सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव 2010

गिरीश तिवाड़ी गिर्दा की याद को
लखनऊ फिल्म उत्सव
प्रतिरोध के सिनेमा और संवाद का तीन दिनों का आयोजन

लखनऊ, 11 अक्तूबर। जन संस्कृति मंच (जसम) ने तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव वाल्मीकि रंगशाला (उ0 प्र0 संगीत नाटक अकादमी), गोमती नगर में आयोजित किया। इस फिल्म उत्सव की मुख्य थीम थी ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जो सुपरिचित कलाकार और जनगायक गिरीश तिवाड़ी गिर्दा की याद को समर्पित था। तीन दिनो तक चलने वाले इस समारोह में लखनऊ के सिनेमा प्रेमी दर्शकों को करीब एक दर्जन से अधिक हिन्दी और इससे इतर अन्य भाषाओं की फिल्मों के माध्यम से आम जन की पीड़ा व त्रासदी के साथ ही उनका संघर्ष और प्रतिरोध देखने को मिला।

समारोह का उदघाटन हिन्दी के युवा आलोचक एवं जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि जन संस्कृति मंच द्वारा लखनऊ, गोरखपुर, बरेली, पटना, नैनीताल सहित देश के विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए जाने वाला फिल्म उत्सव एक तरह का घूमता आइना है जो देश, समाज और दुनिया के ऐसे लोगों और इलाको की तस्वीर दिखाता है। दरअसल देश उनका हो गया है जिनका संसाधानों व सम्पत्ति पर कब्जा है और जिन्होंने देश के बहुसंख्यक आबादी को हाशिए पर डाल दिया है। सम्पत्ति और सत्ता पर कब्जा करने वाले लोग कलाओं, अभिव्यक्तियों और रचनाशीलता को भी अपने तरह से प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। ये लोग गरीबों की चेतना के पिछड़ेपन को भी बनाए रखना चाहते हैं। इसके खिलाफ खड़ा होना सिर्फ राजनीति का ही नहीं संस्कृति का भी काम हैं। शिल्प, चित्रकला, सिनेमा सहित कला की सभी विधाओं के जरिए शोषण, दमन से पीड़ित लेकिन संघर्षशील जनता की अभिव्यक्ति करना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता कर रहे जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अजय कुमार ने कहा कि कला का अर्थ है आदमी को बेहतर बनना। इस काम में सिनेमा एक सशक्त माध्यम है। हमें फूहड़ सिनेमा के जरिए जनता के टेस्ट खराब करने की साजिश के खिलाफ मजबूती से खड़ा होना होगा। उद्घाटन सत्र में मशहूर चित्रकार एवं लेखक अशोक भौमिक ने फिल्म उत्सव की स्मारिका प्रतिरोध का सिनेमा, सिनेमा का प्रतिपक्ष का लोकार्पण किया। उद्घाटन सत्र का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया।

फिल्म समारोह में दर्शकों ने तुर्की व ईरान की फिल्मों से लेकर बिहार व नैनीताल के एक गांव पर बनी फिल्में देखी। गौतम घोष की ‘पार’, यिल्माज गुने की ‘सुरू’ ;तुर्कीद्ध, बेला नेगी की दाँये या बाँये’ तथा बेहमन गोबादी की ‘टर्टल्स कैन फलाई’ दिखाई गई। करीब पचीस साल पहले बनी गौतम घोष की ‘पार’ काफी चर्चित फीचर फिल्म रही है। यह बिहार के दलितों के उत्पीड़न, शोषण व विस्थापन के साथ ही उनके संघर्ष और जिजीविषा को सामने लाती है। यिल्माज गुने की फिल्म सुरू दो कबीलों के बीच पिसती एक औरत की कहानी है। उसका पति अपने पिता से विद्रोह कर शहर में इलाज कराना चाहता है। एक संयोग के तहत उनका पूरा कुनबा अपनी भेड़ों को बेचने के लिए तुर्की की राजधानी अंकारा की या़त्रा करता है। इस यात्रा में वे बार-बार ठगे जाते हैं। घर के विद्रोही बेटे केा अंकारा में अपनी बीबी के बेहतर इलाज की पूरी उम्मीद है। इस यात्रा में उनकी भेड़ें और पूरा परिवार ठगा जाता है और वे राजधानी की भीड़ में कहीं खो जाते हैं। यिल्माज गुने की फिल्मों पर बोलते हुए कवि और फिल्म समीक्षक अजय कुमार ने कहा कि इल्माज गुने ऐसे फिल्मकार हैं जिन्हें सत्ता का दमन खूब झेलना पड़ा। उन्होंने मजदूर वर्ग की हिरावल भूमिका को पहचाना और अपनी जीवन दृष्टि को एक क्रंातिकारी जीवन दृष्टि में रूपान्तरित किया।

