रविवार, 21 मार्च 2010

कवि सईद लखनऊ में : कविता पाठ और संवाद




दूर से आती एक प्रवासी की
आवाज
अनिल सिन्हा


फिनलैंड निवासी हिन्दी के कवि, चित्रकार, फोटोग्राफर व अनुवादक सईद इन दिनों हिन्दुस्तान की यात्रा पर हैं। वे 16 मार्च को लखनऊ आये और उसी दिन जन संस्कृति मंच की ओर से उनकी कविता पाठ और उनके साथ बातचीत का कार्यक्रम राज्य सूचना केन्द्र में रखा गया। भवाली उत्तराखंड में जन्में सईद विज्ञान के स्नातक और विज्ञानी बनने की आकांक्षा के साथ साथ वह काफी दिनों दिल्ली में स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता व सोवियत सूचना विभाग में अनुवादक का काम करते रहे। कविताएँ लिखने व पेंटिंग का काम वे शुरू से करते रहे। ऐसी उत्पीड़नकारी स्थितियाँ पैदा हुई जिनकी वजह से उन्हें देश छोड़ना पड़ा। वे 1972 में फिनलैंड गये और वहीं बस गये। वहीं की नागरिकता भी ले ली। तब से कई दशक गुजर गये। लेकिन लखनऊ की गोष्ठी में देश से जाने के कारण के बारे में पूछे जाने पर वे इतने व्यथित हो उठे कि उन दिनों जो कुछ उनके साथ इस देश में घटा, उसे मात्र याद कर उनकी आँखें भर आईं। सईद अकेले नहीं हैं। तसलीमा नसरीन, मकबूल फिदा हुसैन जैसे अनगिनत लोग हैं जिन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

सईद की कविताओं में इस दुख-विषाद की अभिव्यिक्ति मिलती है। यहाँ प्राकृतिक और अन्तरिक्ष के सौन्दर्य हैं, मांसलता है, अदभुत संवेदना, प्रतीक, बिम्ब और कल्पनाशीलता है साथ ही बेहतर मानवोचित समाज बनाने की जन आकांक्षा व संघर्ष के प्रति प्रतिबद्धता। इसीलिए वे लिखते हैं - ‘तपते मरूस्थल/अंकुरित हो रहे हैं/स्वप्न, हरित/खिलेंगे पुष्प/रक्ताभ/खंडित हो जायेंगी/शिलाएँ।’

बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी चित्रकला से लेकर आधुनिक चित्रकला को लेकर तथा फिनलैंड में कला व साहित्य पर बातचीत की। सईद ने वहाँ के साहित्य, संस्कृति व थियेटर आदि की गतिविधियों पर चर्चा की और बताया कि किस तरह फिनलैंड की सरकार के पास एक सुस्पष्ट सांस्कृतिक नीति है। वह अपने साहित्य के प्रचार.प्रसार के लिए बड़ी राशि खर्च करती है। इसी के तहत सईद ने प्रसिद्ध फिनिश उपन्यासकार मिका वाल्तरी के उपन्यास ‘सिनुहे मिश्रवासी’ का हिन्दी में अनुवाद किया है जिसे राजकमल प्रकाशन छाप रहा है। इसके लिए फिनिश सरकार राजकमल प्रकाशन को लाखो रुपये देगी।

फिनलैंड के समाज की चर्चा करते हुए सईद का कहना था कि वहाँ समाज में महिलाओं को बराबरी की स्थिति हासिल है और अविवाहित मातृत्व को भी मान्यता है। फिनलैंड में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। यहाँ दक्षिणपंथी, वामपंथी व मध्यमार्गी दल हैं। इन दिनों वहाँ की चिन्ताजनक हालत यह है कि नवनाजीवाद और नस्लवाद उभर रहा है। मंदी का यहाँ भी असर है। अमेरीका के बढ़ते सांस्कृतिक व राजनीतिक वर्चस्व को यहाँ के नागरिक पसन्द नहीं करते हैं।

इस मौके पर सईद ने अपनी कई कविताएँ सुनाई। सईद का कहना था कि जब मैं इन कविताओं को प्रकाशित कराऊँगा, इसका शीर्षक होगा - ‘दूर से आती एक प्रवासी की आवाज’। सईद की कविताओं पर हुई चर्चा में अजय सिंह, विनय श्रीकर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, भगवान स्वरूप कटियार, चन्द्रेश्वर, वीरेन्द्र सारंग, नसीम साकेती, ऋतु सिन्हा, शोभा सिंह, हरिओम, श्याम अंकुरम, राजेश कुमार, कल्पना पाण्डेय, ताहिरा हसन, के के वत्स, विमल किशोर, अवन्तिका राय, कौशल किशोर आदि ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन किया अनिल सिन्हा ने।



