मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

लखनऊ में विरोध सभा २ जन. कों

कारपोरेट जगत का देखो खेल
विनायक सेन को भेजे जेल

पी0 यू0 सी0 एल0 के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ विनायक सेन की उम्रकैद की सजा
के खिलाफ

विरोध सभा
तारीख व समय: 02 जनवरी 2011, दिन के 1.00 बजे
स्थान: शहीद स्थल, लखनऊ
शहर के बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, नागरिक व लोकतांत्रिक अधिकार संगठनों, जन आंदोलन के कार्यकर्ताओं से अपील है कि इस विरोध सभा में शामिल हों।
निवेदक
कौशल किशोर
संयोजक, जन संस्कृति मंच, लखनऊ
मो - 09807519227, 08400208031

लखनऊ के लेखकांे व संस्कृतिकर्मियों का कहना है:

डॉ विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा जनप्रतिरोध की आवाज को कुचलना है

लखनऊ, 28 दिसम्बर। जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित सभा में लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक व राजनीतिक कार्यकताओं ने पी यू सी एल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ विनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लगाते हुए उन्हें दी गई उम्रकैद की सजा पर अपना पुरजोर विरोध प्रकट किया है। यह सभा अमीनाबाद इण्टर कॉलेज में हुई जिसमें इससे सम्बन्धित प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें कहा गया कि लोकतंत्र के सभी स्तम्भ आज पूँजी के मठ व गढ़ में बदल गये हैं जहाँ से जनता, उसके अधिकारों व लोकतंात्रिक मूल्यों पर गोलाबारी की जा रही है। इसने न्ययापालिका के चरित्र का पर्दाफाश कर दिया है। डॉ विनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लगाने व उन्हें उम्रकैद की सजा देने का एक मात्र उद्देश्य जनता के प्रतिरोध की आवाज को कुचल देना है तथा सरकार का विरोध करने वालों को यह संदेश देना है कि वे सावधान हो जायें और सŸाा के लिए कोई संकट पैदा न करें।

इस घटना पर विरोध प्रकट करने वालों में लेखक अनिल सिन्हा, शकील सिद्दीकी, डॉ गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, कवि भगवान स्वरूप कटियार, कौशल किशोर, ब्रह्मनारायण गौड, श्याम अंकुरम़ व वीरेन्द्र सारंग, कवयित्री व पत्रकार प्रतिभा कटियार, कथाकार सुरेश पंजम व सुभाष चन्द्र कुशवाहा, नाटककार राजेश कुमार, ‘अलग दुनिया’ के के0 के0 वत्स, ‘कर्मश्री’ की सम्पादिका पूनम सिंह, एपवा की विमला किशोर, कलाकार मंजु प्रसाद, लेनिन पुस्तक केन्द्र के प्रबन्धक गंगा प्रसाद, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण खोटे, इंकलाबी नौजवान सभा के प्रादेशिक महामंत्री बालमुकुन्द धूरिया, भाकपा ;मालेद्ध के शिवकुमार, लक्षमी नारायण एडवोकेट, ट्रेड यूनियन नेता के0 के0 शुक्ला, डॉ मलखान सिंह, जानकी प्रसाद गौड़ प्रमुख थे।

प्रस्ताव में माँग की गई है कि डॉ सेन को आरोप मुक्त कर उन्हें रिहा किया जाय। प्रस्ताव में आगे कहा गया है कि जिस छतीसगढ़ विशेष लोक सुरक्षा कानून 2005 और गैरकानूनी गतिविधि ;निरोधकद्ध कानून 1967 के अन्तर्गत डॉ विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा दी गई है, ये कानून अपने चरित्र में दमनकारी हैं और ऐसे जनविरोधी कानून का इस्तेमाल यही दिखाता है कि देश में अघोषित इमरजेन्सी जैसी स्थिति है। जब भ्रष्टाचारी, अपराधी, माफिया व धनपशु सŸाा को सुशोभित कर रहे हों, सम्मान पा रहे हों, वहाँ आदिवासियों, जनजातियों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना, जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना तथा सलवा जुडुम से लेकर सरकार के जनविरोधी कार्यों का विरोध करने वाले डॉ सेन पर दमनकारी कानून का सहारा लेकर आजीवन कारावास की सजा देने से यही बात सिद्ध होती है।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि सŸाा द्वारा देशभक्ति का नया मानक गढ़ा जा रहा है जिसके द्वारा सच्चाई और तथ्यों का गला घोंटा जा रहा है। इस मानक में यदि आप फिट नहीं हैं तो आपको देशद्रोही घोषित किया जा सकता है और आपके विरूद्ध कार्रवाई की जा सकती है, आप गिरफ्तार किये जा सकते हैं आपको सजा दी जा सकती है और आप देश छोड़ने तक के लिए बाध्य किये जा सकते हैं। यही अरुंधती राय के साथ किया गया। उनके ऊपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया है और डॉ विनायक सेन को देशद्रोही करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। इन घटनाओं ने हमारे इर्द।गिर्द फैले अंधेरे को गहरा किया है और समय की माँग है कि इनके विरूद्ध हम लाम बन्द हों बकौल मुक्तिबोध ‘अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे/तोड़ने होंगे गढ़ और मठ सभी "

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ

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निरंकुश राजसत्ताओं ने फिर दण्डित किया कलाकारों कों

शायर अकाल शातिर और इरानी फिल्मकार जाफर पनाही का साथ दें

निरंकुश राजसत्ताएं सदैव से ही विरोध के प्रति असहिष्णु रही हैं ।अगर ये सत्ताएँ धर्मं पर आधारित हों तो कहना ही क्या ? हाल की दो अत्यंत निंदनीय घटनाओं ने इस बात को ओर भी पुष्ट किया हे. एक का सम्बन्ध भारत के गुजरात राज्य से है , तो दूसरे का समबन्ध इरान के इस्लामिक राज से. गुजरात तो भारत के सेक्युलर राज्य के भीतर एक राज्य है, लेकिन नरेन्द्र मोदी उसे हिंदुत्व की विचारधारा के तहत संचालित करते हैं. हाल ही में शायर अकाल शातिर को इस निजाम का तब शिकार होना पडा जब उनकी शायरी की किताब 'अभी ज़िंदा हूँ मैं ' में प्रकाशित एक आलोचक की टिप्पणी से नाराज़ होकर गुजरात उर्दू साहित्य अकादमी ने किताब के प्रकाशन के लिए दी गयी १००००/- की सहायता राशि वापस करने के लिए शायर को नोटिस थमाई है . यह टिप्पणी रौनक अफरोज ने लिखी है जिसमें मोदी की भर्त्सना की गयी है. टिप्पणी के जिस अंश पर अकादमी ने एतराज़ जताते हुए अपनी पुस्तक प्रकाशन योजना के लिए सहायता देने के नियमों के खिलाफ बताया है, वह इस प्रकार हे-" नरेन्द्र मोदी के इक्तेदार में आते ही उसने इस रियासत से उर्दू का सफाया ही करा दिया. मोदी ने सिर्फ इतने पर ही इक्तेफा नहीं किया, बल्कि २००२ में एक सोचे समझे मंसूबे के तहत पूरे गुजरात में फिरकावारान फसादात और हैवानियत का वो नंगा खेल खेला कि पूरी इंसानियत ही शर्मसार हो कर रह गयी. हर तरफ लूट मार, क़त्ल-ओ-गारतगीरी , इस्मतदारी,आतिज़नी और अक़लियाती नस्लकुशी जैसी संगीन वारदात करवाकर उसने पूरे मुल्क में खौफ -ओ-हिरास पैदा कर दिया था." भिवंडी के नक्काद अफ़रोज़ की टिप्पणी इस किताब के पृष्ठ संख्या १४ पर छपी है. इस प्रकरण से यह भी साफ़ होता जा रहा है कि साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की बहुप्रचारित स्वायत्तता ऐसे राज्यों में कितनी खोखाली है. अफारोज़ का वक्तव्य वैसा ही है जैसा मोदी के शासन में राज्य -प्रायोजित अल्पसंख्यकों के जनसंहार को लेकर किसी भी सोचने समझाने वाले इंसान का हो सकता है. इस तरह के वक्तव्य तमाम मानवाधिकार रिपोर्टों में मोदी के शासन को लेकर सहज ही देखे जा सकते हैं. बहरहाल शातिर ने अफारोज़ की टिप्पणी को शामिल कर हिम्मत का काम किया है . हमें उनकी हौसला अफजाई करने के साथ-साथ उनके संघर्ष में हर चंद मदद करनी चाहिए. गुजरात उर्दू साहित्य अकादमी को उन्हें दी गयी नोटिस को वापस लेना चाहिए . उसकी इस हरकत से अभिव्यक्ति की आज़ादी तो एक और धक्का लगा है जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है

दूसरी घटना और भी ज्यादा भयानक है। मशहूर इरानी फिल्मकार जफर पनाही को इरान के निरंकुश इस्लामी शासन ने ६ साल की कैद और २० साल तक फिल्में बनाने या निर्देशित करने, स्क्रिप्ट लिखने, विदेशा यात्रा करने और मीडिया में इंटरव्यू देने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। उनपर आरोप है कि वे शासन के खिलाफ प्रचार अभियान चला रहे थे। पनाही इससे पहले जुलाई २००९ में गिरफ्तार किए गए थे जब वे राष्ट्रपति पद के लिए हुए विवादास्पद चुनाव में मारे गए आन्दोलनकारियों के शोक में शामिल हुए थे। छूटने के बाद उनपर विदेश जाने पर प्रतिबन्ध तभी से लगा हुआ है। फरवरी २०१० में वे फिर अपने परिवार और सहकर्मियों के साथ गिरफ्तार किए गए। वे इरान में लगातार विपक्ष की आवाज़ बने हुए हैं. महान अब्बास किअरोस्तामी के साथ अपने फ़िल्मी सफर की शुरुआत करने वाले पनाही को अपनी पहली ही फीचर फिल्म 'वाईट बैलून ' के लिए १९९५ के कैन्स फिल्म समारोह में पुरस्कृत किया गया. उनके नाटक 'द सर्किल ' के लिए सन २००० में वेनिस का 'गोल्डन लिओन' पुरस्कार मिला. उनकी मशहूर फिल्मों में 'वाईट बैलून' के अलावा 'द मिरर', 'क्रिमसन गोल्ड' तथा 'ऑफ साइड' जैसी फिल्में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म दुनिया की अमूल्य निधियां हैं. जाफर पनाही जैसे महान फिल्मकार को इरान की निरंकुश धर्मसता द्वारा प्रताड़ित किए जाने की हम निंदा करते हैं और सभी कलाकारों , संस्कृतिकर्मियों से आग्रह करते हैं कि वे भारत में इरानी एम्बेसी की मार्फ़त इस तानाशाहीपूर्ण कदम का पुरजोर विरोध इरानी शासकों को अवश्य दर्ज कराएं .प्रणय क्रष्ण , महासचिव, जन संस्कृति मंच

प्रणय कृष्ण
महासचिव
जन संस्कृति मंच

लोकतंत्र को उम्रकैद

25 दिसम्बर, 2010
ये मातम की भी घडी है और इंसाफ की एक बडी लडाई छेडने की भी. मातम इस देश में बचे-खुचे लोकतंत्र का गला घोंटने पर और लडाई - न पाए गए इंसाफ के लिए जो यहां के हर नागरिक का अधिकार है. छत्तीसगढ की निचली अदालत ने विख्यात मानवाधिकारवादी, जन-चिकित्सक और एक खूबसूरत इंसान डा. बिनायक सेन को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और धारा 124-ए, छत्तीसगढ विशेष जन सुरक्षा कानून की धारा 8(1),(2),(3) और (5) तथा गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून की धारा 39(2) के तहत राजद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने की साज़िश करने के आरोप में 24 दिसम्बर के दिन उम्रकैद की सज़ा सुना दी. यहां कहने का अवकाश नहीं कि कैसे ये सारे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं. डा. सेन को इन आरोपों में 24 मई, 2007 को गिरफ्तार किया गया और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पूरे दो साल साधारण कैदियों से भी कुछ मामलों में बदतर स्थितिओं में जेल में रहने के बाद, उन्हें ज़मानत दी गई. मुकादमा उनपर सितम्बर 2008 से चलना शुरु हुआ. सर्वोच्च न्यायालय ने यदि उन्हें ज़मानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी 2011 तक कर दिया जाए, तो छत्तीसगढ सरकार की योजना थी कि मुकदमा दसियों साल चलता रहे और जेल में ही बिनायक सेन बगैर किसी सज़ा के दसियों साल काट दें. बहरहाल जब यह सज़िश नाकाम हुई और मजबूरन मुकदमें की जल्दी-जल्दी सुनवाई में सरकार को पेश होना पडा, तो उसने पूरा दम लगाकर उनके खिलाफ फर्ज़ी साक्ष्य जुटाने शुरु किए. डा. बिनायक पर आरोप था कि वे माओंवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में 33 बार 26 मई से 30 जून, 2007 के बीच मिले. सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि नारायण सान्याल के इलाज के सिलसिले में ये मुलाकातें जेल अधिकारियों की अनुमति से , जेलर की उपस्थिति में हुईं. डा. सेन पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने नारायण सान्याल से चिट्ठियां लेकर उनके माओंवादी साथियों तक उन्हें पहुंचाने में मदद की. पुलिस ने कहा कि ये चिट्ठियां उसे पीयुष गुहा नामक एक कलकत्ता के व्यापारी से मिलीं जिसतक उसे डा. सेन ने पहुंचाया था. गुहा को पुलिस ने 6 मई,2007 को रायपुर में गिरफ्तार किया. गुहा ने अदालत में बताया कि वह 1 मई को गिरफ्तार हुए. बहरहाल ये पत्र कथित रूप से गुहा से ही मिले, इसकी तस्दीक महज एक आदमी अ़निल सिंह ने की जो कि एक कपडा व्यापारी है और पुलिस के गवाह के बतौर उसने कहा कि गुहा की गिरफ्तरी के समय वह मौजूद था. इन चिट्ठियों पर न कोई नाम है, न तारीख, न हस्ताक्षर , न ही इनमें लिखी किसी बात से डा. सेन से इनके सम्बंधों पर कोई प्रकाश पडता है. पुलिस आजतक भी गुहा और डा़ सेन के बीच किसी पत्र-व्यवहार, किसी फ़ोन-काल,किसी मुलाकात का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई. एक के बाद एक पुलिस के गवाह जिरह के दौरान टूटते गए. पुलिस ने डा.सेन के घर से मार्क्सवादी साहित्य और तमाम कम्यूनिस्ट पार्टियों के दस्तावेज़ , मानवाधिकार रिपोर्टें, सी.डी़ तथा उनके कम्प्यूटर से तमाम फाइलें बरामद कीं. इनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जो किसी भी सामान्य पढे लिखे, जागरूक आदमी को प्राप्त नहीं हो सकतीं. घबराहट में पुलिस ने भाकपा (माओंवादी) की केंद्रीय कमेटी का एक पत्र पेश किया जो उसके अनुसार डा. सेन के घर से मिला था. मज़े की बात है कि इस पत्र पर भी भेजने वाले के दस्तखत नहीं हैं. दूसरे, पुलिस ने इस पत्र का ज़िक्र उनके घर से प्राप्त वस्तुओं की लिस्ट में न तो चार्जशीट में किया था, न ”सर्च मेमों” में. घर से प्राप्त हर चीज़ पर पुलिस द्वारा डा. बिनायक के हस्ताक्षर लिए गए थे. लेकिन इस पत्र पर उनके दस्तखत भी नहीं हैं. ज़ाहिर है कि यह पत्र फर्ज़ी है. साक्ष्य के अभाव में पुलिस की बौखलाहट तब और हास्यास्पद हो उठी जब उसने पिछली 19 तारीख को डा.सेन की पत्नी इलिना सेन द्वारा वाल्टर फर्नांडीज़, पूर्व निदेशक, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट ( आई.एस. आई.),को लिखे एक ई-मेल को पकिस्तानी आई.एस. आई. से जोडकर खुद को हंसी का पात्र बनाया. मुनव्वर राना का शेर याद आता है-

“बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के बरतन पे आई.एस.आई लिक्खा है”

इस ई-मेल में लिखे एक जुमले ”चिम्पांज़ी इन द वाइटहाउस” की पुलिसिया व्याख्या में उसे कोडवर्ड बताया गया.( आखिर मेरे सहित तमाम लोग इतने दिनॉं से मानते ही रहे हैं कि ओंबामा से पहले वाइट हाउस में एक बडा चिंम्पांज़ी ही रहा करता था.) पुलिस की दयनीयता इस बात से भी ज़ाहिर है कि डा.सेन के घर से मिले एक दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें शहरों में माओंवादी नेटवर्क फैलाने वाला बताया गया. यह दस्तावेज़ सर्वसुलभ है. यह दस्तावेज़ सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक, ”रेड सन- ट्रैवेल्स इन नक्सलाइट कंट्री” में परिशिष्ट के रूप में मौजूद है. कोई भी चाहे इसे देख सकता है. कुल मिलाकर अदालत में और बाहर भी पुलिस के एक एक झूठ का पर्दाफाश होता गया. लेकिन नतीजा क्या हुआ? अदालत में नतीजा वही हुआ जो आजकल आम बात है. भोपाल गैस कांड् पर अदालती फैसले को याद कीजिए. याद कीजिए अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को .क्या कारण हे कि बहुतेरे लोगों को तब बिलकुल आश्चर्य नहीं होता जब इस देश के सारे भ्रश्टाचारी, गुंडे, बदमाश , बलात्कारी टी.वी. पर यह कहते पाए जाते हैं कि वे न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं?

याद ये भी करना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह की धाराएं कब की हैं. राजद्रोह की धारा 124 -ए जिसमें डा. सेन को दोषी करार दिया गया है 1870 में लाई गई जिसके तहत सरकार के खिलाफ ”घृणा फैलाना”, ” अवमानना करना” और ” असंतोष पैदा”करना राजद्रोह है. क्या ऐसी सरकारें घृणित नहीं है जिनके अधीन 80 फीसदी हिंदुस्तानी 20 रुपए रोज़ पर गुज़ारा करते हैं? क्या ऐसी सरकारें अवमानना के काबिल नहीं जिनके मंत्रिमंडल राडिया, टाटा, अम्बानी, वीर संघवी, बर्खा दत्त और प्रभु चावला की बातचीत से निर्धारित होते हैं ? क्या ऐसी सरकारों के प्रति हम और आप असंतोष नहीं रखते जो आदिवसियों के खिलाफ ”सलवा जुडूम” चलाती हैं, बहुराश्ट्रीय कम्पनियों और अमरीका के हाथ इस देश की सम्पदा को दुहे जाने का रास्ता प्रशस्त करती हैं. अगर यही राजद्रोह की परिभाशा है जिसे गोरे अंग्रेजों ने बनाया था और काले अंग्रेजों ने कायम रखा, तो हममे से कम ही ऐसे बचेंगे जो राजद्रोही न हों . याद रहे कि इसी धारा के तहत अंग्रेजों ने लम्बे समय तक बाल गंगाधर तिलक को कैद रखा.

डा. बिनायक और उनकी शरीके-हयात इलीना सेन देश के उच्चतम शिक्षा संस्थानॉं से पढकर आज के छत्तीसगढ में आदिवसियों के जीवन में रच बस गए. बिनायक ने पी.यू.सी.एल के सचिव के बतौर छत्तीसगढ सरकार को फर्ज़ी मुठभेड़ों पर बेनकाब किया, सलवा-जुडूम की ज़्यादतियों पर घेरा, उन्होंने सवाल उठाया कि जो इलाके नक्सल प्रभावित नहीं हैं, वहां क्यों इतनी गरीबी,बेकारी, कुपोषण और भुखमरी है?. एक बच्चों के डाक्टर को इससे बडी तक्लीफ क्या हो सकती है कि वह अपने सामने नौनिहालों को तडपकर मरते देखे?

इस तक्लीफकुन बात के बीच एक रोचक बात यह है कि साक्ष्य न मिलने की हताशा में पुलिस ने डा.सेन के घर से कथित रूप से बरामद माओंवादियों की चिट्ठी में उन्हें ”कामरेड” संबोधित किए जाने पर कहा कि ”कामरेड उसी को कहा जाता है, जो माओंवादी होता है ”. तो आप में से जो भी कामरेड संबोधित किए जाते हों ( हों भले ही न), सावधान रहिए. कभी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के सौ पदों का अनुवाद किया था. कबीर की पंक्ति थी, ”निसिदिन खेलत रही सखियन संग”. गुरुदेव ने अनुवाद किया, ”Day and night, I played with my comrades' मुझे इंतज़ार है कि कामरेड शब्द के इस्तेमाल के लिए गुरुदेव या कबीर पर कब मुकदमा चलाया जाएगा?

अकारण नहीं है कि जिस छत्तीसगढ में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के हत्यारे कानून के दायरे से महफूज़ रहे, उसी छत्तीसगढ में नियोगी के ही एक देशभक्त, मानवतावादी, प्यारे और निर्दोष चिकित्सक शिष्य को उम्र कैद दी गई है. 1948 में शंकर शैलेंद्र ने लिखा था,

“भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की !

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे--
बंब संब की छोड़ो, भाशण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “

ऊपर की पंक्तियों में ब़स कांग्रेस के साथ भाजपा और जोड़ लीजिए.
आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड के दोषी, निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है.

- मित्रों मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो , जितनी दूर तक हो हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों जिसके खिलाफ नई आज़ादी के एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन.

प्रणय कृष्ण , महासचिव, जन संस्कृति मंच

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

संगोष्ठी रपट : एस0 के0 पंजम की कृतियाँ:

अतीत व वर्तमान के संघर्ष का दस्तावेज

कौशल किशोर

जाने-माने युवा लेखक एस0 के0 पंजम के उपन्यास ‘गदर जारी रहेगा’ तथा इतिहास की पुस्तक ‘शूद्रों का प्राचीनतम इतिहास’ का विमोचन 26 दिसम्बर 2010 (रविवार) को लखनऊ में अमीनाबाद इण्टर कॉलेज, अमीनाबाद के सभागार में हुआ। कार्यक्रम का आयोजन जन संस्कृति मंच (जसम) ने किया था जिसकी अध्यक्षता करते हुए हिन्दी के वरिष्ठ कवि ब्रहमनारायण गौड़ ने कहा कि पंजम की ये दोनों पुस्तकें अतीत व वर्तमान के संघर्ष का दस्तावेज हैं। ‘गदर जारी रहेगा’ के माध्यम से सरकार की जन विरोधी नीतियों को चुनौती देने का जो साहस किया गया है, वह प्रशंसनीय है। अपनी पुस्तक ‘शूद्रों का प्रचीनतम इतिहास’ के द्वारा पंजम ने अतीत के छुपाये गये तथ्यों पर से घूल झाड़ कर सच्चाई को सामने लाने का काम किया है। कार्यक्रम का संचालन जसम के संयोजक व कवि कौशल किशोर ने किया ।

गौरतलब है कि एस0 के0 पंजम की दोनों पुस्तकें दिव्यांश प्रकाशन (एम0आई0जी0 222, टिकैतराय कॉलोनी, लखनऊ) से अभी हाल में प्रकाशित हुई हैं। ‘शूद्रों का प्राचीनतम इतिहास’ (मूल्य- सजिल्दः 495.00, पेपर बैकः 250.00) इतिहास की पुस्तक है जिसमें वैज्ञानिक व तर्कसंगत तरीके से इस सवाल का जवाब खोजा गया है कि शूद्र वर्ग कौन है, इसकी उत्पति कैसे हुई ? इसी क्रम में सृष्टि, पृथ्वी व जीव की उत्पति से होते हुए भारत में नस्लों की उत्पति तथा शूद्र वर्ण एवं जाति नहीं, बल्कि नस्ल हैं, इसका विशद अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। वैदिक काल में शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति की क्या स्थिति रही है, बौद्ध काल में शिक्षा, आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था कैसी रही है, भारतीय समाज में दास प्रथा और वर्ण व्यवस्था व उसकी संस्कृति व संस्कार किस रूप में रहे हैं आदि का वृहत वर्णन है। ‘शूद्रस्तान’ की चर्चा करते हुए पुस्तक में फुले, साहूजी, पेरियार, अम्बेडकर, जगजीवन राम के विचारों को सामने लाया गया है।

वहीं ‘गदर जारी रहेगा’ (मूल्य- सजिल्दः 250.00, पेपर बैकः 150.00) उपन्यास है। सŸाा का दमन, उसके द्वारा जनता का शोषण, जल, जंगल, जमीन से गरीब जनता का विस्थापन व बेदखली और जन प्रतिरोध, इस विषय पर यह उपन्यास केन्द्रित है। आज भी भारत में अंग्रेज सरकार द्वारा बनाये गये नब्बे प्रतिशत काले कानून लागू हैं। उन्हीं में एक है भूमि अधिग्रहण कानून 1894 । विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) का जन्म इसी से होता है। देश में इस समय 512 सेज हैं। यह सेज क्या है ? किसके हितों के लिए है ? आज के नये सामंत कौन हैं ? इनसे उपन्यास परिचित कराता है। देशी-विदेशी पूँजीपतियों के पक्ष में खड़ी सŸाा की एक तरफ बन्दूकें हैं तो दूसरी तरफ अपनी सम्पदा और अधिकारों के लिए संघर्ष करती, अपना रक्त बहाती जनता है। इसी संघर्ष की उपज नन्दीग्राम, सिंगूर व कलिंग नगर आदि हैं। ‘गदर जारी रहेगा’ सेज के नाम पर उजाड़ी गई जनता के प्रतिरोध संघर्ष की कहानी है।

हिन्दी-उर्दू के जाने-माने लेखक शकील सिद्दीकी और सामाजिक कार्यकर्ता अरुण खोटे ने पुस्तकों का विमोचन किया। इस अवसर पर बोलते हुए शकील सिद्दीकी ंने कहा कि एस0 के0 पंजम की इतिहास की पुस्तक हमें अतीत को समझने में मदद करती है। हमारा अतीत उथल-पुथल से भरा है और उसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। ब्राहमणवाद, पुरातनपंथ से संघर्ष के बिना हम अपने समाज को प्रगतिशील व आधुनिक नहीं बना सकते हैं। हालत यह है कि अम्बेडकर को मानने वाले भी कर्मकांड का अनुसरण कर रहे हैं। जरूरत उनके रेडिकल विचारों को सामने लाने की है। आज समाज में मानव विरोधी शक्तियाँ ज्यादा आक्रामक हुई हैं। इस हालत में साहित्य मात्र समाज का दर्पण बनकर नहीं रह सकता है। उसे समाज परिवर्तन का हथियार बनना पड़ेगा। यह अच्छी बात है कि पंजम इसी प्रतिबद्धता के साथ साहित्य में सक्रिय हैं।

अपने संयोजकीय वक्तव्य में कौशल किशोर ने दोनों पुस्तकों का परिचय देते हुए कहा कि एस0 के0 पंजम का उपन्यास ‘गदर जारी रहेगा’ विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के यथार्थ को सामने लाता है। वहीं ‘शूद्रों का प्राचीनतम इतिहास’ प्राचीन भारतीय समाज के सामाजिक द्वन्द्व को समग्रता में देखने व समझने का प्रयास है। ये दोनों पुस्तकें एस0 के0 पंजम की लेखन-यात्रा में मील का पत्थर हैं।

‘गदर जारी रहेगा’ पर अपना आधार वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कवि व लेखक श्याम अंकुरम ने कहा कि पंजम का लेखन बेतरतीब आक्रोश, चिढ़ भरे गुस्से का विवरण होता रहा है जो ‘गदर जारी रहेगा’ में विस्तार पाकर संगठित संघर्ष के रूप में नियोजित विद्रोह बन जाता है। बेतरतीब आक्रोश से संगठित विद्रोह तक की इनकी यह यात्रा अपने स्वअर्जित अनुभव व विवेक द्वारा तय की गई है, ‘भूख व्यक्ति को श्रम सिखाती है, भूख व्यक्ति को हिंसा सिखाती है, भूख व्यक्ति को संघर्ष में झोकती है और संघर्ष से शहादत मिलती है’। शहादत की यह अनिवार्यता इनके उपन्यास में जगह-जगह है जो खेतिहर मजदूर, दलित, आदिवासियों के वर्ग संश्रय निर्माण के जरिये इस नजरिये को उदघाटित करती है, ‘आज लड़ाई धर्म व जाति की नहीं है और है भी तो यह बहुत छोटी-संकुचित है। असल लड़ाई तो समाजवाद की है।’

लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा ने कहा कि यह आज के राजनीतिक संघर्ष का उपन्यास है। ंिसंगूर, नन्दीग्राम, कलिंगनगर में जो दमन-उत्पीड़न हुआ, यही इसकी विषय वस्तु है। यहाँ एक तरफ देशी-विदेशी पूँजीपतियों के पक्ष में खड़ी सŸाा की बन्दूकें हैं तो दूसरी तरफ अपनी सम्पदा और अधिकारों के लिए संघर्ष करती जनता है। इस अवसर पर ‘निष्कर्ष’ के संपादक डॉ0 गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि पंजम का उपन्यास आज के समय से मुठभेड़ करता है और जरूरी विषय उठाता है लेकिन उपन्यास का कलापक्ष कमजोर है जिस पर पंजम को ध्यान देने की जरूरत है। उपन्यास पर पत्रकारिता हावी है। साहित्य विचार व राजनीति विहिन नहीं हो सकता लेकिन यह जितना ही छिपे रूप में आये, उसका असर ज्यादा गहरा होता है।