बेला नेगी की फिल्म ‘दांये या बांये’ एक ऐसे नौजवान दीपक की कहानी है जो पहाड़ के अपने छोटे से कस्बे से जाकर शहर में गुजारा करता है। शहर में अपनी प्रतिभा का कोई इस्तेमाल न पाकर गांव लौट आता है। शहर से आया होने के कारण सभी के नजरों में वह एक विशेष व्यक्ति बन जाता है लेकिन वह शहर वापस जाने के बजाय गांव में स्कूल खोलकर बच्चों को पढ़ाने का निर्णय लेता है जिस पर गांव के लोग उसे आदर्शवादी कहकर हंसते हैं। यह फिल्म जीवन की गाढ़ी जटिलता और दुविधाओं को सामने लाती है। यह फिल्म अथी तक रिलिज नहीं हुई है। इस तरह लखनऊ फिल्म समारोह में इसका प्रदर्शन इसका प्रिमियर शो था।

कबीर परियोजना के तहत फिल्मकार शबनम विरमानी ने अपने दल के साथ मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान,पाकिस्तान और अमेरिका की यात्रा की। इस अवधि में ऐसे कई लोक गायकों, सूफी परंपरा से जुड़े गायकों से मिलने और उनको सुनने, कबीर के अध्ययन से जुड़े देशी-विदेशी विद्वानों और विभिन्न कबीर पंथियों से मिलकर उनके विचारों को जानने-समझने का प्रयत्न किया। छह वर्ष लंबी अपनी इस यात्रा में शबनम विरमानी ने चार वृत्तचित्र बनाए जिसमें से हद-अनहद इस श्रृंखला की पहली कड़ी है। लखनऊ में इसे दिखया गया। इस फिल्म के माध्यम से कबीर के राम को खोजने का प्रयास किया गया है, जो अयोध्या के राजा राम से भिन्न है। डाक्यूमेन्ट्री फिल्मों में बच्चों की दुनिया से लेकर ंकाश्मीर, उड़ीसा के जख्म दिखती फिल्मों का प्रदशन हुआ। राजेश एस जाला की चिल्डेन आफ पायर बच्चों की उस दुनिया से रूबरू कराती है जिसे हम देखना नहीं चाहते लेकिन यह सच दुनिया के किसी न किसी हिस्से में घटित हो रहा है। संजय काक की डाक्यूमेंटरी फिल्म जश्न-ए-आजादी ने काश्मीर का सच प्रस्तुत किया, वहीं देबरंजन सारंगी की फिल्म फ्राम हिन्दू टू हिन्दुत्व उड़ीसा के कंधमाल में साम्प्रदायिक हिंसा के पीछे मल्टीनेशनल और साम्प्रदायिक शक्तियों के गठजोड़ को सामने लाने का काम किया। अतुल पेठे द्वारा बनाई फिल्म ‘कचरा व्यूह’ का भी प्रदर्शन हुआ जो सरकार और प्रशासन के सफाई कामगारों के प्रति दोरंगे व्यवहार का भी पर्दाफाश करती है।

