
एक बेचैन आवाज
भगवान स्वरूप कटियार
जहां मेरा इंतजार हो रहा है
वहां मैं पहुंच नहीं पा रहा हूं
दोस्तों की फैली हुई बाहें
और बढे हुए हांथ मेरा इंतजार कर रहे हैं .
पर मेरी उम्र का पल पल
रेत की तरह गिर रहा है
रैहान मुझे बुला रहा है
ऋतु- अनुराग,निधि- अर‘ाद,
‘ाा‘वत- दिव्या और मेरी प्रिय आ‘ाा
और मेरे दोस्तों की इतनी बडी दुनिया
मैं किस किस के नाम लूं
सब मेरा इंतजार कर रहे हैं
पर मैं पहुंच नहीं पा रहा हू
मेरी सांसें जबाब दे रही हैं .
पर दोस्तो याद रखना
मौत ,वक़्त की अदालत का आखिरी फैसला नहीं है
जिन्दगी मौत से कभी नहीं हरती
मेरे दोस्त ही तो मेरी ताकत रहे हैं
इसलिए मैं हमे‘ाा कहता रहा हूं
कि दोस्त से बडा कोई रि‘ता नहीं होता
और ना ही दोस्ती से बडा कोई धर्म
मैं तो यहां तक् कहता हू
कि दोस्ती से बडी कोई विचारधारा भी नहीं होती
जैसे चूल्हे में जलती आग से बडी
कोई रो‘ानी नहीं होती .
इसलिए मेरी गुजारि‘ा है
कि उलझे हुए सवालों से टकराते हुए
एक बेहतर इंसानी दुनिया बनाने के लिए
मेरी यादों के साथ संघर्“ा का कारवां चलता रहे
मंजिल के आखिरी पडाव तक.
1 टिप्पणी:
विनम्र श्रद्धांजलि !
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