‘घी के लड्डू टेढ़ो भले’ कहावत का उद्धरण देते हुए कवि व आलोचक चन्द्रेश्वर ने कहा कि इस भयानक दौर में कला और शिल्प से ज्यादा जरूरी है कि आपका लेखन लूट और दमन के विरूद्ध है या नहीं। वैसे ‘गदर’ शब्द हिन्दी में 1857 के संदर्भ में आया जिसका प्रयोग नकारात्क अर्थों में किया गया लेकिन पंजम के उपन्यास में इसका अर्थ संघर्ष व प्रतिरोध है। इस दौर में जब कथा व उपन्यास लेखन बहुत मनोगत हुआ है, ऐसे में उपन्यास के माध्यम से ‘सेज’ के यथार्थ और जन प्रतिरोध की अभिव्यक्ति इस उपन्यास को प्रासंगिक बनाता है।

इस अवसर पर ‘अलग दुनिया’ के के0 के0 वत्स, अनन्त लाल, अंग्रेजी के प्रवक्ता राम सिंह प्रेमी, डॉ मलखन सिंह आदि ने भी अपने विचार प्रकट किये। कार्यक्रम में लेखकों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक व समाजिक कार्यकर्ताओं की अच्छी-खासी उपस्थिति थी जिनमें नाटककार राजेश कुमार कवि भगवान स्वरूप कटियार व वीरेन्द्र सारंग, ‘कर्म श्री’ की सम्पादिका पूनम सिंह, कथाकार नसीम साकेती, कलाकार मंजु प्रसाद, लेनिन पुस्तक केन्द्र के गंगा प्रसाद, लक्षमीनारायण एडवोकेट, एपवा की विमला किशोर, इंकलाबी नौजवान सभा के प्रादेशिक महामंत्री बालमुकुन्द धूरिया, भाकपा (माले) के शिवकुमार आदि प्रमुख थे।

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सोमवार, 20 दिसंबर 2010

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प्रतिरोध का सिनेमा का दूसरा पटना फ़िल्म उत्सव

जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव का विवेक है सिनेमा
शाजी एन. करुन
दूसरे पटना फ़िल्म उत्सव में उदघाटन वक्तव्य देते हुए शाजी एन करून


‘सिनेमा मनुष्य के कला के साथ अंतर्संबंध का दृश्य रूप है। मनुष्य के जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव के विवेक का नाम सिनेमा है। चीजों, घटनाओं या परिस्थितियों और सही-गलत मूल्यों की गहरी समझदारी, बोध और ज्ञान से ही यह विवेक निर्मित होता है। हम जिस यथार्थ को देख सकते हैं या देखना चाहते हैं, कला उसे ही सामने रखती है।’ प्रसिद्ध फ़िल्मकार शाजी एन करुन ने जसम-हिरावल द्वारा कालिदास रंगालय में आयोजित त्रिदिवसीय पटना फ़िल्मोत्सव - प्रतिरोध का सिनेमा का उद्घाटन करते हुए कला और यथार्थ के रिश्ते पर एक महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया।

उद्घाटन से पूर्व मीडियाकर्मियों से एक मुलाकात में फ़िल्मोत्सव के मुख्य अतिथि शाजी एन. करुन ने कहा कि सिनेमा हमारी स्मृतियों को उसके सामाजिक आशय के साथ दर्ज करता है। सिनेमा अपने आप में एक बड़ा दर्शन है। लेकिन हमारे यहां इसका सार्थक इस्तेमाल कम हो हो रहा है। हमारे देश में करीब 1000 फिल्में बनती हैं लेकिन दुनिया के फ़िल्म समारोहों में चीन, वियतनाम, कोरिया, मलेशिया और कई छोटे-छोटे देशों की फ़िल्में हमसे ज्यादा दिखाई पड़ती हैं, इसलिए कि वे उन देशों के जीवन यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं और उन्हें सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं बनाया जाता।

शाजी एन करून
अपनी फ़िल्म कुट्टी स्रांक के लिए श्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय सम्मान पाने वाले शाजी एन. करुन ने कहा कि आस्कर
अवार्ड वाली फ़िल्में पूरी दुनिया में दिखाई जाती हैं, जबकि नेशनल अवार्ड पाने वाली फ़िल्में इस देश में ही दिखाई नहीं जातीं। अब तक वे छह बड़ी फ़िल्में बना चुके हैं और उनके लिए यह पहला मौका है कि बिहार में जनता के प्रयासों से हो रहे फ़िल्मोत्सव में उनकी एक फ़िल्म दिखाई जा रही है। इस तरह के प्रयास राख में दबी हुई चिंगारी को सुलगाने की तरह हैं। शाजी ने कहा कि आर्थिक समृद्धि से भी कई गुना ज्यादा जरूरी सांस्कृतिक समृद्धि है। आज किसी भी आदमी को अपनी दस यादें बताने को कहा जाए तो वह कम से कम एक अच्छी फ़िल्म का नाम लेगा। लेकिन बालीवुड की मुनाफा वाली फ़िल्मों और टेलीविजन में जिस तरह के कार्यक्रमों की भीड़ है, उसके जरिए कोई सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं हो सकता। आज जरूरत है कि सिनेमा को सामाजिक बदलाव के माध्यम के बतौर इस्तेमाल किया जाए।

इस दौरान प्रतिरोध का सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने बताया कि यह आयोजन देश में इस तरह का 16वां आयोजन है, जो बगैर किसी बडे़ पूंजीपति, सरकार या कारपोरेट सेक्टर की मदद के हो रहा है। फ़िल्मोत्सव स्वागत समिति की अध्यक्ष ‘सबलोग’ की संपादक मीरा मिश्रा ने कहा कि आज समाज के हर क्षेत्र में अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की जरूरत है। प्रतिरोध का सिनेमा इसी लक्ष्य से प्रेरित है।

उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध कवि आलोकधन्वा ने
कहा कि बहुमत हमेशा लोकतंत्र का सूचक नहीं होता, कई बार वह लोकतंत्र का अपहरण करके भी आता है।कला की दुनिया जिन बारीक लोकतांत्रिक संवेदनाओं के पक्ष में खड़ी होती है,कई बार वह बड़ी उम्मीद को जन्म देती है। हमारे भीतर लोकतांत्रिकमूल्यों को पैदा करने में विश्व और देश की क्लासिकफ़िल्मों ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इस वक्त अंधेरा बहुत घना है। इस अंधेरे वक्त में जनभागीदारी वाले ऐसे आयोजन उजाले की तरह हैं।
वास्तविक लोकतंत्र के लिए वामपंथ का जो संघर्ष है,
उससे अलग करके इस आयोजन को नहीं देखा जा सकता।


इस मौके पर इतिहास की प्रोफेसर डा. भारती एस कुमार ने शाजी एन. करुन को गुलदस्ता भेंट किया। डा. सत्यजीत ने फ़िल्मोत्सव की स्मारिका का लोकार्पण किया। उद्घाटन सत्र के आखिर में कवि गोरख पांडेय की स्मृति में लिखे गए दिनेश कुमार शुक्ल के गीत ‘जाग मेरे मन मछंदर’ को हिरावल के कलाकारों ने गाया। मंच पर अर्थशास्त्री प्रो. नवल किशोर चैधरी, अरुण कुमार सिंह, पत्रकार अग्निपुष्प और कथाकार अशोक भी मौजूद थे।

हिरावल द्वारा ‘जाग मेरे मन मछंदर’ की प्रस्तुति

दूसरे सत्र में शाजी एन. करुन की फिल्म कुट्टी स्रांक दिखाई गई। यह एक केरल के एक ऐसे नाविक की कहानी है जिसके जीवन का एकमात्र शौक चिविट्टु नाटकम (म्यूजिकल ड्रामा) है। उसका काम और उसका गुस्सैल स्वभाव उसे एक जगह टिकने नहीं देता। मनुष्य के सच्चे व्यवहार और सच्चे प्रेम के लिए उसकी अंतहीन प्रवृत्ति का प्रतिनिधि है वह। उसकी मृत्यु के बाद उसकी प्रेमिकाओं के जरिए उसका व्यक्तित्व खुलता है। फ़िल्म प्रदर्शन के बाद शाजी एन. करुन के साथ दर्शकों का विचारोत्तेजक संवाद हुआ।

दूसरे दिन फ़िल्म प्रदर्शन की शुरुआत अपनी मौलिक कथा के लिए आस्कर अवार्ड से नवाजी गई फ्रांसीसी फ़िल्म ‘दी रेड बलून’ से हुई। लेखक और निर्देशक अल्बर्ट लामोरेस्सी की इस फ़िल्म में बेहद कम संवाद थे। इसमें पास्कल नाम के बच्चे और उसके लाल गुब्बारे की कहानी है। गुब्बारा पास्कल के स्व से जुड़ा हुआ है। उस गुब्बारे को पाने और नष्ट कर देने के लिए दूसरे बच्चे लगातार कोशिश करते हैं। इस फ़िल्म को देखना अपने आप में बच्चों की फैंटेसी की दुनिया में दाखिल होने की तरह था। दूसरी फ़िल्म संकल्प मेश्राम निर्देशित ‘छुटकन की महाभारत’ थी। इस फिल्म में जब गांव में नौटंकी आती है तो उससे प्रभावित छुटकन सपना देखता है कि शकुनी मामा और दुर्योधन का हृदय परिवर्तन हो गया है और वे राज्य पर अपना दावा छोड़ देते हैं।
फ़िल्मोत्सव के दूसरे दिन दिखाई गई दो फ़िल्में अलग-अलग संदर्भों में धर्म और मनुष्य के रिश्ते की पड़ताल करती प्रतीत हुईं। राजनीति धर्म को किस तरह बर्बर और हिंसक बनाती है यह नजर आया उड़ीसा के कंधमाल के आदिवासी ईसाईयों पर हिंदुत्ववादियों के बर्बर हमलों पर बनाई गई फ़िल्म ‘फ्राम हिंदू टू हिंदुत्व’ में। उड़ीसा सरकार के अनुसार इन हमलों में 38 लोगों की जान गई थी, 3 लापता हुए थे, 3226 घर तहस-नहस कर दिए गए थे और 195 चर्च और पूजा घरों को नष्ट कर दिया गया था। 25,122 लोगों को राहत कैंपों में शरण लेना पड़ा और हजारों लोग जो उड़ीसा और भारत के अन्य इलाकों में पलायन कर गए, उनकी संख्या का कोई हिसाब नहीं है। बाबरी मस्जिद ध्वंस की पूर्व संध्या पर दिखाई गई इस फ़िल्म से न केवल कंधमाल के ईसाईयों की व्यथा का इजहार हुआ, बल्कि भाजपा-आरएसएस की सांप्रदायिक घृणा और हिंसा पर आधरित राजनीति का प्रतिवाद भी हुआ।

सहिष्णु कहलाने वाले हिंदू धर्म के स्वघोषित ठेकेदारों के हिंसक कुकृत्य के बिल्कुल ही विपरीत पश्चिम बंगाल के मुस्लिम फकीरों पर केंद्रित अमिताभ चक्रवर्ती निर्देशित फ़िल्म ‘बिशार ब्लूज’ में धर्म का एक लोकतांत्रिक और मानवीय चेहरा नजर आया। ये मुस्लिम फकीर- अल्लाह, मोहम्मद, कुरान, पैगंबर- सबको मानते हैं। लेकिन इनके बीच के रिश्ते को लेकर उनकी स्वतंत्र व्याख्या है। इन फकीरों के मुताबिक खुद को जानना ही खुदा को जानना है।

पहाड़ को काटकर राह बना देने वाले धुन के पक्के दशरथ मांझी पर बनाई गई फ़िल्म ‘दी मैन हू मूव्ड दी मांउटेन’ इस फ़िल्मोत्सव का आकर्षण थी। युवा निर्देशक कुमुद रंजन ने एक तरह से उस आस्था को अपने समय के एक जीवित संदर्भ के साथ दस्तावेजीकृत किया है कि मनुष्य अगर ठान ले तो वह कुछ भी कर सकता है। जिस ताकत की पूंजी और सुविधाओं पर काबिज वर्ग हमेशा अपनी प्रभुता के मद में उपेक्षा करता है या उपहास उड़ाता है, गरीब और पिछड़े हुए समाज और बिहार राज्य में अंतर्निहित उस ताकत के प्रतीक थे बाबा दशरथ मांझी। अकारण नहीं है कि इस फ़िल्म के निर्देशक को बाबा दशरथ मांझी से मिलकर कबीर से मिलने का अहसास हुआ।

सुमित पुरोहित निर्देशित फिल्म ‘आई वोक अप वन मार्निंग एंड फाउंड माईसेल्फ फेमस’ पूंजी की संस्कृति द्वारा मनुष्य को बर्बर और आदमखोर बनाए जाने की नृशंस प्रक्रिया को न केवल दर्ज करने, बल्कि उसका प्रतिरोध का भी एक प्रयास लगी। सुमित पुरोहित ने कालेज में अपने जूनियर दीपंकर की आत्महत्या और उस आत्महत्या को हैंडी-कैमरे में शूट करने वाले उसके बैचमेट अमिताभ पांडेय और उस दृश्य को बेचने वाली मीडिया के प्रसंग को अपनी फ़िल्म का विषय बनाया है। अमिताभ चूंकि शक्तिशाली घराने से ताल्लुक रखता था, जिसके कारण इस मामले को दबाने की कोशिश की गई, लेकिन चार वर्ष बाद सुमित और अन्य छात्रों ने उन तथ्यों को सामने लाने का फैसला किया, जिसकी प्रक्रिया में यह फ़िल्म भी बनी। इस फ़िल्म के सन्दर्भ में सबसे चौंकाने वाला तथ्य फ़िल्म के आख्रिर में स्क्रीन पर लिखे वक्तव्यों से पता चलता है. डाक्यूमेंटरी जैसे सरंचना वाली यह फ़िल्म वास्तव में एक कपोल कल्पना थी जिसका मकसद टी वी के सबकुछ देख लेने और कैद कर लेने पर अपनी टिप्पणी करना था.

