक शोक सभा में शहर के साहित्यकारों, संस्कृति कर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें श्रद्धाजंलि दी।
वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन की अध्यक्षता में जनसंस्कृति मंच द्वारा आयोजित इस शोक सभा में वक्ताओं ने कहा कि जन संस्कृति मंच के कर्मठ और विचारवान साथी अनिल सिन्हा आजीवन प्रगतिशील मूल्यों के लिए संघर्ष करते रहे। वह अपनी विचारधारात्मक प्रतिबद्धता और जन पक्षधरता से कभी डिगे नहीं। वह जसम के संस्थापक सदस्य, उत्तर प्रदेश इकाई के पहले सचिव और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे। उनका संगठन की गतिविधियों के प्रति उत्साह सबके लिए प्रेरणास्पद थां। उन्होंने एक प्रतिभाशाली और प्रखर पत्रकार के रूप में कई पत्र-पत्रिकाओं, अमृत प्रभात, नव भारत टाइम्स आदि में काम किया। राष्ट्रीय सहारा के स्थानीय संस्करण में सर्जना नामक स्तम्भ लिखा। उन्होंने 70 के दशक में पटना से विनिमय नाम की साहित्यिक पत्रिका निकाल लघुपत्रिका आन्दोलन में योग दिया। उनकी कहानियों का एक संग्रह मठ चर्चित रहा. उनकी सर्जानात्मक रुचियों की परिधि बहुत व्यापक थी जिसमें पत्रकारिता से लेकर चित्रकला, सिनेमा जैसे माध्यम भी शामिल थे। सीपीआई एमएल के साथ उनका गहरा और पुराना रिश्ता था।
शोक सभा में युवा आलोचक कपिलदेव ने कहा कि अनिल सिन्हा ने माक्र्सवादी विचारधारा को संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरूप में उतारने का जीवन भर प्रयास किया। उन्होंने अनिल सिन्हा की स्मृति में उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर आयोजन का सुझाव दिया। शोक सभा की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार मदनमोहन ने जनसंस्कृति मंच की स्थापना के दौरान अनिल सिन्हा की सक्रियता को याद करते हुए कहा कि विचारधारा और संस्कृति कंे अन्तर सम्बन्धों को लेकर उनकी उनसे काफी संवाद रहा; उनका सम्पूर्ण लेखन जनता की मुक्ति के लिए था; वह जितने सरल व सादे थे वैचारिक रूप यसे उतने ही दृढ थे। शोक सभा मे दो मिनट मौन रखकर अनिल सिन्हा को श्रद्धाजलि दी गई। शोक सभा का संचालन करते हुए जनसंस्कृति मंच के प्रदेश सचिव मनोज कुमार सिंह ने कहा कि अनिल सिन्हा उन जैसे युवा संस्कृति कर्मियों के लिए प्रकाश स्तम्भ थे। शोक सभा में पत्रकार अशोक चैधरी, वेद प्रकाश, रंग कर्मी आरिफ अजीज लेनिन, अशोक राव, बैजनाथ मिश्र, भाकपा माले के जिला सचिव राजेश साहनी, हरिद्वार प्रसाद, बैजनाथ मिश्र, गोपाल राय, पीयूएचआर के जिला सचिव श्याममिलन आदि उपस्थित थे।