फिल्मकार संजय जोशी ने पांच डाक्यूमेन्टरी फिल्मों के अंश दिखाते हुए ‘प्रतिपक्ष की भूमिका में सिनेमा’ पर एक प्रस्तुति दी। उन्होंने आनन्द पटवर्धन की फिल्म बम्बई हमारा शहर, अजय भारद्वाज की एक मिनट का मौन, बीजू टोप्पो व मेघनाथ की विकास बन्दूक की नाल से, हाउबम पबन कुमार की एएफएसपीए 1958 और संजय काक की बंत सिंह सिंग्स के अंश दिखाते हुए कहा कि डाक्यूमेन्टरी फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों के जरिए सही तौर पर प्रतिपक्ष की भूमिका निर्मित की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1975 के बाद आनन्द पटवर्धन की क्रांति की तरंगे से डाक्यूमेन्टरी फिल्मों में प्रतिपक्ष का एक नया अध्याय शुरू हुआ था जिसमें फिल्मस डिवीजन के एकरेखीय सरकारी सच के अलावा जमीनी सच सामने आते हैं। कई फिल्मकारों ने अपनी प्रतिबद्धता, विजन के साथ तकनीक का उपयोग करते हुए कैमरे को जनआन्दोलनों की तरफ घुमाया है और सच को सामने लाने का काम किया है।

फिल्म समारोह में संवाद सत्र के दौरान वृतचित्र: प्रतिरोध के कई रंग विषय पर बोलते हुए लेखक व पत्रकार अजय सिंह ने कहा कि डाक्यूमेन्टरी फिल्में राजनीतिक बयान होती हैं। यह राजनीति मुखर भी हो सकती है और छुपी हुई भी। जाहिर है कला के माध्यम से राजनीति फिल्म में प्रतिविम्बित होती है। जब हम प्रतिरोध की सिनेमा की बात करते हैं तो उसका मतलब यह होता है कि हम मौजूदा ढंाचे के बरक्स कोई विकल्प भी पेश करना चाहते हैं। प्रतिरोध के पहले असहमति और विरोध का भी महत्व होता है और काफी पहले की बनी हुई डाक्यूमेंटरी फिल्में भी विरोध और असहमति के स्वर को आवाज देती रही हैं। उदाहरण के लिए 1970 के दशक में भारत सरकार के फिल्म्स डिवीजन के तहत बनी अशोक ललवानी की फिल्म वे मुझे चमार कहते हैं, एस सुखदेव की पलामू के आदमखोर, मीरा दीवान की प्रेम का तोहफा जैसी फिल्मों को लिया जा सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि रेडिकल दृष्टिकोण या वामपंथी नजरिए से डाक्यूमेंटरी फिल्में बनाई जाए। संवाद सत्र में अपने विचार रखने वालों में अनिल सिन्हा, राजेश कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, के के वत्स, मनोज सिंह आदि प्रमुख थे।

फिल्मों के साथ ही इस समारोह में प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने ‘जीवन और कला: संदर्भ तेभागा आन्दोलन और सोमनाथ होड़’ पर विजुअल व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि सोमनाथ होड़ का कलाकर्म कलाकारों को जनआन्दोलनों से जोड़ने के लिए प्रेरित करता है। 1946 में भारत के अविभाजित कम्युनिष्ट पार्टी ने 23 वर्ष के युवा कला छात्र सोमनाथ होड़ को तेभागा आन्दोलन को दर्ज करने का काम सौपा था। सोमनाथ ने किसानों के उस जबर्दस्त राजनीतिक उभार और उनकी राजनीतिक चेतना को अपने चित्रों और रेखांकनों में अभिव्यक्ति दी ही साथ ही साथ अपने अनुभवों को भी डायरी में दर्ज किया। उनकी डायरी और रेखा चित्र एक जनपक्षधर कलाकार द्वारा दर्ज किया गया किसान आन्दोलन का अद्भुत दस्तावेज है। श्री भौमिक ने सोमनाथ होड़ के चित्रांे और रेखांकनों के पहले भारतीय चित्रकला की यात्रा का विवेचन प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस दौर में आम आदमी और किसान चित्रकला से अनुपस्थित है। उसकी जगह नारी शरीर, देवी-देवता और राजा-महराजा हैं। उन्होंने अपने व्याख्यान का अंत यह कहते हुए कहा कि जनपक्षधर होना ही आधुनिक होना है।