अपने अस्तित्व की रक्षा के नाम पर सुविधाओं के भीषण होड़ में लगा
पूरा समाज, खासकर मध्यवर्ग क्यों अपने अस्तित्व की रक्षा के नाम
पर सुविधाओं के भीषण होड़ में लगा पूरा समाज, खासकर मध्यवर्ग
क्यों संवेदनहीन होता जा रहा है, क्यों वह मूल्यहीन और अमानवीय
हो रहा है, युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन निर्देशित नाटक
‘समझौता’ ने इसका जवाब तलाशने को प्रेरित किया। आहुती नाट्य एकाडमी, बेगूसराय की इस नाट्य प्रस्तुति में मानवेंद्रत्रिपाठी ने अविस्मरणीय एकल अभिनय किया। सुप्रसिद्ध साहित्यकार मुक्तिबोध की कहानी पर आधारित इस नाटक में मूल कहानी के भीतर एक रूपक चलता है सर्कस का, जहांमनुष्य ही शेर और रीछ बने हुए हैं। पशु की भूमिका में रूपांतरण की प्रक्रिया बहुत ही यातनापूर्ण और अपमानजनक है, जिसके खिलाफ एक आत्मसंघर्ष नायक के भीतर चलता है। नायक को लगता है कि उसकी सर्विस और सर्कस में कोई फर्क नहीं है। नाट्य रूपांतरण सुमन कुमार ने किया था। संगीत परिकल्पना संजय उपाध्याय की थी। संगीत संयोजन अवधेश पासवान का था और गायन में भैरव, चंदन वत्स, आशुतोष कुमार, मोहित मोहन, पंकज गौतम थे। मुक्तिबोध की इस कहानी के बारे में परिचय सुधीर सुमन ने दिया।संवेदनहीन होता जा रहा है, क्यों वह मूल्यहीन और अमानवीय हो रहा है, युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन निर्देशित नाटक ‘समझौता’ ने इसका जवाब तलाशने को प्रेरित किया। आहुति नाट्य एकाडमी, बेगूसराय की इस नाट्य प्रस्तुति में मानवेंद्र त्रिपाठी ने अविस्मरणीय एकल अभिनय किया। सुप्रसिद्ध साहित्यकार मुक्तिबोध की कहानी पर आधारित इस नाटक में मूल कहानी के भीतर एक रूपक चलता है सर्कस का, जहां मनुष्य ही शेर और रीछ बने हुए हैं। पशु की भूमिका में रूपांतरण की प्रक्रिया बहुत ही यातनापूर्ण और अपमानजनक है, जिसके खिलाफ एक आत्मसंघर्ष नायक के भीतर चलता है। नायक को लगता है कि उसकी सर्विस और सर्कस में कोई फर्क नहीं है। नाट्य रूपांतरण सुमन कुमार ने किया था। संगीत परिकल्पना संजय उपाध्याय की थी। संगीत संयोजन अवधेश पासवान का था और गायन में भैरव, चंदन वत्स, आशुतोष कुमार, मोहित मोहन, पंकज गौतम थे। मुक्तिबोध की इस कहानी के बारे में परिचय सुधीर सुमन ने दिया।
फ़िल्मोत्सव के समापन के रोज दर्शकों ने चार महिला फ़िल्मकारों की फ़िल्मों का अवलोकन किया। महिला दिवस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर प्रदर्शित ये फ़िल्में समाज की सचेतन महिला दृष्टि के गहरे सरोकारों की बानगी थीं।

इन फ़िल्मों के कथ्य और उसकी प्रस्तुति से दर्शक गहरे प्रभावित नजर आए। अनुपमा श्रीनिवासन निर्देशित
फ़िल्म ‘आई वंडर’ राजस्थान, सिक्किम और तमिलनाडु के ग्रामीण बच्चों के स्कूल, घर और उनकी जिंदगी को केंद्र में रखकर बनाई गई है। फ़िल्म ने कई गंभीर सवाल खड़े किए, जैसे कि इन बच्चों के लिए स्कूल का मतलब क्या है? बच्चे स्कूल में और उसके बाहर आखिर सीख क्या रहे हैं? इन बच्चों के रोजमर्रा के अनुभवों के जरिए इस फ़िल्म ने दर्शकों को यह सोचने के लिए बाध्य किया कि शिक्षा है क्या और उसे कैसी होनी चाहिए। अनुपमा इस मौके पर फेस्टिवल में मौजूद थीं, उनसे दर्शकों ने शिक्षा पद्धति को लेकर कई सवाल किए
दीपा भाटिया निर्देशित फ़िल्म ‘नीरो’ज गेस्ट’ किसानों की आत्महत्याओं पर केंद्रित थी। दीपा ने सुदूर गांव के गरीब-मेहनतकश किसानों से लेकर बड़े-बड़े सेमिनारों में बोलते देश के मशहूर पत्रकार पी. साईनाथ को अपने कैमरे में उतारा है। पिछले 10 सालों में लगभग 2 लाख किसानों की आत्महत्या के वजहों की शिनाख्त करती यह फिल्म एक जरूरी राजनैतिक हस्तक्षेप की तरह लगी।

पूना फिल्म इंस्टिट्यूट से फ़िल्म संपादन में प्रशिक्षित बेला नेगी की पहली फ़िल्म ‘दाएं या बाएं’ में ग्रामीण संस्कृति पर पड़ते बाजारवाद के प्रभावों को चित्रित किया गया था। पूंजीवादी-बाजारवादी संस्कृति ने जिन प्रलोभनों और जरूरतों को पैदा किया है, उनको बड़े ही मनोरंजक अंदाज में इस फ़िल्म ने निरर्थक साबित किया।

‘दी अदर सांग’ भारतीय शास्त्रीय संगीत और गायिकी की उस परंपरा को बड़ी खूबसूरती से दस्तावेजीकृत करने वाली फ़िल्म थी, जिसको उन ठुमरी गायिकाओं ने समृद्ध बनाया था, जो पेशे से तवायफ थीं। फ़िल्म निर्देशिका सबा दीवान ने तीन साल तक तवायफों की जीवन शैली और उनकी कला पर गहन शोध करके यह फ़िल्म बनाई है। इस फ़िल्म ने दर्शकों को रसूलनबाई समेत कई मशहूर ठुमरी गायिकाओं के जीवन और गायिकी से तो रूबरू करवाया ही, लागत करेजवा में चोट गीत के मूल वर्जन ‘लागत जोबनवा में चोट’ के जरिए शास्त्रीय गायिकी में अभिजात्य और सामान्य के बीच के सौंदर्यबोध और मूल्य संबधी द्वंद्व को भी चिह्नित किया। अभिजात्य हिंदू शास्त्रीय संगीत परंपरा के बरअक्स इन गायिकाओं की परंपरा को जनगायिकी की परंपरा के बतौर देखने के अतिरिक्त इस फिल्म में व्यक्त महिलावादी नजरिया भी इसकी खासियत थी। लोगों ने बेहद मंत्रमुग्ध होकर इस फ़िल्म को देखा।

म्यूजिक वीडियो जिन सामाजिक प्रवृत्तियों और वैचारिक या व्यावसायिक आग्रहों से बनते रहे हैं, तरुण भारतीय और के. मार्क स्वेर द्वारा तैयार किये गए म्यूजिक वीडियो के संकलन ‘हम देखेंगे’ उसको समझने की एक कोशिश थी।

इस मौके पर जसम, बिहार के राज्य सचिव संतोष झा ने कलाकारों और दर्शकों से अपील की, कि वे जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दों, उसकी लोकतांत्रिक आकांक्षा और उसके बेहद जरूरी प्रतिरोधों को दर्ज करें और 10-15 मिनट के लघु फ़िल्म के रूप में निर्मित करके अगस्त, 20111 तक फेस्टिवल के संयोजक के पास भेज दें, जो फ़िल्में चुनी जाएंगी, उनका प्रदर्शन अगले फ़िल्म फेस्टिवल में किया जाएगा। समापन वक्तव्य कवि आलोकधन्वा ने दिया।

फ़िल्म फेस्टिवल में गोरखपुर फ़िल्म सोसाइटी और समकालीन जनमत की ओर से किताबों, कविता पोस्टरों औरफ़िल्मों की डीवीडी का स्टाल भी लगाया गया था। प्रेक्षागृह के बाहर राधिका-अर्जुन द्वारा बनाए गए कविता पोस्टर लगाए गए थे, जो फ़िल्मोत्सव का आकर्षण बने हुए थे। इस अवसर पर शताब्दी वर्ष वाले कवियों की कविताओं पर आधारित सारे छोटे पोस्टर पटना के साहित्य-संस्कृतिप्रेमियों ने खरीद लिए। किताबों और फ़िल्मों की डीवीडी की भी अच्छी मांग देखी गई। पूरे आयोजन का संचालन संतोष झा और संजय जोशी ने किया। उनके साथ विभिन्न फ़िल्मों और निर्देशकों का परिचय डा. भारती एस. कुमार, के.के. पांडेय और सुमन कुमार ने दिया।

-सुधीर सुमन


रविवार, 21 नवंबर 2010

लूट और दमन के खिलाफ सृजन और संघर्ष का अभियान


जसम का बारहवां राष्ट्रीय सम्मेलन


लूट और दमन की संस्कृति के खिलाफ सृजन और संघर्ष को समर्पित जसम का बारहवां राष्ट्रीय सम्मेलन 13-14 नवंबर को दुर्ग (छत्तीसगढ़) में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। सम्मेलन में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, दिल्ली, राजस्थान, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रो। मैनेजर पांडेय और प्रणय कृष्ण को पुनः जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष और महासचिव रूप में चुनाव किया गया। सम्मेलन में 115 सदस्यीय नई राष्ट्रीय परिषद का चुनाव किया गया। कामकाज के विस्तार के लिहाज से महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के प्रतिनिधियों को भी राष्ट्रीय पार्षद बनाया गया। प्रलेस के संस्थापक सज्जाद जहीर की पुत्री प्रसिद्ध कथाकार-पत्रकार और नृत्यांगना नूर जहीर समेत 19 नए नाम राष्ट्रीय परिषद में शामिल किए गए। मंगलेश डबराल, अशोक भौमिक, शोभा सिंह, वीरेन डंगवाल, रामजी राय, मदन कश्यप, रविभूषण, रामनिहाल गुजन, शंभु बादल और सियाराम शर्मा को जसम का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी 35 सदस्यों की है, जिसमें सुधीर सुमन, भाषा सिंह, दीपक सिन्हा, सुरेंद्र सुमन, संतोष झा, अनिल अंशुमन, अजय सिंह, के. के. पांडेय, आशुतोष कुमार, बलराज पांडेय, संजय जोशी, सुभाष कुशवाहा, हिमांशु पंड्या, गोपाल प्रधान, कौशल किशोर, पंकज चतुर्वेदी, कैलाश बनवासी और सोनी तिरिया शामिल हैं।


सृजन और संघर्ष के दो बडे नाम- मुक्तिबोध और शंकर गुहा नियोगी सम्मेलन के केंद्र में थे। सम्मेलन के तमाम सत्रों में मंच पर लगे मुख्य बैनर पर दोनों की तस्वीरें थीं। दुर्ग के शंकर गुहा नियोगी हाल (बाकलीवाल स्मृति भवन) में हिरावल (पटना) के कलाकारों द्वारा मुक्तिबोध की ‘अधेरे में’ कविता के एक उत्प्रेरक अंश ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन/ ओ मेरे सिद्धांतवादी मन/ अब तक क्या किया/ जीवन क्या जीया’ के बेहद प्रभावशाली गायन से सम्मेलन की शुरुआत हुई और समापन हिरावल (भिलाई) द्वारा ‘अधेरे में’ की नाट्य प्रस्तुति से हुई। सम्मेलन ने बिहार के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के नायक का। रामनरेश राम, छात्र नेता राजेश, ‘सही समझ’ के संपादक और कथाकार सोहन शर्मा, रंगकर्मी शिवराम, जनकवि गिर्दा, रंगकर्मी अमिताभ दासगुप्ता और अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता को एक मिनट का मौन रखकर अपनी श्रद्धांजलि दी।


प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल ने ‘सत्ता और संस्कृति’ विषय पर मुक्तिबोध स्मृति व्याख्यान दिया, जो कि सम्मेलन का उद्घाटन वक्तव्य भी था। मंगलेश डबराल ने इराक, अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले और भारतीय शासकवर्ग द्वारा आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, मजदूरों और किसानों के बर्बर दमन का जिक्र करते हुए कहा कि आज सत्ता को अपने किसी भी दुष्कृत्य के लिए कोई ग्लानिबोध नहीं रह गया है। साधारणजन की तकलीफों के प्रति सत्ता बिल्कुल संवेदनहीन हो चुकी है। कश्मीर में जनप्रदर्शनों के हिंसक दमन, अरुंधति राय को जेल भेजने की धमकी, दंतेवाड़ा में आदिवासियों की हत्याओं और विस्थापन, कामन वेल्थ गेम के नाम पर मजदूरो को दिल्ली से भगाए जाने जैसे कई प्रसगों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सत्ता बिल्कुल प्रतिक्रियावादी और फासिस्ट हो चुकी है। एक अनियंत्रित आर्थिक उदारवाद की जो संस्कृति है, भाजपा और कांग्रेस उसके प्रवक्ता और वाहक हैं और उन्हें भारत में पनपे नवधनाढ़य नए मध्यवर्ग का निर्लज्ज साथ मिल रहा है। साधारण जनता के जो बड़े सांस्कृतिक मूल्य है सत्ता उसे खत्म कर देना चाहती है और लूट, बर्बरता के मूल्यों के प्रचार में लगी है, मीडिया उसका एक ताकतवर माध्यम है। मंगलेश डबराल ने कहा कि आज संस्कृतिकर्मियों और साहित्यकारों को ऐसी सत्ताओं से अपने संबंध को पुनर्परिभाषित करना होगा। राज्य, पूंजी, बाजार या उसके उत्पाद और उसकी राजनीति के खिलाफ एक सांस्कृतिक प्रतिरोध संगठित करना होगा।


उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो। मैनेजर पांडेय ने कहा कि जो आतताई, निर्मम, लुटेरी और झूठ की सत्ता है, उसका होना ही मनुष्यता के प्रति अपराध है। उसके विकल्प के प्रति सोचना ही पड़ेगा। आज पूंजीवाद समाजवाद से लड़ने के लिए उसी सामंतवाद और धार्मिक प्रवृत्तियों का सहारा ले रहा है, जिसका कभी उसने विरोध किया था। हमारे पास जनता, समाजवाद और माक्र्सवाद से जुड़े लेखकों और संस्कतिकर्मियों के त्याग, समर्पण और संघर्ष की मिसालें हैं, उनकी स्मृति हमारी ताकत है, हमें उस ताकत के साथ मौजूदा सत्ताओं के खिलाफ खड़ा होना होगा। अन्याय और बुराई के खिलाफ जनता में जो बेचैनी और आक्रोश है, उसे अभिव्यक्ति देनी होगी। उद्धाटन सत्र में प्रलेस के महासचिव कमला प्रसाद, जलेस की केंद्रीय कार्यकारिणी की ओर से मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और चंचल चैहान द्वारा भेजा गया शुभकामना संदेश भी पढ़ा गया। कवि आलोक धन्वा ने भी सम्मेलन के लिए अपना संदेश भेजा था, जिसका पाठ किया गया। सम्मेलन को जलेस के नासिर अहमद सिकंदर और प्रलेस के रवि श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया। मंच पर वीपी केशरी, रविभूषण, राजेंद्र कुमार, रामजी राय, अशोक भौमिक आदि भी मौजूद थे। संचालन अवधेश ने किया।


सम्मेलन को संबोधित करते हुए विशिष्ट अतिथि सुप्रसिद्ध कवि नवारुण भट्टाचार्य ने कहा कि मुक्तिबोध और शंकर गुहा नियोगी को याद करते हुए आज फिर से ‘संघर्ष और निर्माण’ के नारे की याद आती है। जिस तरह से आज का साम्राज्यवाद और उसके देशी दलाल अपने स्वार्थ में आदिवासियों और देश के मेहनतकशों के लिए विनाश और विस्थापन का चक्र चला रहे हैं, उसके खिलाफ फिर उसी नारे के साथ उठ खड़ा होना वक्त की जरूरत है।


दूसरे दिन सांगठनिक सत्र की शुरुआत मसविदा दस्तावेज के पाठ से हुई। दस्तावेज की शुरुआत जनभाषा में अवधेश प्रधान द्वारा रचित एक गीत से हुई, जो अपने आप में जसम के लक्ष्य की ओर भी संकेत करता है। उस गीत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों, कारपोरेट के हित में भारतीय शासकवर्गों द्वारा की जा रही लूट और लूट को जारी रखने के लिए किए जा रहे बर्बर दमन के यथार्थ के साथ उसके खिलाफ एक ताकतवर जनप्रतिरोध का आह्वान है। दस्तावेज ने इसे चिह्नित किया कि अमेरिका अपने देश में बेरोजगारी दूर करने लिए भारतीय बाजार के आखेट में लगा है। ओबामा इसी मकसद से भारत आए थे। विकास के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों, जंगल, पहाड़, जल, जमीन के दोहन, भारी पैमाने पर विस्थापन, पर्यावरण विनाश और जनसंहार की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जाहिर करते इस दस्तावेज में यह कहा गया कि आज पूंजीवादी लोकतंत्र के हर खंभे की निष्पक्षता और स्वायत्तता स्वांग लगने लगी है। न्यायपालिका तक सत्ता की राजनीति और पूंजी के तकाजों से घिरी नजर आ रही है। अयोध्या और यूनियन कार्बाइड मामले में जो फैसला आया है, वह इसी का उदाहरण है। पेड न्यूज, अंधविश्वास, युद्धोन्माद, सांप्रदायिकता के सहयोगी होने और जनांदोलनों के प्रति विरोधी रुख के कारण मीडिया की भूमिका भी जनपक्षधर नहीं रह गई है। अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी कंपनियों-एजेंसियों के साथ सरकार, संसद, सैन्यबल, नौकरशाही, वित्तीय संस्थाओं, एनजीओ और मीडिया के स्वार्थपूर्ण समझौतों तथा शैक्षणिक, बौद्धिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से लेकर ग्राम पंचायतों तक लूट और दमन की संस्कृति के विस्तार पर गहरी फिक्र जाहिर करते सम्मेलन के इस दस्तावेज में जनता के प्रतिरोध की संस्कृति को संगठित करने पर जोर दिया गया। किसानों की आत्महत्या और आनर किलिंग के संदर्भ में जसम की ओर से मजबूत सांस्कृतिक हस्तक्षेप की जरूरत पर भी दस्तावेज में जोर दिया गया।


दस्तावेज पर विचार विमर्श की शुरुआत करते हुए प्रो। मैनेजर पांडेय ने कहा कि आज आशा के जो स्रोत हैं, उन्हें भी याद करने की जरूरत है। अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ क्यूबा, वेनेजुएला जैसे देशों का प्रतिरोध और सेज के खिलाफ भारतीय जनता के प्रतिरोध को उम्मीद की तरह देखना होगा। उन्होंने कहा कि संघर्ष की छोटी सी छोटी कोशिशों को भी दर्ज करना होगा। उन्होंने कहा कि कला-संस्कृति की सारी विधाओं में जनता के जीवन की जो अभिव्यक्ति हो रही है, उसे एक सुचिंतित वैचारिक दिशा देनी होगी। समाजवाद आज और भी प्रासंगिक हो गया है। समाजवादी सपनों की दिशा में संस्कृतिकर्म को गति देनी होगी। उड़ीसा से आए राधाकांत, पश्चिम बंग गण सांस्कृतिक परिषद् के नीतीश, जेवियर कुजूर-झारखंड, राकेश दिवाकर, सुनील चौधरी-आरा, सूर्यनारायण-इलाहाबाद, सुरेश पंजम-लखनऊ, आशुतोष कुमार-दिल्ली, संजय जोशी-गाजियाबाद, शोभा सिंह-लखनऊ, पंकज चतुर्वेदी-कानपुर, कपिल शर्मा-दिल्ली, समता राय-पटना, जय प्रकाश नायर-छत्तीसगढ़, मंगलेश डबराल-दिल्ली और के.के.पांडेय-इलाहाबाद ने सांगठनिक सत्र में चले विचार विमर्श में हिस्सा लिया। सांगठनिक सत्र की अघ्यक्षता रामजी राय, राजेंद्र कुमार, शंभू बादल और रामनिहाल गुंजन ने की।


जसम के इस सम्मेलन में कला-संस्कृति की कई विधाओं और शैलियों की छटाएं देखी गई। कला का हर रंग इस स्वप्न को सामने ला रहा था कि कैसे देश दुनिया में जनपक्षधर व्यवस्थाएं निर्मित हों, किस तरह मानवीय सभ्यता-संस्कृति की प्रगति हो। जो है उससे बेहतर चाहिए, मुक्तिबोध की यह चिंता जैसे सम्मेलन के केंद्र में थी। मुक्तिबोध के चारों पुत्र- रमेश, दिवाकर, गिरीष और दिलीप सम्मेलन में आए, यह सम्मेलन एक सुखद संयोग था।


भारतीय चित्रकला के प्रगतिशील पक्ष से अवगत हुए दर्शक


प्रसिद्ध चित्रकार-कथाकार अशोक भौमिक ने भारतीय चित्रकला का प्रगतिशील पक्ष’ विषय पर काफी जानकारीपूर्ण और सरोकारों के लिहाज से अत्यंत उपयोगी व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय चित्रकला के इतिहास को, उस पर मौजूद राजनैतिक-आर्थिक प्रभावों का जिक्र करते हुए, पेश किया। धर्म, सामंती मूल्यबोध, मुगल और यूरोपीय कला से भारत की चित्रकला किस कदर प्रभावित रही और किस तरह बंगाल के भीषण अकाल और तेभागा आंदोलन के दौर में भारतीय चित्रकला में आम मेहनतकश जन के दुख-सुख और संघर्ष का दस्तावेजीकरण हुआ, इसकी भी उन्होंने चर्चा की। उन्होंने भारतीय चित्रकला को जनोन्मुख बनाने में कम्युनिस्ट पार्टी की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित किया। अशोक भौमिक अपने कविता पोस्टरों के लिए भी चर्चित रहे हैं। जसम सम्मेलन स्थल पर लगाए गए राधिका-अर्जुन द्वारा बनाए गए पोस्टर उसी परंपरा को विकसित करने की एक कोशिश लगे।


कविता पोस्टरों के जरिए याद किए गए मशहूर कवि और शायर


यह वर्ष भारतीय उपमहाद्वीप के मशहूर शायर फैज अहमद फैज,मजाज, हिंदी कवि नागार्जुन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल और अज्ञेय का जन्मशताब्दी वर्ष है। राधिका-अर्जुन ने उनकी कविताओं पर आधारित बडे़ प्रभावशाली पोस्टर बनाए थे। इन कविता पोस्टरों के जरिए इन शायरों और कवियों की विचारधारा, काव्य-संवेदना और उनकी प्रतिबद्धता से दर्शक रूबरू हुए। नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ‘प्रतिबद्ध हूं’ के संकल्प के साथ एक पोस्टर में यह दिशानिर्देश भी नजर आया कि ‘साधारण जनों से/ अलहदा होकर रहो मत/ कलाधर या रचयिता होना नहीं है पर्याप्त/ पक्षधर की भूमिका धारण करो।’ पोस्टरों में उनकी प्रसिद्ध कविता ‘हरिजन गाथा’ के अंश थे तो शासकीय दमन के प्रतिरोध में उतरे मुक्ति सैनिकों की तलाश भी थी। फैज के मशहूर नज्म ‘लाजिम है’ का यकीन एक ओर था तो दूसरी ओर आदमी में मौजूद लोहे की ताकत का बयान करती केदारनाथ अग्रवाल की कविता का अंश तो तीसरी ओर शमशेर की कविता में मौजूद ‘वज्र कठिन कमकर की मुट्ठी में पथ प्रदर्शिका मशाल’। अधिकांश कविता पोस्टरों में साधारण मेहनतकश जनता की इंकलाबी ताकत के प्रति गहन आस्था की अभिव्यक्ति थी। रक्तपायी शासकवर्ग के हित में जनता की बदहाली, शोषण-दमन आदि के सवाल पर चुप रहने वाले साहित्यिक-कविजन, चिंतक, शिल्पकार आदि के प्रति सख्त आलोचना मुक्तिबोध के साथ-साथ सर्वेश्वर, गोरख, मायकोव्स्की, पाब्लो नेरुदा, आलोक धन्वा की कविताओं पर आधारित पोस्टरों में भी थी। गुर्राते हुए भेड़ियों के खिलाफ मशाल जलाने और बेजुबानों की आवाज बनने का आह्वान और संकल्प का इजहार भी थे ये पोस्टर।


सांगठनिक सत्र में मंच की दायीं ओर लगा मशहूर कवि और गायक पाल राबसन की कविता पर आधारित पोस्टर एक तरह से जसम के राष्ट्रीय सम्मेलन के मकसद की अभिव्यक्ति था-
प्रत्येक कलाकार, प्रत्येक वैज्ञानिक
प्रत्येक लेखक को अब यह तय करना
होगा कि वह कहां खड़ा है
सुरक्षित आश्रय के रूप में कोई पृष्ठभाग
नहीं है.....कलाकार को पक्ष चुनना ही होगा।
स्वतंत्रता के लिए संघर्ष, या फिर गुलामी- उसे
किसी एक को चुनना ही होगा....
और कोई विकल्प नहीं है।
लोकार्पण
नवारुण भट्टाचार्य ने जसम सम्मेलन की स्मारिका का लोकार्पण किया। जिसमें जन्मशताब्दी वर्ष वाले रचनाकारों के अतिरिक्त पहल के संपादक ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडेय, रघुवीर सहाय, निराला आदि की रचनाएं हैं। संपादन कैलाश बनवासी ने किया है। इस अवसर पर झारखंड के संस्कृतिकर्मी कालेश्वर गोप के कहानी संग्रह ‘मैं जीती हूं’ का लोकार्पण कैलाश बनवासी ने किया।
चित्र और मूर्ति प्रर्दशनी सम्मेलन में गिलबर्ट जोसेफ, सुनीता वर्मा, डीएस विद्यार्थी, एफ.आर. सिन्हा, बृजेश तिवारी, रश्मि भल्ला, जीके निर्मलकर और प्रांजली के चित्र तथा धनंजय पाल के चित्र प्रदर्शित थे, जो सम्मेलन का महत्वपूर्ण आकर्षण थे।
जनगीत, बाउल, डाक्युमेंटरी और फिल्म का प्रदर्शन
पश्चिम बंग गण परिषद की ओर से आए बाउल गायकों-नर्तकों ने अपनी प्रस्तुति के जरिए अद्भुत समां बांधा। भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन के महानायक का. रामनरेश राम के निधन के तुरत बाद बनाई गई नीतिन की डाक्यूमेंटरी और ईरानी फिल्म ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ भी सम्मेलन में दिखाई गई। शहीद गुरु बालकदास बाल मंच (जामुल/छत्तीसगढ़) और हिरावल (भिलाई) के बालकलाकारों की प्रस्तुति जितनी मनमोहक थी, उतना ही भविष्य की संभावनाओं से लैस थी। सम्मेलन में हिरावल (भिलाई), हिरावल (बिहार), दस्ता(इलाहाबाद) और युवानीति (आरा) के कलाकारों ने जनगीत पेश किए।
कविता पाठ
सम्मेलन के आखिरी सत्र के आरंभ में कविता पाठ हुआ, जिसमें नवारुण भट्टाचार्य ने अपनी बहुचर्चित कविता ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश' का अंश सुनाया। मीता दास ने हिंदी में अनुदित उनकी कविताओं का पाठ किया। मंगलेष डबराल ने टार्च, भूख और भूत, मैं तैयार नहीं हूं, दरवाजे और खिड़कियां जैसी अपनी प्रसिद्ध कविताओं को सुनाया। विनोद कुमार शुक्ल ने भी अपनी तीन कविताओं का पाठ किया, जिसमें हमारे दौर की कई ज्वलंत समस्याओं को लेकर चिंता मौजूद थी। शोभा सिंह ने कश्मीर के हालात पर रची गई दो कविताओं और शमशेर की याद में लिखी गई अपनी कविता का पाठ किया। रमाशंकर विद्रोही ने नूर मियां के सूरमे और मानव सभ्यता में स्त्रियों के उत्पीड़न और दमन के खिलाफ लिखी गई अपनी लंबी कविता का पाठ किया। राजेंद्र कुमार की कविता में शासकों-प्रशासकों की खबर ली गई थी तो शंभू बादल की छोटी कविताएं जनजीवन की छोटी-छोटी उम्मीदें को बटोरने की एक कोशिश थी।
सम्मेलन का समापन हिरावल (बिहार) द्वारा गोरख पांडेय की स्मृति में रचित दिनेष कुमार शुक्ल की कविता ‘जाग मेरे मन मछंदर’ के गायन और हिरावल (भिलाई) द्वारा ‘अंधेरे में’ कविता की नाट्य प्रस्तुति से हुआ।
सम्मेलन में लेनिन पुस्तक केंद्र (लखनऊ), गोरखपुर फिल्म सोसाइटी और समकालीन जनमत की ओर से बुकस्टाल भी लगाए गए थे।
--सुधीर सुमन

