रविवार, 23 जनवरी 2011

शमशेर की कवि‍ता में प्राइवेट-पब्‍लि‍क के बीच अंतराल नहीं : डंगवाल

नई दि‍ल्‍ली: शमशेर अपनी काव्य प्रेरणाओं को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जोड़ते हैं। उनकी कविता में प्राइवेट-पब्लिक के बीच कोई अंतराल नहीं है। उनसे हमें भौतिक दुनिया की सुंदर सच्चाइयों से वाबस्ता रहने की सीख मिली। 21 जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित दो दिवसीय शमशेर जन्मशती समारोह में ‘शमशेर और मेरा कविकर्म’ नामक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए चर्चित कवि वीरेन डंगवाल ने यह बात कही। इस संगोष्ठी से पूर्व शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और फैज की रचनाओं पर आधारित चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा बनाए गए पोस्टरों और जनकवि रमाशंकर विद्रोही की पुस्तक ‘नई खेती’ का लोकार्पण प्रसिद्ध आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय ने किया। डॉ. पांडेय ने कहा कि कविता को जनता तक पहुंचाने का काम जरूरी है। विद्रोही भी अपनी कविता को जनता तक पहुंचाते हैं। किसान आत्महत्याओं के इस दौर में ऐसे कवि और उनकी कविता का संग्रह आना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि चित्रकला के जरिए कविता को विस्तार दिया जा सकता है। इस मौके पर कवि कुबेर दत्त द्वारा संपादित शमशेर पर केंद्रित फिल्म का प्रदर्शन किया गया, जिसमें उनके समकालीन कई कवियों ने उनकी कविता के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे।

कवि अनामिका ने कहा कि शमशेर की कविताएं स्त्रियों के मन को छुने वाली हैं। वे बेहद अंतरंग और आत्मीय हैं। वे सरहदों को नहीं मानतीं। कवि मदन कश्यप ने उन्हें प्रेम और सौंदर्य का कवि बताते हुए कहा कि वह सामंती-धार्मिक मूल्यों से बनी नैतिकता को कविता में तोड़ते हैं, पर उसे सीधे चुनौती देने से बचना चाहते हैं। इसलिए उनकी प्रेम कविताओं में अमूर्तन है। त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि शमशेर संवेदनात्मक ज्ञान के कवि हैं। अपने ज्ञान और विचार को संवेदना को कैसे संवेदना के जरिए समेटा जाता है, हमारी पीढ़ी ने उनसे यही सीखा है। शोभा सिंह का कहना था कि शमशेर बेहद उदार और जनपक्षधर थे। स्वप्न और यथार्थ की उनकी कविताओं में गहरा मेल दिखाई पड़ता है। मार्क्सवाद के प्रति उनकी पक्षधरता थी और स्त्री की स्वतंत्र बनाने पर उनका जोर था। उनके प्रभाव से उनका कविता, मार्क्सवाद और जन-आंदोलन से जुड़ाव हुआ। इब्बार रब्बी ने शमशेर की रचनाओं और जीवन में निजत्व के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी काव्य पंक्तियां मुहावरे की तरह बन गई हैं। नीलाभ ने कहा कि शमेशर का व्यक्ति जिस तरह से जीवन को देखता है, उनकी कविता उसी का लेखाजोखा है। उनकी कविता में 1947 से पहले आंदोलन से उपजा आशावाद भी है और उसके बाद के मोहभंग से उपजी निराशाएं भी हैं। इसके साथ ही पार्टी और व्यक्ति का द्वंद्व भी। गिरधर राठी ने कहा कि भाषा और शब्दों का जैसा इस्तेमाल शमशेर ने किया, वह बाद के कवियों के लिए एक चुनौती-सी रही है। वे सामान्य सी रचनाओं में नयापन ढूंढ लेने वाले आलोचक भी थे। ऐसा वही हो सकता है जो बेहद लोकतांत्रिक हो। मंगलेश डबराल ने कहा कि शमशेर मानते थे कि कविता वैज्ञानिक तथ्यों का निषेध नहीं करती। उनकी कविता आधुनिकवादियों और प्रगतिवादियों- दोनों के लिए एक चुनौती की तरह रही है। कथ्य और रूप के द्वंद्व को सुलझाने के क्रम में हर कवि को शमशेर की कविता से गुजरना होगा। यद्यपि नागार्जुन के बाद उनकी कविता के सर्वाधिक पोस्टर बने, लेकिन वे जनसंघर्षों के नहीं, बल्कि संघर्षों के बाद की मुक्ति के आनंद के कवि हैं। संगोष्ठी का संचालन युवा कवि अच्युतानंद मिश्र ने किया।

दूसरे सत्र में काव्यपाठ की शुरुआत शमशेर द्वारा पढ़ी गई उनकी कविताओं के वीडियो के प्रदर्शन से हुई। काव्यपाठ की अध्यक्षता इब्बार रब्बी और गिरधर राठी ने की तथा संचालन आशुतोष कुमार ने किया। शोभा सिंह, कुबेर दत्त, दिनेश कुमार शुक्ल, लीलाधर मंडलोई, अनामिका, रमाशंकर यादव विद्रोही, राम कुमार कृषक, मदन कश्यप, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, पंकज चतुर्वेदी आदि ने अपनी कविताएं सुनाईं, जिनमें कई कविताएं शमशेर पर केंद्रित थीं।