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

जाने - माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे























प्रिय साथियों,
अबतक आप सबको साथी अनिल सिन्हा के असमय गुज़र जाने का अत्यंत दुखद समाचार मिल चुका होगा.. अनिल जी जैसा सादा और उंचा इंसान , उनके जैसा संघर्ष से तपा निर्मल
व्यक्तित्व, क्रांतिकारी वा
म राजनीति और संस्कृति -कर्म का अथक योदधा अपने पीछे कितना बड़ा सूनापन छोड़ गया है, अभी इसका अहसास भी पूरी तरह नहीं हो पा रहा. यह भारी दुःख जितना आशा जी, शाश्वत, ऋतु,निधि,अनुराग , अरशद और अन्य परिजन तथा मित्रों का है उतना ही जन संस्कृति के सभी सह-कर्मियों का भी. हमने एक ऐसा साथी खोया है जिससे नयी पी
ढी को बहुत कुछ सीखना था, कृतित्व से भी और व्यक्तित्व से भी. हमारे सांस्कृतिक आन्दोलन के हर पड़ाव के वे साक्षी ही नहीं, निर्माताओं में थे. कलाओं के अंतर्संबंध पर जनवादी- प्रगतिशील नज़रिए से गहन विचार और समझ विकसित करनेवाले विरले समीक्षक, मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के मानक व्यक्तित्व के रूप में वे प्रगतिशील संस्कृति कर्म के बाहर के भी दायरे में अत्यंत समादृत रहे. उनके रचनाकार पर तो अलग से ही विचार की ज़रुरत है. जन संस्कृति मंच अपने आन्दोलन के इस प्रकाश स्त
म्भ की विरासत को आगे बढाने का संकल्प लेते हुए कामरेड अनिल सिन्हा को श्रद्धांजलि व्यक्त करता है. हम साथी कौशल किशोर द्वारा अनिल जी के जीवन और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने वाली संक्षिप्त टिप्पणी नीचे दे रहे हैं. यह
टिप्पणी और अनिल जी की
तस्वीर अटैचमेंट के रूप में भी आपको संप्रेषित कर रहा हूँ. प्रणय कृष्ण, महासचिव , जन संस्कृति मंच

जाने - माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे

लखनऊ, 25 फरवरी। जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। आज 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हुआ। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से
पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए अखिरकार आज उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा। उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद आदि सहित जमाम जगहों में लेखको, संस्कृ
तिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।
ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना विशविद्दालय से 1962 में एम. ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। विश्वविद्दालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्हों
ने अपना पी एच डी बीच में ही छोड़ दिया। उन्होंने कई तरह के काम किये। प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से वे जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण, रीवाँ के भी वे स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने वह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर, मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे हैं। वे मानते रहे हैं कि एक रचनाकार का काम हमेशा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है, उसके लिए संघर्ष करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है। वे जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वे उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वे जन संस्कृति मंच उŸार प्रदेश के पहले सचिव थे। वे क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा ;मालेद्ध से भी जुड़े थे। इंडियन नीनुल्स फ्रंट जेसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।
कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नम से उनका कहानी संग्रह पिछले दिनों 2005 में भावना प्रकाशन से आया। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘सामा्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मुलन’ छपकर आया थ। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है। उनका रचना संसार बहुत बड़ा है , उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के
अन्तिम दि
नों तक वे अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27 फरवरी को लखनऊ में आयोजित शमशेर, नागार्जुन व केदार जन्तशती आयोजन के वे मुख्य कर्मा.णर्ता थे।

उनके निधन पर शेक प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी रायअशोक भैमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप् कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीष चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रेश्वर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंक राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय आदि रचनाकार प्रमुख हैं। अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सृर्जनात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमे इतनी वैचारिक
प्रतिबद्धता और सृर्जनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ



जन संस्कृति मंच के कर्मठ और विचारवान साथी अनिल सिन्हा का आज 25 फरवरी को पूर्वान्ह 11 बजे निधन हो गया. 11 जनवरी, 42 को पैदा हुए अनिल जी ने पटना विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की और तभी प्रगतिशील मूल्यों के लिए संघर्ष करने वाली सामाजिक शक्तियों के साथ सहयोग करने का संकल्प लिया. वे आजीवन इस संकल्प को निभाते रहे. वे कभी अपनी विचारधारात्मक प्रतिबद्धता और जन पक्षधरता से कभी डिगे नहीं. वे ज स म के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. ज स म की उत्तर प्रदेश इकाई के पहले सचिव के रूप में उन्होंने ज स म को सक्रिय करने में जो भूमिका निभाई, वह अविस्मरणीय है. ज स म की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के महत्वपूर्ण अंग के रूप में वे अभी भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे. लगभग एक वर्ष पहले उन्हें पक्षाघात हुआ था लेकिन उसके बाद भी संगठन की गतिविधियों के प्रति उनका उत्साह हम सब के लिए बेहद प्रेरणापद था. यह उनके मनोबल और अदम्य जिजीविषा का परिणाम था कि उनका स्वास्थ्य सुधर रहा
था. ज स म की गतिविधियों में पूर्ववत
उत्साह के साथ उनकी भागीदारी देखकर हमलोग उनसे बराबर आशान्वित रहते थे. आज उनके आकस्मिक निधन के समाचार ने हम सब को हतसंज्ञ कर दिया. वे स्थाई तौर पर लखनऊ में रह रहे थे और पिछले दिनों एक विवाह में सम्मिलित होने पटना गए थे. वहीं से लौटने को थे कि एकाएक गंभीर रूप से पुनः अस्वस्थ हुए और वहीं पटना के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया.
अनिल जी ने एक प्रतिभाशाली और प्रखर पत्रकार के रूप में भी कई पत्र-पत्रिकाओं, अमृत प्रभात, न भा टा आदि
में काम किया. राष्ट्रीय सहारा के स्थानीय संस्करण में सर्ज़ना नामक एक स्तम्भ लिखते रहे. उन्होंने 70 के दशक में पटना से विनिमय नाम की साहित्यिक पत्रिका निकाल लघुपत्रिका आन्दोलन में योग दिया. उनकी कहानियों का एक संग्रह मठ चर्चित रहा. उनकी सर्ज़ानात्मक रुचियों की परिधि बहुत व्यापक थी जिसमें पत्रकारिता से लेकर चित्रकला, सिनेमा जैसे माध्यम भी शामिल थे. सी पी आई एम एल के साथ उनका गहरा और पुराना रिश्ता था. कठिन दिनों में भी वे संगठन के साथी रहे. ऐसे प्रतिबद्ध और अविचलित रहने वाले अपने प्रखर साथी के न रहने पर जो क्षति हमें हुई है, वह अपूरणीय है. हम अनिल जी के शोकाकुल परिवार के लिए कामना करते हैं कि उन्हें यह दुःख
सहने की शक्ति मिले.

प्रो. राजेन्द्र कुमार
(अध्यक्ष)
ज स म उत्तर प्रदेश

यूं ले गये भाई अनिल सिन्हा? 23 जनवरी के ई-मेल में आप ने वादा किया था कि 25 फरवरी को लखनऊ आ जाऊंगा । आना तो दूर, दा-सदा के लिए शरीरिक दूरी बना ली । आप थे तो पत्रकारपुरम की ओर अनायास मुड़ जाता था । जाता तो भाभी जी बहुत कुछ जबरदस्ती खिलाती और आप बहुत प्यार से घर-परिवार, देश-समाज, साहित्य-संस्कृति पर बोलते-बतियाते । क्या बताऊं, लखनऊ बसने के बाद, आप का होना, अभिभावक का होना था । इतनी जल्दी टुअर कर चल दिए । जाइए, मैं नहीं बोलता आप से ? यह भी कोई बात हुई । जब मैं बीमार था पिछले दिनों, कितनी बार देखने आये थे आप ? साथ में भाभी जी भी थीं । अब ? कौन देखेगा मुझे । अब तो मुझे पक्का विश्वास है कि आप लोकरंग में भी नहीं आयेंगे । अब तक तो आप आते ही रहे, बेहतर करने के बारे में सिखाते रहे । अब ? क्या करूं फोल्डर से नाम निकाल दूं ? लेकिन दिल में जो कसक है उसका क्या ? दिल के फोल्डर जो आप की स्मृति है उसका क्या ? पटना आपकी कर्मभूमि थी, वहां जाकर आपने चीरनिद्रा ग्रहण कर ली । अब आप के चाहने वाले, आपके संगी-साथियों पर जो बीत रही है उसके बारे कुछ तो विचार किये होते । विगत तीन दिनों से मन खटक रहा था पर एक विश्वास भी कि आप आयेंगे जरूर । कुछ दिन पूर्व ही आप ने 27 फरवरी के कार्यक्रम के लिए मुझसे मैंनेजर पाण्डेय का रेलवे आरक्षण कराने को कहा था जिसे मैंने तत्काल करा कर भेज दिया था । अब आप के कारण वह सब खत्म । संचालक तो आप ही थे ? ऐसा धोखा ? मुझे तो अब भी विश्वास नहीं होता कि आप ऐसा करेंगे ? जाइये मैं आप से नहीं बोलता ... । ----मेरे भा...ई

