गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

वीरेंद्र सारंग और उनकी कवितायेँ




वीरेन्द्र सारंग (जन्म : 12 जनवरी 1959) हिन्दी के ऐसे रचनाकार हैं जो कविता, कहानी, उपन्यास, समीक्षा आदि कई विधाओं में लगातार सक्रिय हैं। 1993 में उनका पहला कविता संग्रह ‘कोण से कटे हुए ’ प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह में सारंग की करीब 38 कविताएँ संकलित हैं। अपने पहले संग्रह की कविताओं के द्वारा सारंग का जो काव्य व्यक्त्वि हमारे सामने आया, उनके दूसरे संग्रह ‘हवाओं ! लौट जाओ’ (2004) तक पहुँचते-पहुँचते उसमें विचार व कला के स्तर पर परिपक्वता का दर्शन होता है। वीरेन्द्र सारंग का यह संग्रह उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मानित भी हुआ। अच्छी बात यह है कि वीरेन्द्र सारंग रचना व विचार की दुनिया में तो सक्रिय हैं ही, सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में उनकी बढ़ती सकियता ने उनके रचना व अनुभव संसार का विस्तार किया है। यह उनके चर्चित उपन्यास ‘वज्रांगी’ और हाल की रचनाओं में देखने को मिलता है। अपनी रचनाओं के द्वारा सारंग ऐसे संसार का निर्माण करते हैं जो हमें मानवीय और संवेदनशील बनाता है।


वीरेन्द्र सारंग की कविताओं में उनके अनुभव की दुनिया है। हमारा जीवन छोटी-छोटी चीजों के बीच पलता है, बढ़ता है। प्रतीत होता है कि ये चीजें बहुत महत्व लिए नहीं है लेकिन सारंग इन्हें अपनी कविता का विषय बनाते हैं, इन छोटी-छोटी चीजों के महत्व को उदघाटित करते चलते हैं। ‘छन्ना’ ऐसी ही कविता है। यह छन्ना नया अर्थ देता है। इसकी यात्रा पेट से शुरू होती है, दिमाग से गुजरती है और आगे बढ़ती है। छोटी-छोटी चीजों या उपेक्षितों से बनी यह दुनिया ही वीरेन्द्र सारंग की दुनिया है, इनका सौन्दर्य ही कविता का सौन्दर्य है।


वीरेन्द्र सारंग की कविताएँ इस अर्थ में आज की कविता में अपनी अलग पहचान बनाती हैं कि ये कस्बाई और हमारे लोक जीवन के रस-रंग, मुहावरे, लोक संस्कृति के तत्व अपने में लिए हुए हैं। परम्परा के प्रति मोह है लेकिन ये परम्परावादी नहीं हैं। यहां रिश्ते हैं, लेकिन ये निरपेक्ष नहीं हैं। शोषण व गैरबराबरी पर टिके इस समाज में ये निरपेक्ष हो भी नहीं सकते हैं। ‘मैं बनूँ पुष्कल’ की उन्मुक्त चाह घुटती रहती है। इसीलिए सारंग स्वतंत्रता के गीत गाते हैं। ‘कथा, जैझट बक दूँगी/मैं तो चिड़िया हूँ/मैंने जो देखी कथा , जैसी की वैसी !’ इसीलिए वीरेन्द्र सारंग के बारे में यह कहना ज्यादा सही लगता है कि ये स्वतंत्रता के गायक हैं। लोक संस्कृति इनकी ताकत है।

कैसा रिश्ता कैसा मन


ये कैसा रिश्ता
कैसा मन
उनके जैसा मेरा तन
उनकी अम्मा गाँव की अम्मा
मेरी माँ धोबन !

उनके द्वारे आम, पपीता
घर, गऊ गोबर से लीपा
मेरे द्वारे ताड़, खजूर
अगल बगल -बेर, बबूल
ताड़ी पीयें, नंगे नाचें,
उल्टी कर दें ..........
फिर तो - रे डोमवा !
रे मेहतरवा !
साफ कर दे
यह आदेश, सम्बोधन

उनके बच्चे हगते
मेरे घर के पिछवाडे़
मेरे बच्चे दूर किनारे
मुखिया जी को लाज न आई
वहीं बैठे जहाँ भौजी, माई
खुराफात नाधे रहते
क्हते - गऊ कसम हम गोसाईं
तरह-तरह के लोभ लीपे चाटे
तरह-तरह उदबोधन

