मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

समकालीन जनमत


‘समकालीन जनमत’ : अब नये तेवर और कलेवर के साथ

‘समकालीन जनमत’ हिन्दी की ऐसी पत्रिका है जो तीन दशक की अपनी यात्रा के दौरान न सिर्फ पटना से लेकर दिल्ली तक का सफर तय किया है बल्कि समय की मांग और जरूरत के अनुसार अपना स्वरूप बदलती रही है। जन आकांक्षा के अनुरूप इसके तेवर और कलेवर में भी बदलाव आता रहा है। कभी यह मासिक हुई तो कभी त्रैमासिक और कभी तो पाक्षिक। इसी तरह इसके आकार और स्वरूप में भी बदलाव आता रहा है। लेकिन जिस साहस, संकल्प और निर्भीकता के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी, वह समय के साथ और भी मुखर हुई है। जनविरोधी शक्तियों और विचारों के प्रति आलोचनात्मक रुख तथा जनता के सच, संघर्ष और उसकी आकांक्षा को हर कीमत पर अभिव्यक्त करना, यह इसकी पहचान रही है।

‘जनमत’ 1980 के बिहार के किसान आन्दोलन के गर्भ से पैदा हुई। इसने भोजपुर, आरा, जहानाबाद के किसान आन्दोलन को स्वर देते हुए देश के बौद्धिक व सांस्कृतिक विमर्श में हस्तक्षेप किया। लेखन से लेकर संसाधन तक के लिए जन सहयोग की बुनियाद पर खड़े होकर ‘जनमत’ ने मजबूती से समाज के उन तबकों की आवाज को बुलन्द किया जिनकी आवाज को मुख्यधारा की मीडिया में दरकिनार कर दिया जाता है। इस पत्रिका को जिलाए रखने के लिए किसानों ने धन जुटाया और अनाज तक का सहयोग दिया। ‘जनमत’ की शुरुआत पटना से हुई थी। अग्निपुष्प, नवेन्दु और श्रीकान्त - जैसे युवा लेखक व पत्रकार इसके शुरुआती संपादक थे। यह क्रान्तिकारी वामपंथी लेखक महेश्वर की प्रतिभा, परिश्रम और साथ था जिससे ‘जनमत’ में न सिर्फ राजनीतिक-वैचारिक गहराई आयी बल्कि इसके पाठकों का दायरा भी बढा। ‘आदमी को निर्णायक होना चाहिए’ इस वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ ताजिन्दगी संघर्ष करने वाले महेश्वर के लिए ‘जनमत’ उनका वैचारिक व सांस्कृतिक मंच था। ‘जनमत’ इसी प्रक्रिया में ‘समकालीन जनमत’ हुई। रामजी राय, बृजबिहारी पाण्डेय, सुधीर सुमन, प्रणय कृष्ण, के के पाण्डेय जैसे लेखक-संस्कृतिकर्मी पत्रिका के संपादन से जुड़े।

पिछले दिनों जब दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद के द्वारा साझी संस्कृति और प्रगतिशील मूल्यों को नष्ट कर देने की कोशिश हुई, सांप्रदायिक फासीवाद के द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का हमला किया गया, इस चुनौती का मुकाबला करने के ‘समकालीन जनमत’ के स्वरूप में बदलाव आया और एक सांस्कृतिक पत्रिका के बतौर इस चुनौती का उसने यथासंभव मुकाबला किया।आज जिस तेजी से घटनाएं घटित हो रही हैं, लोग सिर्फ खबरे ही नहीं चाहते, उसका विश्लेषण भी चाहते हैं। हालत यह कि चाहे इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया, इस पूरे मीडिया जगत पर देशी-विदेशी पूँजी और बाजार का भारी दबाव है जिसका नतीजा है कि मीडिया और पाठक/दर्शक के बीच माल और ग्राहक का रिश्ता बनता जा रहा है। सूचना साम्राज्य के इजारेदारों ने आम आदमी और गरीब मेहनतकशों के हितों और उनके पक्षधर विचारों को मीडिया से लगभग बेदखल कर दिया है। ऐसे हलचल भरे दौर में ‘समकालीन जनमत’ ने अपना स्वरूप फिर बदला है और मेहनतकश वर्ग और उनके संघर्ष के पक्ष में खबरें और विचार लेके हर महीने उनके बीच आना तय किया है। अब यह समाचार-विचार-राजनीति की मासिक पत्रिका के रूप में सामने आयी है जिसका नया अंक - अक्तूबर 2009 अंक - इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ है। सुनील यादव इसके नए सम्पादक हैं।