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

जलेस प्रलेस और जसम का संयुक्त वक्तव्य

बाबरी मस्जिद स्थल के बारे में लखनऊ बेन्च के फ़ैसले पर
जलेस, प्रलेस और जसम का साझा बयान



रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच का फ़ैसला इस देश के हर इंसाफ़पसंद नागरिक के लिए दुख और चिंता का सबब है। इस फ़ैसले में न सिर्फ तथ्यों, सबूतों और समुचित न्यायिक प्रक्रिया की उपेक्षा हुई है, बल्कि धार्मिक आस्था को अदालती मान्यता देते हुए एक ऐसी नज़ीर पेश की गयी है जो भविष्य के लिए भी बेहद ख़तरनाक है। इस बात का कोई साक्ष्य न होते हुए भी, कि विवादित स्थल को हिंदू आबादी बहुत पहले से भगवान श्रीराम की जन्मभूमि मानती आयी है, फ़ैसले में हिंदुओं की आस्था को एक प्रमुख आधार बनाया गया है। अगर इस आस्था की प्राचीनता के बेबुनियाद दावों को हम स्वीकार कर भी लें, तो इस सवाल से तो नहीं बचा जा सकता कि क्या हमारी न्यायिक प्रक्रिया ऐसी आस्थाओं से संचालित होगी या संवैधानिक उसूलों से? तब फिर उस हिंदू आस्था के साथ क्या सलूक करेंगे जिसका आदिस्रोत ऋग्वेद का ‘पुरुषसूक्त’ है और जिसके अनुसार ऊंच-नीच के संबंध में बंधे अलग-अलग वर्ण ब्रह्मा के अलग-अलग अंगों से निकले हैं और इसीलिए उनकी पारम्परिक ग़ैरबराबरी जायज़ है? अदालत इस मामले में भारतीय संविधान से निर्देशित होगी या आस्थाओं से? तब स्त्री के अधिकारों-कर्तव्यों से संबंधित परम्परागत मान्यताओं के साथ न्यायपालिका क्या सलूक करेगी? हमारी अदालतें सती प्रथा को हिंदू आस्था के साथ जोड़ कर देखेंगी या संविधानप्रदत्त अधिकारों की रोशनी में उस पर फ़ैसला देंगी? कहने की ज़रूरत नहीं कि आस्था को विवादित स्थल संबंधी अपने फ़ैसले का निर्णायक आधार बना कर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ‘मनुस्मृति’ और ‘पुरुषसूक्त’ समेत हिंदू आस्था के सभी स्रोतों को एक तरह की वैधता प्रदान की है, जिनके खि़लाफ़ संघर्ष आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना के निर्माण का एक अनिवार्य अंग रहा है और हमारे देश का संविधान उसी आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना की मूर्त अभिव्यक्ति है। इसलिए आस्था को ज़मीन की मिल्कियत तय करने का एक आधार बनाना संवैधानिक उसूलों के एकदम खि़लाफ़ है और इसमें आने वाले समय के लिए ख़तरनाक संदेश निहित हैं। ‘न्यायालय ने भी आस्था का अनुमोदन किया है’, ऐसा कहने वाले आर एस एस जैसे फासीवादी सांप्रदायिक संगठन की दूरदर्शी प्रसन्नता समझी जा सकती है!


यह भी दुखद और चिंताजनक है कि विशेष खंडपीठ ने ए।एस.आई. की अत्यंत विवादास्पद रिपोर्ट के आधार पर मस्जिद से पहले हिंदू धर्मस्थल होने की बात को दो तिहाई बहुमत से मान्यता दी है। इस रिपोर्ट में बाबरी मस्जिद वाली जगह पर ‘स्तंभ आधारों’ के होने का दावा किया गया है, जिसे कई पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों ने सिरे से ख़ारिज किया है। यही नहीं, ए.एस.आई. की ही एक अन्य खुदाई रिपोर्ट में उस जगह पर सुर्खी और चूने के इस्तेमाल तथा जानवरों की हड्डियों जैसे पुरावशेषों के मिलने की बात कही गयी है, जो न सिर्फ दीर्घकालीन मुस्लिम उपस्थिति का प्रमाण है, बल्कि इस बात का भी प्रमाण है कि वहां कभी किसी मंदिर का अस्तित्व नहीं था। निस्संदेह, ए.एस.आई. के ही प्रतिसाक्ष्यों की ओर से आंखें मूंद कर और एक ऐसी रिपोर्ट परं पूरा यकीन कर जिसे उस अनुशासन के चोटी के विद्वान झूठ का पुलिंदा बताते हैं, इस फ़ैसले में अपेक्षित पारदर्शिता एवं तटस्थता का परिचय नहीं दिया गया है।


हिंदू आस्था और विवादास्पद पुरातात्विक सर्वेक्षण के हवाले से यह फ़ैसला प्रकारांतर से उन दो कार्रवाइयों को वैधता भी प्रदान करता है जिनकी दो-टूक शब्दों में निंदा की जानी चाहिए थी। ये दो कार्रवाइयां हैं, 1949 में ताला तोड़ कर षड्यंत्रपूर्वक रामलला की मूर्ति का गुंबद के नीचे स्थापित किया जाना तथा 1992 में बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना। आश्चर्य नहीं कि 1992 में साम्प्रदायिक ताक़तों ने जिस तरह कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाईं और 500 साल पुरानी एक ऐतिहासिक इमारत को न सिर्फ धूल में मिला दिया, बल्कि इस देश के आम भोलेभाले नागरिकों को दंगे की आग में भी झोंक दिया, उसके ऊपर यह फ़ैसला मौन है। इस फ़ैसले का निहितार्थ यह है कि 1949 में जिस जगह पर जबरन रामलला की मूर्ति को प्रतिष्ठित किया गया, वह जायज़ तौर पर रामलला की ही ज़मीन थी और है, और 1992 में हिंदू सांप्रदायिक ताकतों द्वारा संगठित एक उन्मादी भीड़ ने जिस मस्जिद को धूल में मिला दिया, उसका ढहाया जाना उस स्थल के न्यायसंगत बंटवारे के लिए ज़रूरी था! हमारे समाज के आधुनिक विकास के लिए अंधविश्वास और रूढि़वादिता बड़े रोड़े हैं जिनका उन्मूलन करने के बजाय हमारी न्यायपालिका उन्हीं अंधविश्वासों और रूढि़वादिता को बढ़ावा दे तो इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है!


लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक सोच में यक़ीन करने वाले हम लेखक-संस्कृतिकर्मी, विशेष खंडपीठ के इस फ़ैसले को भारत के संवैधानिक मूल्यों पर एक आघात मानते हैं। हम मानते हैं कि अल्पसंख्यकों के भीतर कमतरी और असुरक्षा की भावना को बढ़ाने वाले तथा साम्प्रदायिक ताक़तों का मनोबल ऊंचा करने वाले ऐसे फ़ैसले को, अदालत के सम्मान के नाम पर बहस के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। इसे व्यापक एवं सार्वजनिक बहस का विषय बनाना आज जनवाद तथा धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए सबसे ज़रूरी क़दम है।


हस्ताक्षरकर्ता
मुरलीमनोहरप्रसाद सिंह, महासचिव, जनवादी लेखक संघ
कमला प्रसाद, महासचिव, प्रगतिशील लेखक संघ
मैनेजर पाण्डेय, अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच
चंचल चौहान, महासचिव, जनवादी लेखक संघ
आली जावेद, उप महासचिव, प्रगतिशील लेखक संघ
प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच

बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव 2010


गिरीश तिवाड़ी गिर्दा की याद को समर्पित

सत्ता संस्कृति के विरुद्ध प्रतिरोध के सिनेमा का अभियान

कौशल किशोर

आज जनजीवन और सामाजिक संघर्षों से जुड़ी ऐसी फीचर फिल्मों और वृतचित्रों का निर्माण हो रहा है जहाँ समाज की कठोर सच्चाइयाँ हैं, जनता का दुख-दर्द, हर्ष-विषाद और उसका संघर्ष व सपने हैं। ऐसी ही फिल्में प्रतिरोध के सिनेमा के सिलसिले को आगे बढ़ाती हैं और सिनेमा में प्रतिपक्ष का निर्माण करती हैं। जन संस्कृति मंच द्वारा ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ की थीम पर 8 से 10 अक्तूबर 2010 को वाल्मीकि रंगशाला (उ0 प्र0 संगीत नाटक , गोमती नगर में आयोजित तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव इसी तरह की फिल्मों पर केन्द्रित था। सुपरिचित कलाकार और जनगायक गिरीश तिवाड़ी गिर्दा की याद को समर्पित इस समारोह में एक दर्जन से अधिक हिन्दी और इससे इतर अन्य भाषाओं की फिल्मों के माध्यम से आम जन की पीड़ा व त्रासदी के साथ ही उनका संघर्ष और प्रतिरोध देखने को मिला। इस आयोजन की खासियत यह भी थी कि फिल्मों के प्रदर्शन के साथ ही चित्रकला, गायन और सिनेमा व संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर भी यहाँ चर्चा हुई।

समारोह का उदघाटन करते हुए हिन्दी के युवा आलोचक और जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ंने कहा कि जन संस्कृति मंच द्वारा लखनऊ, गोरखपुर, बरेली, पटना, नैनीताल सहित देश के विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए जाने वाला फिल्म उत्सव एक तरह का घूमता आइना है जो देश, समाज और दुनिया के ऐसे लोगों और इलाकों की तस्वीर दिखाता है जिनको मास मीडिया जानबूझ कर नहीं दिखाता या अपने तरीके से दिखाता है। दरअसल देश उनका हो गया है जिनका संसाधानों व सम्पत्ति पर कब्जा है और जिन्होंने देश के बहुसंख्यक आबादी को हाशिए पर डाल दिया है। सम्पत्ति और सत्ता पर कब्जा करने वाले लोग कलाओं, अभिव्यक्तियों और रचनाशीलता को भी अपने तरह से प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। ये लोग गरीबों की चेतना के पिछड़ेपन को भी बनाए रखना चाहते हैं। इसके खिलाफ खड़ा होना सिर्फ राजनीति का ही नहीं संस्कृति का भी काम हैं। शिल्प, चित्रकला, सिनेमा सहित कला की सभी विधाओं के जरिए शोषण, दमन से पीड़ित लेकिन संघर्षशील जनता की अभिव्यक्ति करना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता कर रहे जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अजय कुमार ने कहा कि कला का अर्थ है आदमी को बेहतर बनना है। इस काम में सिनेमा एक सशक्त माध्यम है। हमें फूहड़ सिनेमा के जरिए जनता के टेस्ट खराब करने तथा इसके द्वारा अपसंस्कृति व क्रूरताओं को फैलाने की जो कोशिश हो रही है, उसके खिलाफ मजबूती से खड़ा होना होगा। उद्घाटन सत्र में मशहूर चित्रकार एवं लेखक अशोक भौमिक ने फिल्म उत्सव की स्मारिका ‘प्रतिरोध का सिनेमा, सिनेमा का प्रतिपक्ष’ का लोकार्पण किया। उद्घाटन सत्र का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया।

फिल्म उत्सव की शुरुआत प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक के ‘जीवन और कला: संदर्भ तेभागा आन्दोलन और सोमनाथ होड़’ पर विजुअल व्याख्यान से हुई। उन्होंने कहा कि सोमनाथ होड़ का कलाकर्म कलाकारों को जनआन्दोलनों से जोड़ने के लिए प्रेरित करता है। 1946 में भारत की अविभाजित कम्युनिष्ट पार्टी ने 23 वर्ष के युवा कला छात्र सोमनाथ होड़ को तेभागा आन्दोलन को दर्ज करने का काम साैंपा था। सोमनाथ ने किसानों के उस जबर्दस्त राजनीतिक उभार और उनकी राजनीतिक चेतना को अपने चित्रों और रेखांकनों में अभिव्यक्ति दी थी, साथ ही साथ अपने अनुभवों को भी डायरी में दर्ज किया। उनकी डायरी और रेखा चित्र एक जनपक्षधर कलाकार द्वारा दर्ज किया गया किसान आन्दोलन का अद्भुत दस्तावेज है। श्री भौमिक ने सोमनाथ होड़ के चित्रांे और रेखांकनों के पहले भारतीय चित्रकला की यात्रा का विवेचन प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस दौर में आम आदमी और किसान चित्रकला से अनुपस्थित है। उसकी जगह नारी शरीर, देवी-देवता और राजा-महराजा हैं। उन्होंने अपने व्याख्यान का अंत यह कहते हुए किया कि जनपक्षधर होना ही आधुनिक होना है।


फिल्म समारोह में तुर्की व ईरान की फिल्मों से लेकर बिहार व नैनीताल के गांव पर बनी फिल्में दिखाई गई। गौतम घोष की ‘पार’, यिल्माज गुने की ‘सुरू’ ;तुर्कीद्ध, बेला नेगी की दाँये या बाँये’ तथा बेहमन गोबादी की ‘टर्टल्स कैन फलाई’ ;ईरानीद्ध दिखाई गई। करीब पचीस साल पहले बनी गौतम घोष की ‘पार’ काफी चर्चित फीचर फिल्म रही है। यह बिहार के दलितों के उत्पीड़न, शोषण व विस्थापन के साथ ही उनके संघर्ष और जिजीविषा को सामने लाती है। इस फिल्म का परिचय नाटककार राजेश कुमार ने दिया।

यिल्माज गुने की फिल्म सुरू दो कबीलों के बीच पिसती एक औरत की कहानी है। उसका पति अपने पिता से विद्रोह कर शहर में इलाज कराना चाहता है। एक संयोग के तहत उनका पूरा कुनबा अपनी भेड़ों को बेचने के लिए तुर्की की राजधानी अंकारा की या़त्रा करता है। इस यात्रा में वे बार-बार ठगे व लूटे जाते हैं। घर के विद्रोही बेटे केा अंकारा में अपनी बीवी के बेहतर इलाज की पूरी उम्मीद है। इस यात्रा में उनकी भेड़ें और पूरा परिवार ठगा जाता है और वे राजधानी की भीड़ में कहीं खो जाते हैं। यिल्माज गुने की फिल्मों पर बोलते हुए कवि और फिल्म समीक्षक अजय कुमार ने कहा कि बांग्ला कवि सुकान्त कहा करते थे कि मैं कवि से पहले कम्युनिस्ट हूँ, यह बात यिल्माज गुने पर लागू होती है। वे ऐसे फिल्मकार हैं जिन्हें सत्ता का दमन खूब झेलना पड़ा। जेल जाना पड़ा। देश से निर्वासित होना पड़ा। जेल में रहते हुए उन्होंने फिल्में बनाईं और उनका निर्देशन किया। उन्होंने मजदूर वर्ग की हिरावल भूमिका को पहचाना और अपनी जीवन दृष्टि को एक क्रंातिकारी जीवन दृष्टि में रूपान्तरित किया।