फिल्म उत्सव में फिल्मों की स्क्रीनिंग के अलावा मालविका का गायन भी हुआ। पुस्तक व कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी, डाक्यूमेन्टरी फिल्मों का स्टाल, पोस्टर और इस्टालेशन दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र रहे। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के स्टाल पर दो दर्जन से अधिक डाक्यूमेंटरी फिल्मों के डीवीडी उपलब्ध थे जिसके बारे में दर्शकों ने जानकारी ली और उसे खरीदा। लेनिन पुस्तक केन्द्र और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के पुस्तकों के स्टाल में भी लोगों ने रूचि दिखाई। कला संग्राम द्वारा हाल के बाहर भेड़चाल के नाम से प्रस्तुत इस्टालेशन को लोगों ने खूब सराहा। बड़ी संख्या में दर्शको की भागीदारी और सिनेमा के साथ ही कला के विविध रूपों के प्रदर्शन ने जसम के इस फिल्म उत्सव को सांस्कृतिक मेले का रूप दिया।
कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ


शनिवार, 18 सितंबर 2010

तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव 2010


प्रतिरोध का सिनेमा


8, 9 व 10 अक्तूबर 2010
वाल्मीकि रंगशाला ;उ0 प्र0 संगीत नाटक अकादमीद्ध, गोमती नगर, लखनऊ

मित्रों,

कला माध्यमों से यह उम्मीद की जाती है कि वे हमारे समाज और जीवन की सच्चाइयों को अभिव्यक्त करें। सिनेमा आधुनिक कला का सबसे सशक्त और लोकप्रिय कला माध्यम है। लेकिन इस कला माध्यम पर बाजारवाद की शक्तियाँ हावी हैं। मुम्बइया व्यवसायिक सिनेमा द्वारा जिस संस्कृति का प्रदर्शन हो रहा है, वह जनचेतना को विकृत करने वाला है। सेक्स, हिंसा, मारधाड़ इन फिल्मों की मुख्य थीम है। यहाँ भारतीय समाज की कठोर सच्चाइयाँ, जनता का दुख-दर्द, हर्ष-विषाद और उसका संघर्ष व सपने गायब हैं।

आज दर्शक विकल्प चाहता है। वह ऐसी फिल्में देखना चाहता है जो न सिर्फ उसका मनोरंजन करें बल्कि उसे गंभीर, संवेदनशील, जागरुक व जुझारू बनाये। दर्शकों की इसी इच्छा.आकांक्षा ने प्रतिरोध के सिनेमा या जन सिनेमा आन्दोलन को जन्म दिया है। जन सिनेमा के सिलसिले को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हमने लखनऊ में 2008 से फिल्म समारोह के आयोजन द्वारा एक छोटी-सी शुरूआत की हैै जिसकी अगली कड़ी के रूप में तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव 2010 का आयोजन किया जा रहा है। जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित यह उत्सव 8, 9 व 10 अक्तूबर 2010 को वाल्मीकि रंगशाला, उŸार प्रदेश संगीत नाटक अकादमी, गोमती नगर, लखनऊ में होगा। तीन दिनों तक चलने वाले इस फिल्म उत्सव में करीब एक दर्जन से अधिक देशी, विदेशी वृतचित्रों और फीचर फिल्मों का प्रदर्शन होगा।

आप हमारी ताकत हैं। आपके सक्रिय सहयोग की हमें जरूरत है। आप अपने परिवार व दोस्तों के साथ आयें, फिल्में देखें और इस आयोजन को सफल बनानें में अपना हर संभव सहयोग प्रदान करें, हमारी आपसे अपील है।

निवेदक

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ
कार्यालय: एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ - 226017
मो - 09807519227, 09415220306, 09415568836, 09415114685

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

गिरीश तिवारी गिर्दा समृति


गिर्दा के निधन से जनता ने अपना कलाकार खो दिया है - जसम


सुपरिचित गायक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी गिरीश तिवारी गिर्दा के निधन पर जन संस्कृति मंच ने गहरा शोक प्रकट किया है और कहा है कि उनके निधन से जनता ने अपना गायक और कलाकार खो दिया है। गिर्दा ऐसे संस्कृतिकर्मी हैं जिनका कला संसार जन आंदोलनों के बीच निर्मित होता है।