सुभाष चन्द्र कुशवाहा



सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

गोरख पांडेय स्मृति संकल्प


जसम, उ.प्र. का पांचवा राज्य सम्मेलन

गोरख स्मृति संकल्प और जसम, उत्तर प्रदेश का पांचवा राज्य सम्मेलन 29-30 जनवरी 2011 को कवि गोरख पांडेय के गांव में संपन्न हुआ। गोरख के गुजरने के 21 साल बाद जब पिछले बरस लोग देवरिया जनपद के इस
‘पंडित का मुंडेरा’ गांव में जुटे थे, तब करीब 65 लोगों ने गोरख से जुड़ी अपनी यादों को साझा किया था। इस बार भी वे उत्प्रेरक यादें थीं। उनके सहपाठी अमरनाथ द्विवेदी ने संस्कृत विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष और बीचयू में एक आंदोलनकारी छात्र के बतौर उनकी भूमिका को याद किया। उन्होंने बताया कि गोरख अंग्रेजी के वर्चस्व के विरोधी थे, लेकिन हिंदी के कट्टरतावाद और शुद्धतावाद के पक्षधर नहीं थे। बीचयू में संघी कुलपति के खिलाफ उन्होंने छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण उन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन की यातना भी झेलनी पड़ी। साम्राज्यवादी-सामंती शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए उन्होंने नक्सलवादी आंदोलन का रास्ता चुना और उसके पक्ष में लिखा। जहां भी जिस परिवार के संपर्क में वे रहे उसे उस आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की। भर्राई हुई आवाज में राजेेंद्र मिश्र ने उनकी अंतिम यात्रा में उमड़े छात्र-नौजवानों, रचनाकारों और बुद्धिजीवियों के जनसैलाब को फख्र से याद करते हुए कहा कि मजदूरों और गरीबों की तकलीफ से वे बहुत दुखी रहते थे। फसल कटाई के समय वे हमेशा उनसे कहते कि पहले वे अपनी जरूरत भर हिस्सा घर ले जाएं, उसके बाद ही खेत के मालिक को दें। पारसनाथ जी के अनुसार वे कहते थे कि अन्याय और शोषण के राज का तख्ता बदल देना है और सचमुच उनमें तख्ता बदल देने की ताकत थी। गोरख की बहन बादामी देवी ने बड़े प्यार से उन्हें याद किया। उन्हें सुनते हुए ऐसा लगा जैसे गोरख की बुआ भी वैसी ही रही होंगी, जिन पर उन्होंने अपनी एक मशहूर कविता लिखीथी।

जसम महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिस संगठन को गोरख ने बनाया था उसकी तरफ से उनकी कविता और विचार की दुनिया को याद करते हुए खुद को नई उर्जा से लैस करने हमलोग उनके गांव आए हैं। गोरख ने मेहनतकश जनता के संघर्ष और उनकी संस्कृति को उन्हीं की बोली और धुनों में पिरोकर वापस उन तक पहुंचाया था। उन्होंने सत्ता की संस्कृति के प्रतिपक्ष में जनसंस्कृति को खड़ा किया था, आज उसे ताकतवर बनाना ही सांस्कृतिक आंदोलन का प्रमुख कार्यभार है। इसके बाद ‘जनभाषा और जनसंस्कृति की चुनौतियां’ विषय पर जो संगोष्ठी हुई वह भी इसी फिक्र से बावस्ता थी।

आलोचक गोपाल प्रधान दो टूक तरीके से कहा कि हर चीज की तरह संस्कृति का निर्माण भी मेहनतकश जनता करती है, लेकिन बाद में सत्ता उस पर कब्जा करने की कोशिश करती है। भोजपुरी और अन्य जनभाषाओं का बाजारू इस्तेमाल इसलिए संभव हुआ है कि किसान आंदोलन कमजोर हुआ है। समकालीन भोजपुरी साहित्य के संपादक अरुणेश नीरन ने कहा कि जन और अभिजन के बीच हमेशा संघर्ष होता है, जन के पास एक भाषा होती है जिसकी शक्ति को अभिजन कभी स्वीकार नहीं करता, क्योंकि उसे स्वीकार करने का मतलब है उस जन की शक्ति को भी स्वीकार करना।