बेला नेगी की फिल्म ‘दांये या बांये’ एक ऐसे नौजवान दीपक की कहानी है जो पहाड़ के अपने छोटे से कस्बे से जाकर शहर में गुजारा करता है। शहर में अपनी प्रतिभा का कोई इस्तेमाल न पाकर गांव लौट आता है। शहर से आया होने के कारण सभी की नजरों में वह एक विशेष व्यक्ति बन जाता है लेकिन वह शहर वापस जाने के बजाय गांव में स्कूल खोलकर बच्चों को पढ़ाने का निर्णय लेता है जिस पर गांव के लोग उसे आदर्शवादी कहकर हंसते हैं। यह फिल्म जीवन की गाढ़ी जटिलता और दुविधाओं को सामने लाती है। यह बाजारवाद की चमक से दूर जीवन के यथार्थ से रु ब रु कराती है। यह फिल्म अभी रिलिज नहीं हुई है। इस तरह लखनऊ फिल्म समारोह में इसका प्रदर्शन प्रिमियर शो की तरह था।

फिल्म समारोह में इरानी फिल्म ‘टर्टल्स कैन फलाई’ दिखाई गई। इस फिल्म पर बोलते हुए अजय कुमार ने कहा कि ईरान में दुनिया की सबसे अच्छी फिल्में बन रही हैं। इन्हे न सिर्फ विश्व स्तर पर सराहना मिल रही है बल्कि अन्य देश के फिल्मकार इससे प्रेरणा भी ले रहे हैं। वहाँ 40 के दशक में वैकल्पिक फिल्में बनने लगी थीं। इस दौरान करीब डेढ़ दर्जन से अधिक महिला फिल्मकारों ने भी फिल्में बनाईं और वे सराही गईं। अजय कुमार ने ‘टर्टल्स कैन फलाई’ के संदर्भ में कहा कि यह न केवल दिल को दहला देने वाली फिल्म है बल्कि यह अन्दर तक झकझोर देती है। युद्ध की विभीषिका पर यूँ तो कई फिल्में बनी हैं लेकिन इस फिल्म के द्वारा युद्ध विरोधी जो संदेश मिलता है, वह अनूठा है।

कबीर परियोजना के तहत फिल्मकार शबनम विरमानी ने अपने दल के साथ मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पाकिस्तान और अमेरिका की यात्रा की। इस अवधि में ऐसे कई लोक गायकों, सूफी परंपरा से जुड़े गायकों से मिलने और उनको सुनने, कबीर के अध्ययन से जुड़े देशी-विदेशी विद्वानों और विभिन्न कबीर पंथियों से मिलकर उनके विचारों को जानने-समझने का प्रयत्न किया। छह वर्ष लंबी अपनी इस यात्रा में शबनम विरमानी ने चार वृत्तचित्र बनाए जिसमें से ‘हद-अनहद’ इस श्रृंखला की पहली कड़ी है। लखनऊ फिल्म उत्सव में इसे दिखाया गया। इस फिल्म का परिचय देते हुए कवि भगवान स्वरूप कटयार ने कहा कि इसके माध्यम से कबीर के राम को खोजने का प्रयास किया गया है, जो अयोध्या के राजा राम से भिन्न है। कबीर का राम अब भी लोक चेतना में बसा हुआ है। वह केवल किताबों तक सीमित नहीं है।

डाक्यूमेन्ट्री फिल्मों में बच्चों की दुनिया से लेकर ंकाश्मीर, उड़ीसा के जख्म दिखाती फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। राजेश एस जाला की ‘चिल्डेन आफ पायर’ बच्चों की उस दुनिया से रूबरू कराती है जिसे हम देखना नहीं चाहते लेकिन यह सच दुनिया के किसी न किसी हिस्से में घटित हो रहा है। संजय काक की डाक्यूमेंटरी फिल्म जश्न-ए-आजादी ने काश्मीर का सच प्रस्तुत किया, वहीं देबरंजन सारंगी की फिल्म फ्राम हिन्दू टू हिन्दुत्व उड़ीसा के कंधमाल में साम्प्रदायिक हिंसा के पीछे मल्टीनेशनल और साम्प्रदायिक शक्तियों के गठजोड़ को सामने लाने का काम किया। अतुल पेठे द्वारा बनाई फिल्म ‘कचरा व्यूह’ का भी प्रदर्शन हुआ जो सरकार और प्रशासन के सफाई कामगारों के प्रति दोरंगे व्यवहार का पर्दाफाश करती है।

फिल्मकार संजय जोशी ने पांच डाक्यूमेन्टरी फिल्मों के अंश दिखाते हुए ‘प्रतिपक्ष की भूमिका में सिनेमा’ पर एक प्रस्तुति दी। उन्होंने आनन्द पटवर्धन की फिल्म बम्बई हमारा शहर, अजय भारद्वाज की एक मिनट का मौन, बीजू टोप्पो व मेघनाथ की विकास बन्दूक की नाल से, हाउबम पबन कुमार की एएफएसपीए 1958 और संजय काक की बंत सिंह सिंग्स के अंश दिखाते हुए कहा कि डाक्यूमेन्टरी फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों के जरिए सही तौर पर प्रतिपक्ष की भूमिका निर्मित की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1975 के बाद आनन्द पटवर्धन की क्रांति की तरंगे से डाक्यूमेन्टरी फिल्मों में प्रतिपक्ष का एक नया अध्याय शुरू हुआ था जिसमें फिल्मस डिवीजन के एकरेखीय सरकारी सच के अलावा जमीनी सच सामने आते हैं। कई फिल्मकारों ने अपनी प्रतिबद्धता, विजन के साथ तकनीक का उपयोग करते हुए कैमरे को जन आन्दोलनों की तरफ घुमाया है और सच को सामने लाने का काम किया है।

फिल्म समारोह में संवाद सत्र के दौरान ‘वृतचित्र: प्रतिरोध के कई रंग’ विषय पर बोलते हुए लेखक व पत्रकार अजय सिंह ने कहा कि डाक्यूमेन्टरी फिल्में राजनीतिक बयान होती हैं। यह राजनीति मुखर भी हो सकती है और छुपी हुई भी। जाहिर है कला के माध्यम से राजनीति फिल्म में प्रतिबिम्बित होती है। जब हम प्रतिरोध की सिनेमा की बात करते हैं तो उसका मतलब यह होता है कि हम मौजूदा ढंाचे के बरक्स कोई विकल्प भी पेश करना चाहते हैं। प्रतिरोध के पहले असहमति और विरोध का भी महत्व होता है और काफी पहले की बनी हुई डाक्यूमेंटरी फिल्में भी विरोध और असहमति के स्वर को आवाज देती रही हैं। उदाहरण के लिए 1970 के दशक में भारत सरकार के फिल्म्स डिवीजन के तहत बनी अशोक ललवानी की फिल्म ‘वे मुझे चमार कहते हैं’, एस सुखदेव की ‘पलामू के आदमखोर’, मीरा दीवान की ‘प्रेम का तोहफा’ जैसी फिल्मों को लिया जा सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि रेडिकल दृष्टिकोण या वामपंथी नजरिए से डाक्यूमेंटरी फिल्में बनाई जाए।

लखनऊ फिल्म समारोह में फिल्मों का एक सत्र बच्चो के लिए भी था। इसमें अल्बर्ट लेमूरिस्सी की फ्रेंच फिल्म ‘रेड बैलून’ तथा फीचर फिल्म ‘छुटकन की महाभारत’ दिखाई गई। बच्चो ने इन फिल्मों के माध्यम से खेल कूद से इतर दुनिया पर्दे पर देखी जहाँ इस दुनिया में संवेदना भी है और कई जटिल सवाल भी। उन्हें महाभारत में द्रोपदी का चीरहरण गलत लगता है वहीं युद्ध बड़े लोग लड़ते हैं और उसकी कीमत बच्चों को भुगतनी पड़ती है। आखिर क्यों ? इस सत्र का संचालन के के वत्स ने किया।

फिल्म उत्सव में फिल्मों के अलावा मालविका का गायन भी हुआ। पुस्तक व कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी, डाक्यूमेन्टरी फिल्मों का स्टाल, पोस्टर और इस्टालेशन दर्शकों के आकर्षण के केन्द्र रहे। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के स्टाल पर दो दर्जन से अधिक डाक्यूमेंटरी फिल्मों के डीवीडी उपलब्ध थे। लेनिन पुस्तक केन्द्र और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के पुस्तकों के स्टाल में भी लोगों ने रूचि दिखाई। कला संग्राम द्वारा हाल के बाहर ‘भेड़चाल’ के नाम से प्रस्तुत इस्टालेशन को लोगों ने खूब सराहा। बड़ी संख्या में छात्र, नौजवानों, महिलाओं व कर्मचारियों के साथ रवीन्द्र वर्मा, ‘उदभावना’ के सम्पादक अजेय कुमार, ‘निष्कर्ष’ के सम्पादक गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव, वीरेन्द्र यादव, शकील सिद्दीकी, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, धर्मेन्द्र, वीरेन्द्र सारंग, चन्द्रेश्वर, नसीम साकेती, रमेश दीक्षित, आतमजीत सिंह, प्रतुल जोशी, वन्दना मिश्र, सतीश चित्रवंशी, मनोज सिंह, अशोक चौघरी आदि लेखकों व कलाकारों की उपस्थिति और सिनेमा के साथ ही कला के विविध रूपों के प्रदर्शन ने जसम के इस फिल्म उत्सव को सांस्कृतिक मेले का रूप दिया।


एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ -226017
मो - 09807519227

सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव 2010

गिरीश तिवाड़ी गिर्दा की याद को
लखनऊ फिल्म उत्सव
प्रतिरोध के सिनेमा और संवाद का तीन दिनों का आयोजन

लखनऊ, 11 अक्तूबर। जन संस्कृति मंच (जसम) ने तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव वाल्मीकि रंगशाला (उ0 प्र0 संगीत नाटक अकादमी), गोमती नगर में आयोजित किया। इस फिल्म उत्सव की मुख्य थीम थी ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जो सुपरिचित कलाकार और जनगायक गिरीश तिवाड़ी गिर्दा की याद को समर्पित था। तीन दिनो तक चलने वाले इस समारोह में लखनऊ के सिनेमा प्रेमी दर्शकों को करीब एक दर्जन से अधिक हिन्दी और इससे इतर अन्य भाषाओं की फिल्मों के माध्यम से आम जन की पीड़ा व त्रासदी के साथ ही उनका संघर्ष और प्रतिरोध देखने को मिला।

समारोह का उदघाटन हिन्दी के युवा आलोचक एवं जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि जन संस्कृति मंच द्वारा लखनऊ, गोरखपुर, बरेली, पटना, नैनीताल सहित देश के विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए जाने वाला फिल्म उत्सव एक तरह का घूमता आइना है जो देश, समाज और दुनिया के ऐसे लोगों और इलाको की तस्वीर दिखाता है। दरअसल देश उनका हो गया है जिनका संसाधानों व सम्पत्ति पर कब्जा है और जिन्होंने देश के बहुसंख्यक आबादी को हाशिए पर डाल दिया है। सम्पत्ति और सत्ता पर कब्जा करने वाले लोग कलाओं, अभिव्यक्तियों और रचनाशीलता को भी अपने तरह से प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। ये लोग गरीबों की चेतना के पिछड़ेपन को भी बनाए रखना चाहते हैं। इसके खिलाफ खड़ा होना सिर्फ राजनीति का ही नहीं संस्कृति का भी काम हैं। शिल्प, चित्रकला, सिनेमा सहित कला की सभी विधाओं के जरिए शोषण, दमन से पीड़ित लेकिन संघर्षशील जनता की अभिव्यक्ति करना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता कर रहे जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अजय कुमार ने कहा कि कला का अर्थ है आदमी को बेहतर बनना। इस काम में सिनेमा एक सशक्त माध्यम है। हमें फूहड़ सिनेमा के जरिए जनता के टेस्ट खराब करने की साजिश के खिलाफ मजबूती से खड़ा होना होगा। उद्घाटन सत्र में मशहूर चित्रकार एवं लेखक अशोक भौमिक ने फिल्म उत्सव की स्मारिका प्रतिरोध का सिनेमा, सिनेमा का प्रतिपक्ष का लोकार्पण किया। उद्घाटन सत्र का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया।

फिल्म समारोह में दर्शकों ने तुर्की व ईरान की फिल्मों से लेकर बिहार व नैनीताल के एक गांव पर बनी फिल्में देखी। गौतम घोष की ‘पार’, यिल्माज गुने की ‘सुरू’ ;तुर्कीद्ध, बेला नेगी की दाँये या बाँये’ तथा बेहमन गोबादी की ‘टर्टल्स कैन फलाई’ दिखाई गई। करीब पचीस साल पहले बनी गौतम घोष की ‘पार’ काफी चर्चित फीचर फिल्म रही है। यह बिहार के दलितों के उत्पीड़न, शोषण व विस्थापन के साथ ही उनके संघर्ष और जिजीविषा को सामने लाती है। यिल्माज गुने की फिल्म सुरू दो कबीलों के बीच पिसती एक औरत की कहानी है। उसका पति अपने पिता से विद्रोह कर शहर में इलाज कराना चाहता है। एक संयोग के तहत उनका पूरा कुनबा अपनी भेड़ों को बेचने के लिए तुर्की की राजधानी अंकारा की या़त्रा करता है। इस यात्रा में वे बार-बार ठगे जाते हैं। घर के विद्रोही बेटे केा अंकारा में अपनी बीबी के बेहतर इलाज की पूरी उम्मीद है। इस यात्रा में उनकी भेड़ें और पूरा परिवार ठगा जाता है और वे राजधानी की भीड़ में कहीं खो जाते हैं। यिल्माज गुने की फिल्मों पर बोलते हुए कवि और फिल्म समीक्षक अजय कुमार ने कहा कि इल्माज गुने ऐसे फिल्मकार हैं जिन्हें सत्ता का दमन खूब झेलना पड़ा। उन्होंने मजदूर वर्ग की हिरावल भूमिका को पहचाना और अपनी जीवन दृष्टि को एक क्रंातिकारी जीवन दृष्टि में रूपान्तरित किया।