मुर्दा पशु का चमड़ा छीला
देखा, उसमें मेरी कविता
देखा, धरती पीली आकाश नीला
अक्षर फुदकते मांस-मांस में
आँख-आँख में सरिता
वाक्य बनाते हड्डी.हड्डी
कुत्ते भौंके, गिद्ध मँडराये, कौए डटे
जो डरे किनारे खड़े लिए यौवन।
हम आड़े तिरछे घर को भागे
गोड़ में चफन गया टट्टी-गोबर
‘काकू रास्ते में बचना तुझको आया नहीं
--- बेटी बोली, उठा लाई भीगा एक पन्ना
मेरी रचना, धूप दिखाई और सुखाई
खोज-खोज पढ़ने लगी, यह सुन्दर उत्पल
मैं बनूँ पुष्कल......
दादी ने डाँटा --- अरे भाग अन्दर
उत्पल की बच्ची देख !
दरवाजे अनजान मुछन्दर
कई बरस से ताक में है
कब आये जोबन
ये कैसा रिश्ता, कैसा मन।


गाती हुई चिड़िया

होने लगी बात कैसी- कैसी
खुले आम !
गा रही वह चिड़िया
इसकी ऐसी की तैसी!

ससुरी!
कविता सुनायेगी इस सदी कों
मेरे रहते...........
क्या वही सुघर- सालोनीभाएगी
मन को मारे रहते........ इतनी ढीठ!
राजा के किस्से कहेगी
इस बड़े हिस्से में रहेगीअरे
गुहाठारी!!
तुमने कैसे जाना
मंत्री ने जहर दिया था
रानी ने तो दूध पिया था
यह उगलेगी- ‘मेरे गाल पर काला मस्सा है‘
अरे पकड़ो इसको !
मारो कैची दे कैची!

मुझको क्या डर,
मै तो चिड़िया हूँ
बहुत करोगे पक्रोगे
नोचोगे पर
हुई फुर्र तो ...........
घर के अन्दर भी भागूंगी
धुप लगेगी तो बैठूँगी छाँवसुस्ताऊँगी................
अभी अभी बैठी थी--
सोफे, दरी बिस्तर पर
दर्पण देख खूब चोंच मारी,
लड़ी थीऔर उस दिन ठंड लगी तो,
सच मैं ऐठी थी

मैं घर बाहर की सब ले आयी,
कविता भाषा...........
भात पतीली....................
ठूँठ पेड़ की गाथा
झट बक दूँगी
मै तो चिड़ियामैने जो देखी कथा, जैसी की वैसी!

छन्ना

छन्ने!
तुम बहुत सुन्दर हो
शुध्ध साफ तुम्हारी औकात है
छान - वान कर परस देते होव्यर्थ
तो तुम्हीं फेंकते होअरे भाई!!

जब कभी,बेल का शरबत
लार - बीज समेत मिलता है
जब कोई रेशा,
दाँत में फँस,
फँसा लेता है दिमाग
जब चाय की पत्ती,
जीभ पर फैल .............
बिगाड़ती है अन्तिम स्वाद
तब तुम्हारा ख्याल आता है, छन्न्ेा!

छन्ने !
तुम कितने सरल हो
नहीं उलझे तुम किसी वाद- विवाद में
कभी उबले नहीं, युद्व - आतंक में
न राम- रहीम से वास्ता
तुम नहीं जानते प्रश्न और सम्बन्ध
तुम छानते छन्ने!
बस छानते रहते हो!!

तब बेकार खाद- खुज्झा
स्ूाख- सड़,
उर्वर मिट्टी बन जाताऔर
उसमें पड़ा मेरा एक सिक्का........
धो- धाकर काम चलाने लायक
मै हींग ले आता हूँ
मुस्करा उठता मेरा फूला पेट!

छन्न्े!
मैं तुझे इस्तेमाल करूंगा
पेट के बाद दिमाग पर.........
तब कहीं ओैर!

3 टिप्‍पणियां:

Suman ने कहा…

nice

सुशीला पुरी ने कहा…

छन्ने !
तुम कितने सरल हो
नहीं उलझे तुम किसी वाद- विवाद में
कभी उबले नहीं, युद्व - आतंक में
न राम- रहीम से वास्ता
तुम नहीं जानते प्रश्न और सम्बन्ध
तुम छानते छन्ने!
बस छानते रहते हो!!

बहुत -बहुत बधाई ...वीरेन्द्र सारंग जी को ,उनकी कलम यूँ ही अनवरत चले यही कामना करती हूँ .
कौशल जी ! अक्षर बीच -बीच में छुट गए हैं .

usha rai ने कहा…

क्या ही सौभाग्य है की आपकी कविताएँ पढने को मिली और सुनने को भी !आप लोक जीवन के अद्भुत चितेरे हैं ! आप के भीतर गाँव धडकता है ! तमाम क्रियाएं साकार दिखाई देती हैं ! इनसे होता हुआ जो व्यंग्य उभरता है .....वह आपकी कविता का सौरभ है !यहाँ प्रस्तुत कविताएँ नागार्जुन और त्रिलोचन के परम्परा की कविताएँ है ! बहुत बहुत बधाई !