कवि प्रकाश उदय का मानना था कि सत्ता की संस्कृति के विपरीत जनता की संस्कृति हमेशा जनभाषा में ही अभिव्यक्त होगी। कवि बलभद्र की मुख्य चिंता भोजपुरी की रचनाशीलता को रेखांकित किए जाने और भोजपुरी पर पड़ते बाजारवादी प्रभाव को लेकर थी। प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि जीवित संस्कृतियां सिर्फ यह सवाल नहीं करतीं कि हम कहां थे, बल्कि वे सवाल उठाती हैं कि हम कहां हैं। आज अर्जन की होड़ है, सर्जन के लिए स्पेस कम होता जा रहा है। सत्ता की संस्कृति हर चीज की अपनी जरूरत और हितों के अनुसार अनुकूलित करती है, जबकि संस्कृति की सत्ता जनता को मुक्त करना चाहती है। प्रेमशीला शुक्ल ने जनभाषा के जन से कटने पर फिक्र जाहिर की। विद्रोही जी ने कहा कि हिंदी और उससे जुड़ी जनभाषाओं के बीच कोई टकराव नहीं है, बल्कि दोनों का विकास हो रहा है। हमें गौर इस बात पर करना चाहिए कि उनमें कहा क्या जा रहा है।

संगोष्ठी के अध्यक्ष और सांस्कृतिक-राजनैतिक आंदोलन में गोरख के अभिन्न साथी रामजी राय ने कहा कि गोरख उन्हें हमेशा जीवित लगते हैं, वे स्मृति नहीं हैं उनके लिए। जनभाषा में लिखना एक सचेतन चुनाव था। उन्होंने न केवल जनता की भाषा और धुनों को क्रांतिकारी राजनीति की उर्जा से लैस कर उन तक पहुंचाया, बल्कि खड़ी बोली की कविताओं को भी लोकप्रचलित धुनों में ढाला, ‘पैसे का गीत’ इसका उदाहरण है। अपने पूर्ववर्ती कवियों और शायरों की पंक्तियों को भी गोरख ने बदले हुए समकालीन वैचारिक अर्थसंदर्भों के साथ पेश किया। रामजी राय ने कहा कि जनभाषाएं हिंदी की ताकत हैं और बकौल त्रिलोचन हिंदी की कविता उनकी कविता है जिनकी सांसों को आराम न था। सत्ता के पाखंड और झूठ का निर्भीकता के साथ पर्दाफाश करने के कारण ही गोरख की कविता जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुई। ‘समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई’ संविधान में समाजवाद का शब्द जोड़कर जनता को भ्रमित करने की शासकवर्गीय चालाकी का ही तो पर्दाफाश करती है जिसकी लोकप्रियता ने भाषाओं की सीमाओं को भी तोड़ दिया था, कई भाषाओं में इस गीत का अनुवाद हुआ। रामजी राय ने गोरख की कविता ‘बुआ के नाम’ का जिक्र करते हुए कहा कि मां पर तो हिंदी में बहुत-सी कविताएं लिखी गई हैं, पर यह कविता इस मायने में उनसे भिन्न है कि इसमें बुआ को मां से भी बड़ी कहा गया है। संगोष्ठी का संचालन आलोचक आशुतोष कुमार ने किया।

सांस्कृतिक सत्र में हिरावल (बिहार) के संतोष झा, समता राय, डी.पी. सोनी, राजन और रूनझुन तथा स्थानीय गायन टीम के जितेंद्र प्रजापति और उनके साथियों ने गोरख के गीतों का गायन किया। संकल्प (बलिया) के आशीष त्रिवेदी, समीर खान, शैलेंद्र मिश्र, कृष्ण कुमार मिट्ठू, ओमप्रकाश और अतुल कुमार
राय ने गोरख पांडेय, अदम गोंडवी, उदय प्रकाश, विमल कुमार और धर्मवीर भारती की कविताओं पर आधारित एक प्रभावशाली नाट्य प्रस्तुति की। आशीष मिश्र ने भिखारी ठाकुर के मशहूर नाटक विदेशिया के गीत भी सुनाए, इस दौरान लोकधुनों का जादुई असर से लोग मंत्रमुग्ध हो गए। इस अवसर पर एक काव्यगोष्ठी भी हुई, जिसमें अष्टभुजा शुक्ल, कमल किशोर श्रमिक, रमाशंकर यादव विद्रोही, राजेंद्र कुमार, कौशल किशोर, रामजी राय, प्रभा दीक्षित, चंद्रेश्वर, भगवान स्वरूप कटियार, डॉ. चतुरानन ओझा, सच्चिदानंद, मन्नू राय, सरोज कुमार पांडेय ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। संचालन सुधीर सुमन ने किया।