‘समकालीन जनमत’ का नया अंक 1940-50 के दौरान बंगाल में चले किसान आन्दोलन के प्रसिद्ध चित्रकार चिŸाप्रसाद के चित्रों से सजा है। आवरण कथा के अन्तर्गत सुधीर सुमन का लेख ‘भगत सिंह का पंजाब आज’ है जो बताता है कि हरित क्रान्ति ने प्रदूषण का जो जहर पैदा किया है उसका दुष्प्रभाव ग्रामीण गरीबों को ही झेलना पड़ता है। अरिन्दम सेन का विशेष लेख है ‘वामपंथ: नई गतिशीलता की तलाश’। ‘पड़ोस’ स्तम्भ के अन्तर्ग पत्रकार और नेपाल मामलों के विशेषज्ञ आनन्द स्वरूप वर्मा बता रहे हैं ‘नेपाल: आसान नहीं है आगे की डगर’। जापान में हुए चुनाव में बदलाव के लिए जनादेश पर जहां सुन्दरम की टिप्पणी है वहीं भाषा सिंह ने बदनाम मोदी सरकार की पुलिस के द्वारा फर्जी मुठभेड़ के नाम पर ठण्डे दिमाग से की गई ‘इशरत जहां’ की हत्या के मुद्दे को उठाया है। ‘समय संवाद’ में अनिल सदगोपाल का लेख है ‘सिब्बल की शिक्षा का सच’।नये अंक में आनन्द प्रधान का लेख है ‘दोहा वार्ता: दिल्ली की बेताबी क्यों ?’ वहीं ‘अर्थजगत’ में तापस रंजन साह का विश्लेषणात्मक लेख है ‘बेलगाम क्यों है मँहगाई ?’ सुप्रसिद्ध मानवाधिकारवादी व बालरोग चिकित्सक डाॅ विनायक सेन का इंटरव्यू है जिसमें उनका कहना है कि शान्ति और निःसैन्यीकरण के लिए बड़े जन आंदोलन की जरूरत है। ओडीशा के नियमागिरी पर्वतमाला में ब्रिटेन की कंपनी वेदान्त एल्यूमीनियम को दिये खनन अधिकार ने किस तरह पर्यावरण, वहां के आदिवासियों तथ जीव.जन्तुओं के लिए संकट खड़ा किया है, इसकी पूरी कहानी बता रहे हैं मनोज सिंह। ‘समकालीन जनमत’ के इस अंक में बांग्ला के कवि नवारुण भट्टाचार्य तथा हिन्दी कवि दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ हैं, वहीं चर्चित कवि वीरेन डंगवाल के नए कविता संग्रह ‘स्याही ताल’ की समीक्षा है। नये रूप में प्रकाशित ‘समकालीन जनमत’ का यह शुरुआती अंक होने के बावजूद प्रभावित करता है, आगे और बेहतर व विविधतापूर्ण पत्रिका की उम्मीद जगाता है।