समारोह के दूसरे दि‍न 22 जनवरी को आयोजि‍त कार्यक्रम कर अध्‍यक्षता करते हुए चर्चित मार्क्सवादी आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि‍ शमशेर की कविताएं विद्वानों के लेखों या शब्दकोशो के जरिए कम समझ में आती हैं, जीवन-जगत के व्यापक बोध से उनकी कविताएं समझ में आ सकती हैं। प्रगतिशील और गैरप्रगतिशील आलोचना में यह फर्क है कि‍ प्रगतिशील आलोचना रचना को समझने में मदद करती है, लेकिन गैरप्रगतिशील आलोचना रचना के प्रति समझ को और उलझाती है।

साहित्यालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि कठिन प्रकार में बंधी सत्य सरलता बिना किसी भीतर से जुड़ी़ विचारधारा के बिना संभव नहीं है। शमशेर का गद्य जीवन से जुड़ा गद्य है। वे जनसामान्य के मनोभाव की अभिव्यक्ति के लिए गद्य को प्रभावशाली मानते थे। गद्य ही सीमाएं को तोड़ता हैं। इसे मुक्ति का माध्यम समझना चाहिए। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि एक पल शमशेर की कविता में बहुत आता है, लेकिन यह असीम से जुड़ा हुआ पल है। काल के प्रति शमशेर का जो रुख है, वह बेहद विचारणीय है।

इलाहाबाद से आए आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि शमशेर ऐसे कवि थे जो अभावों से अपनी भावमयता को संपन्न करते रहे। तमाम किस्म की प्रतिकूलताओं से उनकी होड़ रही। वह हकीकत को कल्पना के भीतर से बाहर लाने की तमन्ना वाले कवि है। कवि-आलोचक सुरेश सलिल ने शमशेर, मुक्तिबोध, केदार और नागार्जुन जैसे कवियों को आपस में अलगाए जाने की कोशिशों का विरोध करते हुए इस पर जोर दिया कि इन सारे कवियों की सांस्कृतिक-वैचारिक सपनों की परंपरा को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है।

युवा कथाकार अल्पना मिश्र ने कहा कि शमशेर का गद्य पूरे जनजीवन के यथार्थ को कविता में लाने के लिए बेचैन एक कवि का वैचारिक गद्य है। यह गद्य जबर्दस्त पठनीय है। कला का संघर्ष और समाज का संघर्ष अलग नहीं है, इस ओर वह बार-बार संकेत करते हैं। युवा कथाकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि शमशेर केवल कवियों के कवि नहीं थे। नूर जहीर ने शमशेर से जुड़ी यादों को साझा करते हुए कहा कि हिंदी-उर्दू की एकता के वह जबर्दस्त पक्षधर थे। उर्दू के मिजाज को समझने पर उनका जोर था। गोबिंद प्रसाद ने शमशेर की रूमानीयत का पक्ष लेते हुए कहा कि उनके समस्त रोमान के केंद्र में मनुष्य का दर्द मौजूद है।

युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि शमशेर और अज्ञेय की काल संबंधी दृष्टियों में फर्क है। शमशेर एक क्षण के भीतर के प्रवाह को देखने की कोशिश करते हैं। उनकी कविता एक युवा की कविता है, जो हर तरह की कंडिशनिंग को रिजेक्ट करती है। कवि-पत्रकार अजय सिंह ने शमशेर संबंधी विभिन्न आलोचना दृष्टियों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शमशेर को गैरवामपंथी वैचारिक प्रवृत्तियों से जोड़कर देखे जाने का विरोध किया। हालिया प्रकाशित दूधनाथ सिंह द्वारा संपादित संस्मरणों की किताब के फ्लैप पर अज्ञेय की टिप्पणी को उन्होंने इसी तरह की प्रवृत्ति का उदाहरण बताया। उन्होंने शमशेर की कुछ कम चर्चित कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि उनमें आत्मालोचना, द्वंद्व और मोह भी है।

आयोजन में कला आलोचक रमण सिन्हा ने चित्रकला के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ शमशेर की चित्रकला पर व्याख्यान-प्रदर्शन किया। यह व्याख्यान उनके चित्रों और कविताओं को समझने के लिहाज से काफी जानकारीपूर्ण था। कला आलोचक अनिल सिन्हा ने कहा कि विडंबना यह है कि उत्तर भारत में विभिन्न विधाओं का वैसा अंतर्मिलन कम मिलता है, जैसा शमशेर के यहां मिलता है। शमशेर का गद्य भी महत्वपूर्ण है जो उनके चित्र और कविता को समझने में मदद करता है और उसी तरह चित्रकला उनकी कविता को समझने में मददगार है।

सुप्रसिद्ध चित्रकार-साहित्यकार अशोक भौमिक ने चित्रकला के जनसांस्कृतिक परंपरा की ओर ध्यान देने का आग्रह किया और कहा कि बाजार ने जिन चित्रकारों से हमारा परिचय कराया वही श्रेष्ठता की कसौटी नहीं हैं। इसका उदाहरण शमशेर की चित्रकला है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया।


1 टिप्पणी:

सुशीला पुरी ने कहा…

सुंदर पोस्ट !