बेला नेगी की फिल्म ‘दांये या बांये’ एक ऐसे नौजवान दीपक की कहानी है जो पहाड़ के अपने छोटे से कस्बे से जाकर शहर में गुजारा करता है। शहर में अपनी प्रतिभा का कोई इस्तेमाल न पाकर गांव लौट आता है। शहर से आया होने के कारण सभी के नजरों में वह एक विशेष व्यक्ति बन जाता है लेकिन वह शहर वापस जाने के बजाय गांव में स्कूल खोलकर बच्चों को पढ़ाने का निर्णय लेता है जिस पर गांव के लोग उसे आदर्शवादी कहकर हंसते हैं। यह फिल्म जीवन की गाढ़ी जटिलता और दुविधाओं को सामने लाती है। यह फिल्म अथी तक रिलिज नहीं हुई है। इस तरह लखनऊ फिल्म समारोह में इसका प्रदर्शन इसका प्रिमियर शो था।

कबीर परियोजना के तहत फिल्मकार शबनम विरमानी ने अपने दल के साथ मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान,पाकिस्तान और अमेरिका की यात्रा की। इस अवधि में ऐसे कई लोक गायकों, सूफी परंपरा से जुड़े गायकों से मिलने और उनको सुनने, कबीर के अध्ययन से जुड़े देशी-विदेशी विद्वानों और विभिन्न कबीर पंथियों से मिलकर उनके विचारों को जानने-समझने का प्रयत्न किया। छह वर्ष लंबी अपनी इस यात्रा में शबनम विरमानी ने चार वृत्तचित्र बनाए जिसमें से हद-अनहद इस श्रृंखला की पहली कड़ी है। लखनऊ में इसे दिखया गया। इस फिल्म के माध्यम से कबीर के राम को खोजने का प्रयास किया गया है, जो अयोध्या के राजा राम से भिन्न है। डाक्यूमेन्ट्री फिल्मों में बच्चों की दुनिया से लेकर ंकाश्मीर, उड़ीसा के जख्म दिखती फिल्मों का प्रदशन हुआ। राजेश एस जाला की चिल्डेन आफ पायर बच्चों की उस दुनिया से रूबरू कराती है जिसे हम देखना नहीं चाहते लेकिन यह सच दुनिया के किसी न किसी हिस्से में घटित हो रहा है। संजय काक की डाक्यूमेंटरी फिल्म जश्न-ए-आजादी ने काश्मीर का सच प्रस्तुत किया, वहीं देबरंजन सारंगी की फिल्म फ्राम हिन्दू टू हिन्दुत्व उड़ीसा के कंधमाल में साम्प्रदायिक हिंसा के पीछे मल्टीनेशनल और साम्प्रदायिक शक्तियों के गठजोड़ को सामने लाने का काम किया। अतुल पेठे द्वारा बनाई फिल्म ‘कचरा व्यूह’ का भी प्रदर्शन हुआ जो सरकार और प्रशासन के सफाई कामगारों के प्रति दोरंगे व्यवहार का भी पर्दाफाश करती है।

फिल्मकार संजय जोशी ने पांच डाक्यूमेन्टरी फिल्मों के अंश दिखाते हुए ‘प्रतिपक्ष की भूमिका में सिनेमा’ पर एक प्रस्तुति दी। उन्होंने आनन्द पटवर्धन की फिल्म बम्बई हमारा शहर, अजय भारद्वाज की एक मिनट का मौन, बीजू टोप्पो व मेघनाथ की विकास बन्दूक की नाल से, हाउबम पबन कुमार की एएफएसपीए 1958 और संजय काक की बंत सिंह सिंग्स के अंश दिखाते हुए कहा कि डाक्यूमेन्टरी फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों के जरिए सही तौर पर प्रतिपक्ष की भूमिका निर्मित की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1975 के बाद आनन्द पटवर्धन की क्रांति की तरंगे से डाक्यूमेन्टरी फिल्मों में प्रतिपक्ष का एक नया अध्याय शुरू हुआ था जिसमें फिल्मस डिवीजन के एकरेखीय सरकारी सच के अलावा जमीनी सच सामने आते हैं। कई फिल्मकारों ने अपनी प्रतिबद्धता, विजन के साथ तकनीक का उपयोग करते हुए कैमरे को जनआन्दोलनों की तरफ घुमाया है और सच को सामने लाने का काम किया है।

फिल्म समारोह में संवाद सत्र के दौरान वृतचित्र: प्रतिरोध के कई रंग विषय पर बोलते हुए लेखक व पत्रकार अजय सिंह ने कहा कि डाक्यूमेन्टरी फिल्में राजनीतिक बयान होती हैं। यह राजनीति मुखर भी हो सकती है और छुपी हुई भी। जाहिर है कला के माध्यम से राजनीति फिल्म में प्रतिविम्बित होती है। जब हम प्रतिरोध की सिनेमा की बात करते हैं तो उसका मतलब यह होता है कि हम मौजूदा ढंाचे के बरक्स कोई विकल्प भी पेश करना चाहते हैं। प्रतिरोध के पहले असहमति और विरोध का भी महत्व होता है और काफी पहले की बनी हुई डाक्यूमेंटरी फिल्में भी विरोध और असहमति के स्वर को आवाज देती रही हैं। उदाहरण के लिए 1970 के दशक में भारत सरकार के फिल्म्स डिवीजन के तहत बनी अशोक ललवानी की फिल्म वे मुझे चमार कहते हैं, एस सुखदेव की पलामू के आदमखोर, मीरा दीवान की प्रेम का तोहफा जैसी फिल्मों को लिया जा सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि रेडिकल दृष्टिकोण या वामपंथी नजरिए से डाक्यूमेंटरी फिल्में बनाई जाए। संवाद सत्र में अपने विचार रखने वालों में अनिल सिन्हा, राजेश कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, के के वत्स, मनोज सिंह आदि प्रमुख थे।

फिल्मों के साथ ही इस समारोह में प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने ‘जीवन और कला: संदर्भ तेभागा आन्दोलन और सोमनाथ होड़’ पर विजुअल व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि सोमनाथ होड़ का कलाकर्म कलाकारों को जनआन्दोलनों से जोड़ने के लिए प्रेरित करता है। 1946 में भारत के अविभाजित कम्युनिष्ट पार्टी ने 23 वर्ष के युवा कला छात्र सोमनाथ होड़ को तेभागा आन्दोलन को दर्ज करने का काम सौपा था। सोमनाथ ने किसानों के उस जबर्दस्त राजनीतिक उभार और उनकी राजनीतिक चेतना को अपने चित्रों और रेखांकनों में अभिव्यक्ति दी ही साथ ही साथ अपने अनुभवों को भी डायरी में दर्ज किया। उनकी डायरी और रेखा चित्र एक जनपक्षधर कलाकार द्वारा दर्ज किया गया किसान आन्दोलन का अद्भुत दस्तावेज है। श्री भौमिक ने सोमनाथ होड़ के चित्रांे और रेखांकनों के पहले भारतीय चित्रकला की यात्रा का विवेचन प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस दौर में आम आदमी और किसान चित्रकला से अनुपस्थित है। उसकी जगह नारी शरीर, देवी-देवता और राजा-महराजा हैं। उन्होंने अपने व्याख्यान का अंत यह कहते हुए कहा कि जनपक्षधर होना ही आधुनिक होना है।

फिल्म उत्सव में फिल्मों की स्क्रीनिंग के अलावा मालविका का गायन भी हुआ। पुस्तक व कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी, डाक्यूमेन्टरी फिल्मों का स्टाल, पोस्टर और इस्टालेशन दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र रहे। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के स्टाल पर दो दर्जन से अधिक डाक्यूमेंटरी फिल्मों के डीवीडी उपलब्ध थे जिसके बारे में दर्शकों ने जानकारी ली और उसे खरीदा। लेनिन पुस्तक केन्द्र और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के पुस्तकों के स्टाल में भी लोगों ने रूचि दिखाई। कला संग्राम द्वारा हाल के बाहर भेड़चाल के नाम से प्रस्तुत इस्टालेशन को लोगों ने खूब सराहा। बड़ी संख्या में दर्शको की भागीदारी और सिनेमा के साथ ही कला के विविध रूपों के प्रदर्शन ने जसम के इस फिल्म उत्सव को सांस्कृतिक मेले का रूप दिया।
कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ


शनिवार, 18 सितंबर 2010

तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव 2010


प्रतिरोध का सिनेमा


8, 9 व 10 अक्तूबर 2010
वाल्मीकि रंगशाला ;उ0 प्र0 संगीत नाटक अकादमीद्ध, गोमती नगर, लखनऊ

मित्रों,

कला माध्यमों से यह उम्मीद की जाती है कि वे हमारे समाज और जीवन की सच्चाइयों को अभिव्यक्त करें। सिनेमा आधुनिक कला का सबसे सशक्त और लोकप्रिय कला माध्यम है। लेकिन इस कला माध्यम पर बाजारवाद की शक्तियाँ हावी हैं। मुम्बइया व्यवसायिक सिनेमा द्वारा जिस संस्कृति का प्रदर्शन हो रहा है, वह जनचेतना को विकृत करने वाला है। सेक्स, हिंसा, मारधाड़ इन फिल्मों की मुख्य थीम है। यहाँ भारतीय समाज की कठोर सच्चाइयाँ, जनता का दुख-दर्द, हर्ष-विषाद और उसका संघर्ष व सपने गायब हैं।

आज दर्शक विकल्प चाहता है। वह ऐसी फिल्में देखना चाहता है जो न सिर्फ उसका मनोरंजन करें बल्कि उसे गंभीर, संवेदनशील, जागरुक व जुझारू बनाये। दर्शकों की इसी इच्छा.आकांक्षा ने प्रतिरोध के सिनेमा या जन सिनेमा आन्दोलन को जन्म दिया है। जन सिनेमा के सिलसिले को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हमने लखनऊ में 2008 से फिल्म समारोह के आयोजन द्वारा एक छोटी-सी शुरूआत की हैै जिसकी अगली कड़ी के रूप में तीसरा लखनऊ फिल्म उत्सव 2010 का आयोजन किया जा रहा है। जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित यह उत्सव 8, 9 व 10 अक्तूबर 2010 को वाल्मीकि रंगशाला, उŸार प्रदेश संगीत नाटक अकादमी, गोमती नगर, लखनऊ में होगा। तीन दिनों तक चलने वाले इस फिल्म उत्सव में करीब एक दर्जन से अधिक देशी, विदेशी वृतचित्रों और फीचर फिल्मों का प्रदर्शन होगा।

आप हमारी ताकत हैं। आपके सक्रिय सहयोग की हमें जरूरत है। आप अपने परिवार व दोस्तों के साथ आयें, फिल्में देखें और इस आयोजन को सफल बनानें में अपना हर संभव सहयोग प्रदान करें, हमारी आपसे अपील है।

निवेदक

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ
कार्यालय: एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ - 226017
मो - 09807519227, 09415220306, 09415568836, 09415114685

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

गिरीश तिवारी गिर्दा समृति


गिर्दा के निधन से जनता ने अपना कलाकार खो दिया है - जसम


सुपरिचित गायक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी गिरीश तिवारी गिर्दा के निधन पर जन संस्कृति मंच ने गहरा शोक प्रकट किया है और कहा है कि उनके निधन से जनता ने अपना गायक और कलाकार खो दिया है। गिर्दा ऐसे संस्कृतिकर्मी हैं जिनका कला संसार जन आंदोलनों के बीच निर्मित होता है।

गिरीश तिवार गिर्दा का निधन कल 22 अगस्त को हुआ। उनके निधन पर जन संस्कृति मंच (जसम) लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि 80 के दशके में उŸाराखंड में जो लोकप्रिय आन्दोलन चला, गिर्दा उसके अभिन्न अंग थे। इसी दौर में जन सांस्कृतिक आंदोलन को भी संगठित करनें के प्रयास तेज हुए जिसकी परिणति नैनीताल में ‘युवमंच’ तथा हिन्दी।उर्दू प्रदेशों में जन संस्कृति मंच के गठन में हुई। गिर्दा इस प्रयास के साथी रहे हैं।


जसम की कार्यकारिणी के सदस्य, लेखक व पत्रकार अजय सिंह ने गिर्दा को याद करते हुए कहा कि गिर्दा का क्रान्तिकारी वामपंथी राजनीतिक व सांस्कृतिक आंदोलन से गहरा जुड़ाव था और वे इंडियन पीपुल्य फ्रंट (आई पी एफ) और जन संस्कृति मंच से जुड़े थे। उनका असमय जाना बड़ी क्षति है।


नाटककार राजेश कुमार ने शोक संवोदना प्रकट करते हुए कहा कि गिर्दा ने थियेटर को विचार को संप्रेषित करने का माध्यम बनाया। उनके गीतों, नाटकों व रंगकर्म में हमें बदलाव के विचारों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता देखने को मिलती है। यह प्रतिबद्धता जनता और उसके आंदोलन से गहरे जुड़ाव से ही संभव है।


जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व कवयित्री शोभा सिंह ने कहा कि गिर्दा की कला व रचनाएँ जन आंदोलनों से प्रेरित है और उसी से ऊर्जा ग्रहण करती है तथा अपने रचना कर्म के द्वारा गिर्दा जन आंदोलन को आवेग प्रदान करते हैं। यह एक बड़ी और दुलर्भ बात है जो हमें गिर्दा में मिलती है। यह गिर्दा की खासियत है।


कवि भगवान स्वरूप कटियार, कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा, अलग दुनिया के के0 के0 वत्स, श्याम अंकुरम, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, वीरेन्द्र सारंग आदि जन जन संस्कृति मंच से जुड़े लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने भी गिरीश तिवार गिर्दा के निघन पर शोक प्रकट किया है।

गिरीश तिवाड़ी ‘गिरदा’ की कविता


सियासी उलट बाँसी


पानी बिच मीन पियासी

खेतो में भूख उदासी

यह उलट बाँसियाँ नहीं कबीरा, खालिस चाल सियासी

पानी बिच मीन पियासी


लोहे का सर पाँव काठ के

बीस बरस में हुए साठ के

मेरे ग्राम निवासी कबीरा, झोपड़पट्टी वासी

पानी बिच मीन पियासी

सोया बच्चा गाये लोरी

पहरेदार करे है चोरी

जुर्म करे है न्याय निवारण, नयाय चढ़े है फाँसी

पानी बिच मीन पियासी


बंगले में जंगला लग जाये

जंगल में बंगला लग जाय

वन बिल ऐसा लागू होगा, मरे भले वनवासी

पानी बिच मीन पियासी

जो कमाय सो रहे फकीरा

बैठे - ठाले भरें जखीरा

भेद यही गहरा है कबीरा, दीखे बात जरा सी

पानी बिच मीन पियासी


(यह कविता लखनऊ से प्रकाशित ‘जन संस्कृति’ के अंक-6, अप्रैल-जून 1985 में प्रकाशित हुई थी। वहीं से ली गई है।)