गिरीश तिवार गिर्दा का निधन कल 22 अगस्त को हुआ। उनके निधन पर जन संस्कृति मंच (जसम) लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि 80 के दशके में उŸाराखंड में जो लोकप्रिय आन्दोलन चला, गिर्दा उसके अभिन्न अंग थे। इसी दौर में जन सांस्कृतिक आंदोलन को भी संगठित करनें के प्रयास तेज हुए जिसकी परिणति नैनीताल में ‘युवमंच’ तथा हिन्दी।उर्दू प्रदेशों में जन संस्कृति मंच के गठन में हुई। गिर्दा इस प्रयास के साथी रहे हैं।


जसम की कार्यकारिणी के सदस्य, लेखक व पत्रकार अजय सिंह ने गिर्दा को याद करते हुए कहा कि गिर्दा का क्रान्तिकारी वामपंथी राजनीतिक व सांस्कृतिक आंदोलन से गहरा जुड़ाव था और वे इंडियन पीपुल्य फ्रंट (आई पी एफ) और जन संस्कृति मंच से जुड़े थे। उनका असमय जाना बड़ी क्षति है।


नाटककार राजेश कुमार ने शोक संवोदना प्रकट करते हुए कहा कि गिर्दा ने थियेटर को विचार को संप्रेषित करने का माध्यम बनाया। उनके गीतों, नाटकों व रंगकर्म में हमें बदलाव के विचारों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता देखने को मिलती है। यह प्रतिबद्धता जनता और उसके आंदोलन से गहरे जुड़ाव से ही संभव है।


जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व कवयित्री शोभा सिंह ने कहा कि गिर्दा की कला व रचनाएँ जन आंदोलनों से प्रेरित है और उसी से ऊर्जा ग्रहण करती है तथा अपने रचना कर्म के द्वारा गिर्दा जन आंदोलन को आवेग प्रदान करते हैं। यह एक बड़ी और दुलर्भ बात है जो हमें गिर्दा में मिलती है। यह गिर्दा की खासियत है।


कवि भगवान स्वरूप कटियार, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा, अलग दुनिया के के0 के0 वत्स, श्याम अंकुरम, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, वीरेन्द्र सारंग आदि जन जन संस्कृति मंच से जुड़े लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने भी गिरीश तिवार गिर्दा के निघन पर शोक प्रकट किया है।

गिरीश तिवाड़ी ‘गिरदा’ की कविता


सियासी उलट बाँसी


पानी बिच मीन पियासी

खेतो में भूख उदासी

यह उलट बाँसियाँ नहीं कबीरा, खालिस चाल सियासी

पानी बिच मीन पियासी


लोहे का सर पाँव काठ के

बीस बरस में हुए साठ के

मेरे ग्राम निवासी कबीरा, झोपड़पट्टी वासी

पानी बिच मीन पियासी

सोया बच्चा गाये लोरी

पहरेदार करे है चोरी

जुर्म करे है न्याय निवारण, नयाय चढ़े है फाँसी

पानी बिच मीन पियासी


बंगले में जंगला लग जाये

जंगल में बंगला लग जाय

वन बिल ऐसा लागू होगा, मरे भले वनवासी

पानी बिच मीन पियासी

जो कमाय सो रहे फकीरा

बैठे - ठाले भरें जखीरा

भेद यही गहरा है कबीरा, दीखे बात जरा सी

पानी बिच मीन पियासी


(यह कविता लखनऊ से प्रकाशित ‘जन संस्कृति’ के अंक-6, अप्रैल-जून 1985 में प्रकाशित हुई थी। वहीं से ली गई है।)

बुधवार, 11 अगस्त 2010

लखनऊ के लेखको व संस्कृतिकर्मियों की अपील: विभूति नारायण राय और रविन्द्र कालिया का बहिष्कार हो

लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और महिला व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के अंक में हिन्दी लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई टिप्पणी तथा उनके लिए प्रयुक्त ‘छिनाल’ जैसे अपमान जनक शब्द पर अपना गहरा विरोध जताया और कहा कि यह महिलाओं के प्रति हिंसा की सोच से प्रेरित है। विभूति नारायण और ‘नया ज्ञनोदय’ के सम्पादक रवीन्द्र कालिया साहित्य में जिस ‘सबसे बेबाक’ की बात कर रहे हैं, वह वास्तव में यौन हिंसा और दबंगई है। महिला सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों की हिफाजत के लिए जरूरी है कि इन प्रवृŸिायों का विरोध हो और इनका सामाजिक व सांस्कृतिक बहिष्कार किया जाय।

यह विचार ‘साहित्य में यौन हिंसा और दबंगई के खिलाफ’ आयोजित संगोष्ठी में उभर कर आया। कार्यक्रम आज यहा राज्य सूचना निदेशालय के सभागार में जन संस्कृति मंच (जसम) अलग दुनिया और प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (येपवा) ने ‘नया ज्ञानोदय’ में महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा हिन्दी लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई अपमानजनक टिप्पणी के परिप्रेक्ष्य में संयुक्त रूप से आयोजित किया था। संगोष्ठी की अध्यक्षता एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने की, वहीं विषय प्रवर्तन किया जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व कवयित्री शोभा सिंह ने। कार्यक्रम का संचालन किया अलग दुनिया के कृष्णकान्त वत्स ने।
इस मौके पर पर विचार रखने वालों में लेखक व पत्रकार अजय सिंह, लेखक शकील सिदिकी , नाटककार राजेश कुमार, ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक डॉ गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव, कथाकार नसीम साकेती, आलोचक चन्द्रेश्वर, कवि व उपन्यासकार वीरेन्द्र सारंग, कवि श्याम अंकुरम, कलाकार मंजु प्रसाद, कवि कौशल किशोर, प्रतुल जोशी आदि प्रमुख रहे।

वक्ताओं का कहना था कि श्री राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस दलित विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नये ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। वक्ताओं ने ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक की भी आलोचना की। उनका कहना था कि समाज व जीवन के ज्वलंत व जरूरी सवालों व सरोकारों से साहित्य को दूर ले जाकर उसे मात्र मसालेदार बनाने की दिशा में रवीन्द्र कालिया काम कर रहे हैं। यह साहित्य की मानवीय भूमिका और उसकी गरिमा को नष्ट करना है। उसे मात्र बाजार व व्यवसाय के माल में बदल देना है।

जसम के संयोजक व कवि कौशल किशोर ने इस अवसर पर एक प्रस्ताव पेश किया जिसे संगोष्ठी में स्वीकार किया गया जिसके माध्यम से माँग की गई कि श्री विभूति नारायण राय का कृत्य आपराधिक है। इसलिए महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहना समाज, साहित्य और संस्कृति के लिए अपमानजनक और घातक है। इन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाय। प्रस्ताव में यह भी माँग की गई कि ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक रवीन्द्र कालिया को भी संपादक से हटाया जाय।
प्रस्ताव के माध्यम से देश भर के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों से अपील की गई है कि मौजूदा स्थिति में वे महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों में भाग न लें, उसका बहिष्कार करें तथा यहाँ की पत्र पत्रिकाओं से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लें। प्रस्ताव में यह भी अपील की गई कि जब तक रवीन्द्र कालिया को सम्पादक के पद से हटाया नहीं जाता तब तक लेखक व संस्कृतिकर्मी ‘नया ज्ञानोदय’ और इस पत्रिका को छापने वाले संस्थान भारतीय ज्ञानपीठ से अपना सम्बन्ध तोड़ लें। स्त्रियों के सम्मान और साहित्य की गरिमा की हिफाजत के लिए यह आवश्यक है।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

जन संस्कृति मंच
एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ 226017मो: 09807519227,

विभूतिनारायण राय का माफी मांगना बौद्धिक चालबाजी है - एपवा व
जसम

लखनऊ, 05 अगस्त। महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति श्री विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के अंक में स्त्री लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई अपनी टिप्पणी पर माफी मांगने को जन संस्कृति मंच (जसम) और अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) ने महज नाटक बताया है। गौरतलब है कि श्री राय ने यह माफी केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के कहने पर मांगी है। उनकी टिप्पणी का विरोध होने के बाद ‘नया ज्ञानोदय’ को दिये अपने साक्षात्कार में व्यक्त विचारों के पक्ष में उन्होंने जो तर्क व दलीलें पेश की हैं, उसे देखते हुए यह कहीं से नहीं लगता कि उनके सोच और विचार में बदलाव आया है। ऐसे में उनका माफी मांगना मात्र अपनी कुलपति की कुर्सी बचाने की बौद्धिक चालबाजी है।

एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन और जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने आज संयुक्त बयान जारी कर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने श्री राय को दंडित करने की जगह उन्हें बचाने का काम किया है। बयान में कहा गया है कि श्री विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के नये अंक में स्त्री लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई टिप्पणी उनके लिए प्रयुक्त अपमान जनक शब्द न सिर्फ महिलाओं की गरिमा को चोट पहुँचाने वाले अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है बल्कि यह महिलाओं के प्रति हिंसा की सोच से प्रेरित है। श्री राय का यह कृत्य आपराधिक है। इसलिए म गाँ अ हि वि जैसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहना हिन्दी समाज, साहित्य और संस्कृति के लिए अपमानजनक और घातक है। इन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाय।

इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व कवयित्री शोभा सिंह, लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा, नाटककार राजेश कुमार, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा, अलग दुनिया के कृष्णकान्त वत्स, कलाकार मंजु प्रसाद, लेखक श्याम अंकुरम, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, कवि भगवान स्वरूप कटियार, एपवा की विमल किशोर, उमाशील, रंजना यादव, रेणु आदि प्रमुख हैं।

बयान में आगे कहा गया है कि श्री राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस दलित विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नये ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। जसम ने ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक श्री रवीन्द्र कालिया की भी आलोचना की है। लेखक की अपनी स्वतंत्रता है तो सामग्री का चयन सम्पादक की स्वतंत्रता है। लेकिन इस प्रसंग में लगता है कि श्री राय के साथ श्री कालिया की सहमति है अन्यथा ऐसी सामग्री प्रकाशित ही नहीं हो पाती। श्री कालिया इस सम्बन्ध में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। इसलिए जरूरी है कि ‘ज्ञानोदय’ जैसी पत्रिका की गरिमा को बचाने के लिए श्री रवीन्द्र कालिया केा सम्पादक पद से हटाया जाय।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति वी एन राय को बर्खास्त किया जाय
‘ज्ञानोदय’ के सम्पादक रवीन्द्र कालिया को हटाया जाय


लखनऊ, 04 अगस्त। महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति श्री विभूति नारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ के नये अंक में स्त्री लेखिकाओं के सम्बन्ध में की गई टिप्पणी और उनके लिए प्रयुक्त अपमान जनक शब्द न सिर्फ महिलाओं की गरिमा को चोट पहुँचाने वाले अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है बल्कि यह महिलाओं के प्रति हिंसा की सोच से प्रेरित है। श्री राय का यह कृत्य आपराधिक है। इसलिए म गाँ अ हि वि जैसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहना हिन्दी समाज, साहित्य और संस्कृति के लिए अपमानजनक और घातक है। इन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाय।

जन संस्कृति मंच, लखनऊ (जसम) ने आज बयान जारी कर यह माँग की। बयान जारी करने वालों में जसम के संयोजक व कवि कौशल किशोर, जसम की राष्टीय उपाध्यक्ष शोभा सिंह ,लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा, नाटककार राजेश कुमार, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा, कलाकार मंजु प्रसाद, लेखक श्याम अंकुरम, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, कवि भगवान स्वरूप कटियार आदि प्रमुख हैं।