सम्मेलन में प्रतिनिधियों ने मनोज सिंह को जसम, उ.प्र. के राज्य सचिव और प्रो. राजेद्र कुमार को अध्यक्ष के रूप में चुनाव किया। इस अवसर पर एक स्मारिका भी प्रकाशित की गई है, जिसमें गोरख की डायरी से प्राप्त कुछ अप्रकाशित कविताएं, जनसंस्कृति की अवधारणा पर उनका लेख और उनके जीवन और रचनाकर्म से संबंधित शमशेर बहादुर सिंह, महेश्वर और आशुतोष के लेख और साक्षात्कार हैं।

इस बीच 29 जनवरी को बिहार के आरा और समस्तीपुर में भी गोरख की स्मृति में आयोजन हुए। आरा में काव्यगोष्ठी की अध्यक्षता कथाकार नीरज सिंह, आलोचक रवींद्रनाथ राय और जसम के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गंुजन ने की तथा संचालन राकेश दिवाकर ने किया। इनके अतिरिक्त सुमन कुमार सिंह, ओमप्रकाश मिश्र, सुनील श्रीवास्तव, के.डी. सिंह, कृष्ण कुमार निर्मोही, भोला जी, अरुण शीतांश, संतोष श्रेयांस, जगतनंदन सहाय, अविनाश आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया तथा युवानीति के कलाकारों ने गोरख के गीत सुनाए। समस्तीपुर में डॉ. सुरेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में गोरख की याद में आयोजित संकल्प संगोष्ठी में रामचंद्र राय ‘आरसी’, डॉ. खुर्शीद खैर, डॉ. मोईनुद्दीन अंसारी, डॉ. एहतेशामुद्दीन, डा. सीताराम यादव और डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने अपने विचार रखे।

सुधीर सुमन

रविवार, 23 जनवरी 2011

शमशेर की कवि‍ता में प्राइवेट-पब्‍लि‍क के बीच अंतराल नहीं : डंगवाल

नई दि‍ल्‍ली: शमशेर अपनी काव्य प्रेरणाओं को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जोड़ते हैं। उनकी कविता में प्राइवेट-पब्लिक के बीच कोई अंतराल नहीं है। उनसे हमें भौतिक दुनिया की सुंदर सच्चाइयों से वाबस्ता रहने की सीख मिली। 21 जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित दो दिवसीय शमशेर जन्मशती समारोह में ‘शमशेर और मेरा कविकर्म’ नामक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए चर्चित कवि वीरेन डंगवाल ने यह बात कही। इस संगोष्ठी से पूर्व शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और फैज की रचनाओं पर आधारित चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा बनाए गए पोस्टरों और जनकवि रमाशंकर विद्रोही की पुस्तक ‘नई खेती’ का लोकार्पण प्रसिद्ध आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय ने किया। डॉ. पांडेय ने कहा कि कविता को जनता तक पहुंचाने का काम जरूरी है। विद्रोही भी अपनी कविता को जनता तक पहुंचाते हैं। किसान आत्महत्याओं के इस दौर में ऐसे कवि और उनकी कविता का संग्रह आना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि चित्रकला के जरिए कविता को विस्तार दिया जा सकता है। इस मौके पर कवि कुबेर दत्त द्वारा संपादित शमशेर पर केंद्रित फिल्म का प्रदर्शन किया गया, जिसमें उनके समकालीन कई कवियों ने उनकी कविता के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे।