‘समकालीन जनमत’ के इस नये अंक का लोकार्पण डाॅ भीमराव अम्बेडकर महासभा सभागार, लखनऊ में 8 अक्तूबर को हुआ। कार्यक्रम का आयोजन जन संस्कृति मंच और लेनिन पुस्तक केन्द्र ने संयुक्त रूप से किया जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि व कथाकार भगवान स्वरूप कटियार ने की। कार्यक्रम का संचालन कवि और जसम, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने किया। पत्रिका का लोकार्पण करते हुए जाने-माने लेखक और पत्रकार अनिल सिन्हा ने कहा कि हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन से पत्रकारिता के क्षेत्र में जो सामाजिक व राष्ट्रीय चेतना आयी थी उसे पूँजी तथा बाजार के दबाव ने खत्म कर दिया है। आहत व व्यथित कर देने वाली खबरें और घटनाएं भी इस तरह से परोसी जा रही हैं जो हमें संवेदित नहीं करती। इस चिन्ताजनक स्थिति ने ही वैकल्पिक या जनपक्षधर मीडिया की जरूरत को सामने ला दिया है। ‘समकालीन जनमत’ का मासिक के बतौर प्रकाशन इस दिशा में एक कारगर व जरूरी कदम कहा जायेगा।इस मौके पर बोलते हुए ‘समकालीन जनमत’ के सम्पादक सुनील यादव ने कहा कि जब खूबसूरती से ‘आम आदमी’ के नारे की आड़ लेकर आम आदमी के सवालों को दरकिनार किया जा रहा है, हमारे पत्थर दिल नेता आत्ममुग्धता के शिकार होकर अपनी मूर्तियां गढवाने तथा हरिजन बस्ती में गांधी जयन्ती मनाने का नाटक करने में मशगूल हैं, ऐसे में इन ताकतों का पर्दाफाश करते हुए जनता के सच और संघर्ष को मीडिया के माध्यम से बुलन्द करना ही सच्ची पत्रकारिता है। इसी मकसद से ‘समकालीन जनमत’ को हम अपने पाठकों के हाथ सौंप रहे हैं। समाज की बेहतरी के लिए सक्रिय लोगों का सहयोग ही इसकी ताकत है ।

कार्यक्रम को अजय सिंह, डाॅ गिरीश चन्द श्रीवास्तव, सुभाषचन्द्र कुशवाहा, ताहिरा हसन, अनिल यादव, शोभा सिंह, वीरेन्द्र सारंग, श्याम अंकुरम, राजेश कुमार, के के वत्स, शालिनी बाजपेई, महेश पाण्डेय, आलोक पराड़कर, विमल किशोर, मंजु प्रसाद, बी एन गौड़, गंगा प्रसाद, दीपक श्रीवास्तव आदि लेखकों.पत्रकारों.संस्कृतिकर्मियों ने भी संबोधित किया तथा ‘समकालीन जनमत’ को अपनी शुभकामनाएं दीं। वक्ताओं का कहना था कि जहां उन्नत तकनीक की वजह से दृश्य व प्रिन्ट की गुणवŸाा बढी है वहीं मुख्यधारा की पत्रकारिता की विश्वसनीयता में गिरावटी दर्ज की जा रही है। बाजार और पूंजी के दबाव की वजह से जनसरोकारों के लिए मुख्यधारा की पत्रकारिता में जगह कम होती जा रही है। पत्रकारिता कारपोरेट पूंजी की गिरत में है। आज सम्पादकों, पत्रकारों, मीडिया से जुड़े कर्मचारियों के ऊपर छंटनी, रोजगार.असुरक्षा का शिकंजा कसता जा रहा है। पत्रकारों की स्वतन्त्रता और उनकी सृजनात्मकता खतरे में है। ये ही स्थितियां ‘समकालीन जनमत’ जैसी वैकल्पिक मीडिया की जरूरत को सामने लाती हैं। समकालीन जनमत: प्रधान संपादक-रामजी राय, संपादक-सुनील यादव, कीमत-15 रुपये, वार्षिक-150 रुपये, कार्यालय-171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने) , इलाहाबाद-211002, मो.09451845553़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़


4 टिप्‍पणियां:

प्रमोद ताम्बट ने कहा…

आदरणीय कौशल किशोर जी,
नमस्कार,
समकालीन जनमत के बारे में विस्तृत समाचार उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद।
एक पत्र डाला था, कोई उत्तर आपकी ओर से नहीं मिला!
क्या ‘जन संस्कृति’ आजकल नहीं निकल रहीं है ?
कृपया समय निकाल कर मुझे tambatin@gmail.com पर मेल करने का कष्ट करें अगर भूले ना हों तो।
शेष फिर।

प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in

डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने कहा…

yah ek sarahneeya patrika hai

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

swaagat hai.

Unknown ने कहा…

आपका लेख पड्कर अछ्छा लगा, हिन्दी ब्लागिंग में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरे ब्लाग पर आपकी राय का स्वागत है, क्रपया आईये

http://dilli6in.blogspot.com/

मेरी शुभकामनाएं
चारुल शुक्ल
http://www.twitter.com/charulshukla