जन संस्कृति मंच का कहना है कि श्री राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनांे हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उनके द्वारा दलित व आदिवासी छात्रों व शिक्षकों को उत्पीड़ित करने, आन्दोलनकारी छात्रों से बातचीत न कर उन्हें सबक सिखाने और आन्दोलन को कुचलने जैसे अलोकतांत्रिक तौर.तरीका अपनाया जाता रहा है। अनिल चमड़िया जैसे लेखक व पत्रकार को भी इसका शिकार होना पड़ा। यही नहीं श्री राय के ऊपर एक खास जाति विशेष के साथ पक्षपात का भी आरोप लगता रहा है। लेकिन खेद की बात है कि हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री राय के इस अलोकतांत्रिक और ब्राहमणवादी व्यवहार के प्रति हिन्दी लेखकों का ‘प्रगतिशील’ व ‘जनवादी’ जमात आम तौर पर चुप्पी साधे रहा है और आज भी यह जमात मामले की लीपा पोती में लगा है।

जन संस्कृति मंच का कहना है कि पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस समाज और संस्कृति विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नये ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। जसम ने ‘नया ज्ञानोदय’ के सम्पादक श्री रवीन्द्र कालिया की भी आलोचना की है। लेखक की अपनी स्वतंत्रता है तो सामग्री का चयन सम्पादक की स्वतंत्रता है। लेकिन इस प्रसंग में लगता है कि श्री राय के साथ श्री कालिया की सहमति है अन्यथा ऐसी सामग्री प्रकाशित ही नहीं हो पाती। श्री कालिया इस सम्बन्ध में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। इसलिए जरूरी है कि ‘ज्ञानोदय’ जैसी पत्रिका की गरिमा को बचाने के लिए श्री रवीन्द्र कालिया केा सम्पादक पद से हटाया जाय।

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ

सोमवार, 2 अगस्त 2010

जन संस्कृति मंच
प्रॆस‍ ‍विज्ञाप्ति

2 अगस्त, दिल्ली । जन संस्कृति मंच पिछले दिनों म। गा ही. वि. वि. के कुलपति श्री विभूति राय द्वारा एक साक्षात्कार के दौरान हिंदी स्त्री लेखन और लेखिकाओं के बारे में असम्मानजनक वक्तव्य की घोर निंदा करता है। यह साक्षात्कार उन्होंने नया ज्ञानोदय पत्रिका को दिया था. हमारी समझ से यह बयान न केवल हिंदी लेखिकाओं की गरिमा के खिलाफ है , बल्कि उसमें प्रयुक्त शब्द स्त्रीमात्र के लिए अपमानजनक हैं. इतना ही नहीं बल्कि बयान हिंदी के स्त्रीलेखन की एक सतही समझ को भी प्रदर्शित करता है.

आश्चार्य है की पूरे साक्षात्कार में यह बयान पैबंद की तरह अलग से दीखता है क्योंकि बाकी कही गई बातों से उसका कॊई सम्बन्ध् भी नहीं है. अच्छा हो कि श्री राय अपने बयान पर सफाई देने की जगह उसे वापस लें और लेखिकाओं से माफ़ी मांगें. नया ज्ञानोदय के सम्पादक रवींद्र कालिया अगर चाहते तो इस बयान को अपने सम्पादकीय अधिकार का प्रयोग कर छपने से रोक सकते थे. लेकिन उन्होंने तो इसे पत्रिका के प्रमोशन के लिए, चर्चा के लिए उपयोगी समझा. आज के बाजारवादी, उपभोक्तावादी दौर में साहित्य के हलकों में भी सनसनी की तलाश में कई सम्पादक , लेखक बेचैन हैं. इस सनसनी-खोजी साहित्यिक पत्रकारिता का मुख्य निशाना स्त्री लेखिकाएँ हैं और व्यापक स्तर पर पूरा स्त्री-अस्तित्व. रवींद्र कालिया को भी इसके लिए माफी माँगना चाहिए. जिन्हें स्त्री लेखन के व्यापक सरोकारों और स्त्री मुक्ति की चिंता है वे इस भाषा में बात नहीं किया करते. साठोत्तरी पीढ़ी के कुछ कहानीकारों ने जिस स्त्री-विरोधी, अराजक भाषा की ईजाद की, उस भाषा में न कोई मूल्यांकन संभव है और न विमर्श. जसम हिंदी की उन तमाम लेखिकाओं व प्रबुद्धनजन कॆ साथ है जिन्हॊनॆ इस बयान पर अपना रॊष‌ व्यक्त किया है.
प्रणय कृष्ण,
महासचिव, जसम