कवि अनामिका ने कहा कि शमशेर की कविताएं स्त्रियों के मन को छुने वाली हैं। वे बेहद अंतरंग और आत्मीय हैं। वे सरहदों को नहीं मानतीं। कवि मदन कश्यप ने उन्हें प्रेम और सौंदर्य का कवि बताते हुए कहा कि वह सामंती-धार्मिक मूल्यों से बनी नैतिकता को कविता में तोड़ते हैं, पर उसे सीधे चुनौती देने से बचना चाहते हैं। इसलिए उनकी प्रेम कविताओं में अमूर्तन है। त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि शमशेर संवेदनात्मक ज्ञान के कवि हैं। अपने ज्ञान और विचार को संवेदना को कैसे संवेदना के जरिए समेटा जाता है, हमारी पीढ़ी ने उनसे यही सीखा है। शोभा सिंह का कहना था कि शमशेर बेहद उदार और जनपक्षधर थे। स्वप्न और यथार्थ की उनकी कविताओं में गहरा मेल दिखाई पड़ता है। मार्क्सवाद के प्रति उनकी पक्षधरता थी और स्त्री की स्वतंत्र बनाने पर उनका जोर था। उनके प्रभाव से उनका कविता, मार्क्सवाद और जन-आंदोलन से जुड़ाव हुआ। इब्बार रब्बी ने शमशेर की रचनाओं और जीवन में निजत्व के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी काव्य पंक्तियां मुहावरे की तरह बन गई हैं। नीलाभ ने कहा कि शमेशर का व्यक्ति जिस तरह से जीवन को देखता है, उनकी कविता उसी का लेखाजोखा है। उनकी कविता में 1947 से पहले आंदोलन से उपजा आशावाद भी है और उसके बाद के मोहभंग से उपजी निराशाएं भी हैं। इसके साथ ही पार्टी और व्यक्ति का द्वंद्व भी। गिरधर राठी ने कहा कि भाषा और शब्दों का जैसा इस्तेमाल शमशेर ने किया, वह बाद के कवियों के लिए एक चुनौती-सी रही है। वे सामान्य सी रचनाओं में नयापन ढूंढ लेने वाले आलोचक भी थे। ऐसा वही हो सकता है जो बेहद लोकतांत्रिक हो। मंगलेश डबराल ने कहा कि शमशेर मानते थे कि कविता वैज्ञानिक तथ्यों का निषेध नहीं करती। उनकी कविता आधुनिकवादियों और प्रगतिवादियों- दोनों के लिए एक चुनौती की तरह रही है। कथ्य और रूप के द्वंद्व को सुलझाने के क्रम में हर कवि को शमशेर की कविता से गुजरना होगा। यद्यपि नागार्जुन के बाद उनकी कविता के सर्वाधिक पोस्टर बने, लेकिन वे जनसंघर्षों के नहीं, बल्कि संघर्षों के बाद की मुक्ति के आनंद के कवि हैं। संगोष्ठी का संचालन युवा कवि अच्युतानंद मिश्र ने किया।

दूसरे सत्र में काव्यपाठ की शुरुआत शमशेर द्वारा पढ़ी गई उनकी कविताओं के वीडियो के प्रदर्शन से हुई। काव्यपाठ की अध्यक्षता इब्बार रब्बी और गिरधर राठी ने की तथा संचालन आशुतोष कुमार ने किया। शोभा सिंह, कुबेर दत्त, दिनेश कुमार शुक्ल, लीलाधर मंडलोई, अनामिका, रमाशंकर यादव विद्रोही, राम कुमार कृषक, मदन कश्यप, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, पंकज चतुर्वेदी आदि ने अपनी कविताएं सुनाईं, जिनमें कई कविताएं शमशेर पर केंद्रित थीं।

समारोह के दूसरे दि‍न 22 जनवरी को आयोजि‍त कार्यक्रम कर अध्‍यक्षता करते हुए चर्चित मार्क्सवादी आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि‍ शमशेर की कविताएं विद्वानों के लेखों या शब्दकोशो के जरिए कम समझ में आती हैं, जीवन-जगत के व्यापक बोध से उनकी कविताएं समझ में आ सकती हैं। प्रगतिशील और गैरप्रगतिशील आलोचना में यह फर्क है कि‍ प्रगतिशील आलोचना रचना को समझने में मदद करती है, लेकिन गैरप्रगतिशील आलोचना रचना के प्रति समझ को और उलझाती है।