सईद की पाँच कविताएँ

एक
तपते मरूस्थल मेंअंकुरित
हो रहे हैंस्वप्न,हरित।
खिलेंगे पुष्परक्ताभ।
खण्डित हो जायेंगीशिलाएँ।
शेष रह जाएंगेदीवारों
परआदिम भिŸाी चित्रमात्र।
दो इतिहासों के
बीचअनकही गाथाएँ।
करेंगे जिनका
मूल्यांकनअभी
अजन्मे शिशु।
अनवरत प्रवाह
मेंबहते क्षणतब
ठिठक जायेंगे पल
भर के लिए
और नक्षत्रो से
टपकेंगेंअश्रु।
समुद्र में तैर रहे होंगेद्वीप असंख्य।

दो

खण्ड खण्ड
ख्ण्डित होता
आकाशगिरता है
धरती पर।
दीवारों परटिकी हुई
स्मृतियाँ।
या फिरमृत लोगों
केधुँधलाते दस्तखत।
बारिश की बूँदों
मेंबुना हुआ
इंद्रधनुष।
हवा में तैरते हुए
चेहर,ेपरिचय,नाम।
शेष है साँसों में
अभी गर्माहट।
कूँची से उभरते रंग,बनते दृश्य।
झिझकते चेहरों
मेंझलकता,
अटकता इतिहास।

तीन

रेत में धँसे
हुएपदचिन्ह।
अर्सा गुजर गयाइधर
सेकारवाँ को गुजरे हुए।
तटों पर टूटती
हुईसमुद्र की तरंगे,
ध्वनित
होताक्या कुछ।
इतिहास रूकता
हैठिठकता
हैपलभर
देखता हैडालता है
फिर गुजर जाता
हैबढ़ जाता है आगे।
इस बीच
कितने षडयंत्र रचे
गयेकितने
रक्तपातघटित हुए।

चार

रात्रि मेंडूब
जाता हैसमग्र
अस्तित्व,
फिर दुबारा
उभरने के लिएदूर
कहीं,सुदूर
वीराने द्वीपों पर।
शरद मेंउठता है
तूफानी बवण्डर।
शिशिरदेता
हैठण्डी
दस्तकेंबन्द दरवाजों पर।
जब संध्या ढँक
लेती हैछायाओं
कोतब शुरू होता
हैसपनों काएक नया सिलसिला।
एक पूरा दिवसगुजर
जाता है,टिक जाता
हैक्षितिज पर,
क्षितिज के सहारे।

पाँच

क्षितिज से क्षितिज
तकफैला
हुआएक सूर्य,
एक पूरा दिवस।
नक्षत्रों के नेत्रबंद हो जाते हैं
बादलों में
गढ़े हुएचेहरे
चहलकदमी करते
हैंबंद कमरे के अकेलेपन में।
हिम पिघलता
हैधीमे बहुत ही
धीमे-धीमेवसंत
उठाता
हैअपना सरधरती से।
आकाश सेटपकता
हैधीमा धीमा संगीत।
शिराओं मेंदौड़ते हैं मौसम।

6 टिप्‍पणियां:

सुशीला पुरी ने कहा…

बारिश की बूँदों

मेंबुना हुआ

इंद्रधनुष।

हवा में तैरते हुए

चेहर,ेपरिचय,नाम।

मुझे एकबार पुनः अफ़सोस हो रहा है उस दिन न पहुँच पाने का ,कितने शर्म की बात है की विसंगतियाँ इतनी मारक हो जायें की किसी को देश ही छोडना पड़े !!!! अब इन सांस्कृतिक दुश्मनों से निबटने का मार्ग तो खोजना ही होगा की फिर कोई 'सईद' या 'फ़िदा हुसैन''तस्लीमा'देश छोडने को विवश न हों .

sanjay joshi ने कहा…

aapki logon kee sakriyata se rashk ho raha hai. meri mubarakbaad kubool karain.
sanjay joshi

BS ने कहा…

फिनलैंड के कवि सईद की कवितायेँ मार्मिक हैं .कवितायेँ दिल दिमाग को छूती हैं .

BS Katiyar ने कहा…

फिनलैंड के कवि सईद की कवितायेँ मार्मिक हैं .कवितायेँ दिल दिमाग को छूती हैं .

BS Katiyar ने कहा…

फिनलैंड के कवि सईद की कवितायेँ मार्मिक हैं .कवितायेँ दिल दिमाग को छूती हैं .

BS Katiyar ने कहा…

फिनलैंड के कवि सईद की कवितायेँ मार्मिक हैं .कवितायेँ दिल दिमाग को छूती हैं .