साहित्यालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि कठिन प्रकार में बंधी सत्य सरलता बिना किसी भीतर से जुड़ी़ विचारधारा के बिना संभव नहीं है। शमशेर का गद्य जीवन से जुड़ा गद्य है। वे जनसामान्य के मनोभाव की अभिव्यक्ति के लिए गद्य को प्रभावशाली मानते थे। गद्य ही सीमाएं को तोड़ता हैं। इसे मुक्ति का माध्यम समझना चाहिए। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि एक पल शमशेर की कविता में बहुत आता है, लेकिन यह असीम से जुड़ा हुआ पल है। काल के प्रति शमशेर का जो रुख है, वह बेहद विचारणीय है।

इलाहाबाद से आए आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि शमशेर ऐसे कवि थे जो अभावों से अपनी भावमयता को संपन्न करते रहे। तमाम किस्म की प्रतिकूलताओं से उनकी होड़ रही। वह हकीकत को कल्पना के भीतर से बाहर लाने की तमन्ना वाले कवि है। कवि-आलोचक सुरेश सलिल ने शमशेर, मुक्तिबोध, केदार और नागार्जुन जैसे कवियों को आपस में अलगाए जाने की कोशिशों का विरोध करते हुए इस पर जोर दिया कि इन सारे कवियों की सांस्कृतिक-वैचारिक सपनों की परंपरा को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है।

युवा कथाकार अल्पना मिश्र ने कहा कि शमशेर का गद्य पूरे जनजीवन के यथार्थ को कविता में लाने के लिए बेचैन एक कवि का वैचारिक गद्य है। यह गद्य जबर्दस्त पठनीय है। कला का संघर्ष और समाज का संघर्ष अलग नहीं है, इस ओर वह बार-बार संकेत करते हैं। युवा कथाकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि शमशेर केवल कवियों के कवि नहीं थे। नूर जहीर ने शमशेर से जुड़ी यादों को साझा करते हुए कहा कि हिंदी-उर्दू की एकता के वह जबर्दस्त पक्षधर थे। उर्दू के मिजाज को समझने पर उनका जोर था। गोबिंद प्रसाद ने शमशेर की रूमानीयत का पक्ष लेते हुए कहा कि उनके समस्त रोमान के केंद्र में मनुष्य का दर्द मौजूद है।

युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि शमशेर और अज्ञेय की काल संबंधी दृष्टियों में फर्क है। शमशेर एक क्षण के भीतर के प्रवाह को देखने की कोशिश करते हैं। उनकी कविता एक युवा की कविता है, जो हर तरह की कंडिशनिंग को रिजेक्ट करती है। कवि-पत्रकार अजय सिंह ने शमशेर संबंधी विभिन्न आलोचना दृष्टियों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शमशेर को गैरवामपंथी वैचारिक प्रवृत्तियों से जोड़कर देखे जाने का विरोध किया। हालिया प्रकाशित दूधनाथ सिंह द्वारा संपादित संस्मरणों की किताब के फ्लैप पर अज्ञेय की टिप्पणी को उन्होंने इसी तरह की प्रवृत्ति का उदाहरण बताया। उन्होंने शमशेर की कुछ कम चर्चित कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि उनमें आत्मालोचना, द्वंद्व और मोह भी है।

आयोजन में कला आलोचक रमण सिन्हा ने चित्रकला के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ शमशेर की चित्रकला पर व्याख्यान-प्रदर्शन किया। यह व्याख्यान उनके चित्रों और कविताओं को समझने के लिहाज से काफी जानकारीपूर्ण था। कला आलोचक अनिल सिन्हा ने कहा कि विडंबना यह है कि उत्तर भारत में विभिन्न विधाओं का वैसा अंतर्मिलन कम मिलता है, जैसा शमशेर के यहां मिलता है। शमशेर का गद्य भी महत्वपूर्ण है जो उनके चित्र और कविता को समझने में मदद करता है और उसी तरह चित्रकला उनकी कविता को समझने में मददगार है।

सुप्रसिद्ध चित्रकार-साहित्यकार अशोक भौमिक ने चित्रकला के जनसांस्कृतिक परंपरा की ओर ध्यान देने का आग्रह किया और कहा कि बाजार ने जिन चित्रकारों से हमारा परिचय कराया वही श्रेष्ठता की कसौटी नहीं हैं। इसका उदाहरण शमशेर की चित्रकला है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया।